Breaking

revanchal times new

आज़ादी का दूसरा पिंजरा



लेखिका सलोनी विपुल कुमार ठाकर पालनपुर गुजरात 

दैनिक रेवांचल टाईम्स - एक सवाल है, जो शायद किसी ने पूछा नहीं। स्त्री ने घर से बाहर कदम रखा, नौकरी पाई, अपने फैसले खुद लेने शुरू किए फिर भी वह आज़ाद क्यों नहीं हुई? जवाब कहीं गहराई में छिपा है, ऐसी जगह जहाँ हम देखना नहीं चाहते।


सदियों तक स्त्री से कहा गया है कि चुप रहो, सहन करो, त्याग करो, यही तुम्हारा धर्म है। वह मानती गई, क्योंकि इनकार करने की भाषा उसे सिखाई ही नहीं गई थी। फिर वक्त बदला। अब कहा जाने लगा बोलो, लड़ो, आगे बढ़ो, कुछ बनकर दिखाओ, प्रेरणा बनो। सुनने में यह आज़ादी लगती है। पर गौर से देखिए दोनों ही बार फैसला उसका नहीं था। पहले समाज तय करता था कि वह कैसे झुके, अब समाज तय करता है कि वह कैसे उड़े। साँचा बदल गया, पर साँचे में ढलने की मजबूरी वही रही।

यही वह सच है जिसे कोई कहना नहीं चाहता, आज़ादी भी एक नई कैद बन सकती है। जिस स्त्री ने खुद के लिए कुछ हासिल न करने का फैसला किया, जो थक कर बैठ गई, जो किसी की मिसाल नहीं बनना चाहती, बस एक साधारण, शांत ज़िंदगी जीना चाहती है वह भी आज अपराधबोध में जीती है। मानो वह अपनी माँ, अपनी दादी, अपनी पूरी पीढ़ी को निराश कर रही हो। पहले "अच्छी बहू" के सांचे में ढलने का दबाव था, आज "empowered woman" के सांचे में ढलने का दबाव है। दोनों ही बार स्त्री किसी और की उम्मीद पर जी रही है, बस उम्मीद का नाम बदल गया, बोझ नहीं गया।

इस बोझ के पीछे एक और गहरी परत है, जिसे समझना और भी मुश्किल है। स्त्री ने कभी खुद को अपनी आँखों से देखा ही नहीं। जन्म से उसे सिखाया गया कि वह कैसी दिखे, कैसे बैठे, कैसे हँसे, कैसे चले, कैसे बोले, उसे कैसा दिखना "चाहिए"। यह सिर्फ नियम नहीं थे यह एक ऐसा प्रशिक्षण था जिसने धीरे-धीरे उसकी अपनी नज़र को ही मिटा दिया। वह आईने में खुद को नहीं देखती, वह आईने में यह देखती है कि दुनिया उसे कैसे देख रही होगी। यह इतनी गहराई तक बैठ चुका है कि अब वह खुद भी नहीं जानती कि उसकी असली नज़र क्या है, क्योंकि उसे वह नज़र इस्तेमाल करने का मौका ही कभी नहीं मिला।

इसीलिए असली आज़ादी करियर में नहीं है, पैसे में नहीं है, किसी पद या उपलब्धि में नहीं है। उसकी असली आज़ादी उस एक पल में है जब स्त्री पहली बार खुद को अपनी आँखों से देखती है बिना यह सोचे कि कोई उसे कैसे देख रहा है, बिना यह नापे कि वह किसी की उम्मीद पर कितनी खरी उतरी। और अजीब बात यह है कि यह पल किसी बड़ी उपलब्धि के मंच पर नहीं आता। यह अक्सर तब आता है जब वह बिल्कुल अकेली होती है, जब कोई देख नहीं रहा होता, जब तालियाँ बजाने वाला कोई नहीं होता।

अब एक और बात, जो और भी कम कही गई है हमने स्त्री के दर्द को इतना असलियत से ज़्यादा बड़ा कर दिया है कि वह खुद एक नई ज़ंजीर बन गया है। हर स्त्री की कहानी को हम "संघर्ष की कहानी" बनाकर पेश करते हैं, कितना सहा, कितना रोई, फिर भी मुस्कुराई। यह वाक्य सुनने में तारीफ लगता है, पर असल में यह एक शर्त बन गई है। मानो बिना आँसुओं के, बिना तकलीफ के उसकी कहानी अधूरी हो, मानो उसे सम्मान पाने के लिए पहले दुख का प्रमाण देना ज़रूरी हो। हम स्त्री के दर्द को खूबसूरत बनाकर परोसते हैं, और इस तरह उससे यह उम्मीद पाल लेते हैं कि उसे तकलीफ सहनी ही होगी, तभी वह सराही जाएगी। असली सम्मान वहाँ होगा, जहाँ स्त्री की कहानी बिना संघर्ष के, बिना बलिदान के, सिर्फ उसकी अपनी इच्छा से भी उतनी ही सम्मानजनक मानी जाए।

और अंत में वह बात, जो शायद सबसे गहरी है, हम स्त्री की ताकत की बात बहुत करते हैं, उसकी थकान की बात कोई नहीं करता। हर स्त्री से उम्मीद की जाती है कि वह हर भूमिका में परफेक्ट हो, माँ भी, बेटी भी, पत्नी भी, कर्मचारी भी, दोस्त भी, और यह सब एक साथ हमेशा मुस्कुराते हुए। कोई नहीं पूछता कि रात को जब घर के सारे काम खत्म हो जाते हैं, जब सब सो जाते हैं, तो उसके अंदर क्या बचता है। "माँ तो थकती ही नहीं", "औरत तो सब सम्भाल लेती है" यह जो आकर्षक और प्रेरणादायक तारीफ की तरह कहे जाते हैं, यही सबसे भारी बोझ हैं। क्योंकि इन्होंने स्त्री को यह सिखा दिया है कि थकना भी एक तरह का गुनाह है।

तो फिर असली उत्थान क्या है? शायद यह किसी मंच पर चढ़ना नहीं है, किसी को प्रेरित करना नहीं है, किसी मिसाल में ढलना नहीं है। शायद असली उत्थान वह पल है जब एक स्त्री, बिना किसी वजह के, बिना किसी को जवाब दिए, बस अपने लिए जीने का साहस करती है चाहे वह साहस किसी बड़ी उपलब्धि में दिखे या सिर्फ एक शाम में, जब वह अपने लिए एक कप चाय बनाकर, बिना किसी अपराधबोध के, चुपचाप बैठ जाती है।

शायद यही वह जगह है जहाँ से असली आज़ादी शुरू होती है, जहाँ कोई तालियाँ नहीं बजतीं, कोई देख नहीं रहा होता, और स्त्री पहली बार सिर्फ खुद के लिए होती है।

Post a Comment

Previous Post Next Post