Breaking

revanchal times new

नश्वरता का बोध'' : सुश्री सरोज कंसारी

 


लेख:

(नेपाल त्रासदी)

दैनिक रेवाँचल टाईम्स - आपदा चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, इंसानी हौसला, दयालुता मिलकर हर मुश्किल पर जीत पा लेती है। मनुष्य अक्सर प्रकृति के संकेतों को अनदेखा कर अपनी भूलों से सीखने में चूक जाता है। प्रकृति से किया गया खिलवाड़ अंततः मानवता के लिए ही घातक सिद्ध होता है। जब-जब प्रकृति अपना रौद्र रूप धारण करती है, तब-तब वह मनुष्य को उसकी सीमाओं और जीवन की परम नश्वरता का बोध कराती है। नेपाल की हालिया त्रासदी केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव के अस्तित्व और उसके अहंकार को झकझोरने वाली एक चेतावनी है। बाढ़ में सब कुछ एक ही पल में विलीन होते देख कर यह समझ आता है कि यह जीवन पानी के बुलबुले से अधिक कुछ नहीं है, जिसकी अगली साँस तक का भरोसा नहीं।


इस त्रासदी ने यह वास्तविकता उजागर कर दी है कि बाढ़ के समक्ष सब कुछ बह जाता है, सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। हजारों लोग इस जल प्रलय में बह गए। इस कठिन घड़ी में आज सबसे बड़ी आवश्यकता भीतर की संवेदनशीलता और इंसानियत की है। यही दया और करुणा ही इस धरती को थामे रखती है। हमारी करुणा और हमारी अच्छाई हमेशा जीवित रहनी चाहिए। हमें एकता और सद्भावना का संकल्प लेना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदी न हो और किसी को ऐसा दुःख और कष्ट न सहना पड़े।

*नेपाल त्रासदी हेतु काव्य:*


''वहाँ पर सैलाब उठा जब,

आँख-आँख में अश्रु भर आए थे,

साहस-हिम्मत खोई नहीं, 

मानव हृदयों ने मिलकर हाथ बढ़ाए थे।

यह कष्ट बड़ा है भारी, 

किन्तु दयालुता मरहम बनकर छाई थी,

संकट की उस मुश्किल घड़ी में, 

वहाँ मानवता काम आई थी।''

जब वहाँ  बाढ़ आया , तो उस तबाही के खौफनाक मंजर ने हर किसी को भीतर तक झकझोर दिया। सभी आंखों में बेबसी के अश्रु छलक आए। किन्तु इस प्रचंड जल प्रहार के सामने भी इंसानी जज्बा और हौसला कम नहीं पड़ा। चारों तरफ मची चीख-पुकार के बीच लोगों के भीतर की इंसानियत जाग उठी और बिना समय गंवाए अनगिनत अनजान हाथों ने एक-दूसरे को संभालने के लिए हाथ बढ़ा दिए। सब कुछ पल भर में बह जाने का वह संताप इतना असीम था कि शब्दों में नहीं समेटा जा सकता था। मगर ऐसे घोर संकट में दुनिया भर से उमड़ी करुणा पीड़ितों के लिए संजीवनी बन गई। उस डरावनी घड़ी ने साबित कर दिया कि जब व्यवस्थाएं ढह जाती हैं, तब केवल निस्वार्थ मानवता ही जल में फँसी जिंदगी को दोबारा सांसें दे पाती है।

जब यह वास्तविकता है कि इस जग में कुछ भी शाश्वत नहीं, तो इस क्षणभंगुर जीवन को शिकायतों, द्वेष और व्यर्थ की चिंताओं में क्यों गँवाना? इस त्रासदी का सच्चा ज्ञान यही है कि हम 'आज' और 'अभी' के महत्व को समझें।


*सुश्री सरोज कंसारी*

कवयित्री, लेखिका एवं अध्यापिका 

रिपोर्टर, उद्घोषिका, नवापारा-राजिम, 

रायपुर (छत्तीसगढ़)

Post a Comment

Previous Post Next Post