शरीर के साथ मन का भी अभ्यास : योग में धारणा और ध्यान से मिलता है मानसिक संतुलन और आत्मिक शांति
दैनिक रेवाँचल टाईम्स – नई दिल्ली। योग को अक्सर लोग केवल शारीरिक व्यायाम या अलग-अलग आसनों तक सीमित समझते हैं, लेकिन वास्तव में योग शरीर के साथ-साथ मन को स्वस्थ और शांत रखने का भी अभ्यास है। योग दर्शन में धारणा और ध्यान ऐसे महत्वपूर्ण चरण हैं, जिनका संबंध मन की एकाग्रता, मानसिक स्थिरता और आंतरिक शांति से है।
मन का बार-बार भटकना सामान्य बात है। कभी व्यक्ति बीती घटनाओं के बारे में सोचता है तो कभी भविष्य की चिंताओं में उलझ जाता है। ऐसी स्थिति में मन को किसी एक विषय पर केंद्रित करने का अभ्यास उपयोगी हो सकता है।
धारणा क्या है और योग में इसका क्या महत्व है?
योग में धारणा को एकाग्रता का अभ्यास कहा जाता है। इसका सरल अर्थ है अपने मन को किसी एक वस्तु, विचार, स्थान या विषय पर टिकाने का प्रयास करना।
सामान्य परिस्थितियों में हमारा मन लगातार विभिन्न विचारों की ओर जाता रहता है। धारणा का अभ्यास इसी चंचल मन को एक निश्चित दिशा देने में सहायता करता है।
इसके लिए व्यक्ति अपनी सांसों, जलते हुए दीपक की लौ, दोनों भौंहों के बीच के स्थान या किसी आराध्य के चित्र को एकाग्रता का केंद्र बना सकता है। हालांकि आंखों और शरीर पर अनावश्यक दबाव डाले बिना सहज अभ्यास करना चाहिए।
नियमित अभ्यास के साथ किसी एक विषय पर ध्यान टिकाए रखने की क्षमता बेहतर हो सकती है।
ध्यान क्या है और यह धारणा से कैसे अलग है?
योग दर्शन में ध्यान को धारणा से आगे की अवस्था माना गया है। धारणा में व्यक्ति मन को बार-बार किसी एक विषय पर केंद्रित करने का प्रयास करता है, जबकि ध्यान में उसी विषय की ओर चेतना का प्रवाह अधिक निरंतर और स्थिर हो जाता है।
शुरुआत में अभ्यास करने वाले व्यक्ति का मन कई बार भटक सकता है। ऐसे में उसे बिना परेशान हुए धीरे-धीरे अपने चुने हुए विषय की ओर वापस लाना होता है।
जब एकाग्रता गहरी होने लगती है और मन लंबे समय तक उसी विषय पर स्थिर रहने लगता है, तो योग की परंपरा में इसे ध्यान की अवस्था से जोड़ा जाता है।
धारणा : मन को किसी एक विषय पर केंद्रित करने का अभ्यास।
ध्यान : उसी विषय पर एकाग्रता के निरंतर प्रवाह की अवस्था।
संबंध : धारणा एकाग्रता की तैयारी करती है, जबकि ध्यान उसे अधिक गहराई और स्थिरता देता है।
धारणा और ध्यान का अभ्यास कैसे शुरू करें?
धारणा और ध्यान के अभ्यास की शुरुआत किसी शांत तथा सुविधाजनक स्थान पर बैठकर की जा सकती है। अभ्यास के लिए ऐसी स्थिति चुनना उपयोगी है जिसमें शरीर आरामदायक और मन सहज रहे।
सबसे पहले अपनी सामान्य सांसों पर ध्यान दें या किसी एक वस्तु को एकाग्रता का केंद्र बनाएं। मन में दूसरे विचार आने पर उन्हें लेकर परेशान होने के बजाय धीरे-धीरे ध्यान वापस उसी विषय पर ले आएं।
अभ्यास के दौरान मन को जबरन रोकने या विचारों को पूरी तरह समाप्त करने की कोशिश करना आवश्यक नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति सहजता और नियमितता बनाए रखे।
नियमित अभ्यास से एकाग्रता और मानसिक शांति में सहायता
धारणा और ध्यान के नियमित अभ्यास से कुछ लोगों को मानसिक तनाव कम करने, एकाग्रता बेहतर बनाने और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायता मिल सकती है। हालांकि इनके प्रभाव व्यक्ति की परिस्थितियों, अभ्यास की पद्धति और नियमितता के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
योग का उद्देश्य केवल शारीरिक क्षमता विकसित करना नहीं, बल्कि मन और शरीर के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित करना भी है। इसी कारण योग में मानसिक अभ्यासों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
मन भटके तो परेशान न हों, अभ्यास जारी रखें
ध्यान का अभ्यास शुरू करते समय मन का बार-बार भटकना सामान्य अनुभव है। ऐसे में स्वयं पर दबाव डालने के बजाय धैर्य रखना महत्वपूर्ण है।
धारणा और ध्यान का अभ्यास किसी प्रतियोगिता की तरह नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता विकसित करने की प्रक्रिया के रूप में किया जाना चाहिए। धीरे-धीरे एकाग्रता की अवधि बढ़ाई जा सकती है।
धारणा मन को एक विषय पर स्थिर करने का अभ्यास है और ध्यान उस एकाग्रता को निरंतरता देने की प्रक्रिया। नियमित और सहज अभ्यास मानसिक शांति, आत्म-जागरूकता तथा एकाग्रता बढ़ाने में उपयोगी हो सकता है।
