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जिला अस्पताल में डॉक्टर नदारद, मरीज बेहाल: शिशु रोग विशेषज्ञ ने संभाली अस्थि रोग की कमान



दोपहर तक विशेषज्ञ चिकित्सक नदारद

दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला जिला चिकित्सालय मंडला की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। शासन और प्रशासन सरकारी अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावे भले ही करते हों, लेकिन जिला चिकित्सालय की जमीनी तस्वीर इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। गुरुवार को अस्पताल के अस्थि रोग विभाग के कक्ष क्रमांक-3 के बाहर मरीजों की लंबी कतार लगी रही और मरीज डॉक्टर के आने का इंतजार करते रहे। दूर-दराज ग्रामीण क्षेत्रों से उपचार की उम्मीद लेकर पहुंचे मरीज घंटों परेशान होते रहे, लेकिन उन्हें यह स्पष्ट जानकारी तक नहीं मिल सकी कि संबंधित चिकित्सक आखिर अस्पताल आएंगे कब।



सबसे गंभीर स्थिति तब सामने आई, जब अस्थि रोग विशेषज्ञ चिकित्सकों की अनुपस्थिति में दूसरे विभाग के चिकित्सक को मरीज देखने पड़े। बताया गया कि सोमवार, गुरुवार और शुक्रवार को अस्थि रोग विभाग में ड्यूटी से संबंधित व्यवस्थाओं को लेकर मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। गुरुवार को डॉक्टर महेंद्र चौहान और डॉक्टर अविनाश खरे के समय पर कक्ष में उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई। मीडिया के पहुंचने के बाद दोपहर करीब 12 बजे डॉ. विजय धुर्वे अस्थि रोग कक्ष क्रमांक-3 में पहुंचे और मरीजों को देखना शुरू किया। इसके बावजूद बताया गया कि संबंधित दोनों चिकित्सक करीब 1 बजे तक भी मरीजों को देखने के लिए दिखाई नहीं दिए।

डॉक्टर का इंतजार करते रहे मरीज

अस्पताल में सुबह से ही मरीजों की भीड़ लगी रही। कई मरीज पर्ची लेकर चिकित्सक के कक्ष के बाहर अपनी बारी का इंतजार करते रहे। किसी को पैर में दर्द था तो कोई चोट लगने के बाद उपचार कराने पहुंचा था। ग्रामीण इलाकों से आने वाले मरीजों के लिए जिला अस्पताल तक पहुंचना  आसान नहीं होता। आने-जाने में समय और पैसा खर्च करने के बाद जब अस्पताल में भी चिकित्सक उपलब्ध नहीं मिलता, तो उनकी परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।

मरीजों और उनके परिजनों के अनुसार, वे बार-बार अस्पताल के स्टाफ से डॉक्टर के आने का समय पूछते रहे, लेकिन उन्हें संतोषजनक जानकारी नहीं मिल सकी। कई लोगों को सिर्फ इतना कहा गया कि “साहब आएंगे।” लेकिन सवाल यह है कि आखिर कब आएंगे सरकारी अस्पताल में उपचार के लिए पहुंचे मरीज घंटों इंतजार करें या फिर निजी अस्पताल की ओर रुख करें

अस्थि रोग के मरीजों को शिशु रोग विशेषज्ञ ने देखा

इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि अस्थि रोग विभाग में विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विजय धुर्वे को मरीजों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए डॉ. धुर्वे अस्थि रोग विभाग के कक्ष क्रमांक-3 में पहुंचे और मरीजों को देखना शुरू किया। बताया गया कि कुछ मरीजों को एक्स-रे की सलाह दी गई तो कुछ को दर्द निवारक दवाएं लिखी गईं।

यह स्थिति अपने आप में अस्पताल की ड्यूटी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। यदि अस्थि रोग के मरीजों के लिए विशेषज्ञ चिकित्सक की ड्यूटी निर्धारित है, तो उनकी अनुपस्थिति में मरीजों को दूसरे विभाग के डॉक्टर से क्यों दिखाना पड़ा क्या अस्पताल प्रबंधन के पास चिकित्सकों की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है क्या मरीजों की भीड़ और विशेषज्ञ की अनुपस्थिति की जानकारी जिम्मेदार अधिकारियों को समय रहते नहीं होती सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों की ड्यूटी केवल कागजों पर तय है या वास्तव में उसका पालन भी हो रहा है

नर्स मैडम सोती नजर आईं, मरीज करते रहे इंतजार

अस्पताल की अव्यवस्था का एक और पहलू उस समय सामने आया, जब डॉक्टर के इंतजार में मरीज परेशान थे और विभाग में मौजूद स्टाफ में से एक नर्स के सोते हुए दिखाई देने की बात सामने आई। यदि यह स्थिति ड्यूटी समय की है तो यह अस्पताल की कार्यप्रणाली और मरीजों के प्रति जिम्मेदारी पर  सवाल खड़े करती है।

अस्पताल में आने वाला मरीज किसी सरकारी दफ्तर का काम लेकर नहीं आता। वह बीमारी, दर्द और परेशानी लेकर आता है। उसके लिए एक-एक मिनट महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में चिकित्सक की अनुपस्थिति और स्टाफ की कथित लापरवाही मरीजों के लिए  परेशानी का कारण बन सकती है।

निजी क्लीनिक में व्यस्तता का आरोप

मरीजों और उनके परिजनों में यह चर्चा भी सामने आती रही है कि कुछ चिकित्सक सरकारी अस्पताल की ड्यूटी के दौरान समय पर उपलब्ध नहीं होते और निजी क्लीनिक में व्यस्त रहते हैं। लेकिन यदि सरकारी अस्पताल में पदस्थ चिकित्सक निर्धारित ड्यूटी समय पर अस्पताल में मौजूद नहीं रहते हैं तो यह बेहद गंभीर प्रशासनिक मामला है।

सरकारी चिकित्सकों को शासन द्वारा वेतन और तमाम सुविधाएं दी जाती हैं। बदले में उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे निर्धारित समय पर अस्पताल में उपस्थित रहकर मरीजों को सेवाएं दें। यदि मरीजों को डॉक्टर के निजी क्लीनिक तक पहुंचना पड़े या सरकारी अस्पताल में डॉक्टर के आने का घंटों इंतजार करना पड़े, तो फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ जाता है।

“साहब आएंगे” के भरोसे मरीजों का इलाज

जिला अस्पताल में आने वाले मरीजों के लिए सबसे बड़ी समस्या केवल डॉक्टर की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि सूचना का अभाव भी है। मरीज डॉक्टर के बारे में पूछता है तो उसे स्पष्ट जवाब नहीं मिलता। कोई कहता है साहब रास्ते में हैं, कोई कहता है थोड़ी देर में आएंगे।

लेकिन मरीजों का सवाल सीधा है—“थोड़ी देर आखिर कितनी देर

ग्रामीण क्षेत्र से आने वाला मरीज कई किलोमीटर की यात्रा करके अस्पताल पहुंचता है। कई बार उसके साथ बुजुर्ग, महिला या छोटे बच्चे होते हैं। घंटों कतार में खड़े रहने के बाद यदि डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता तो मरीज के सामने दो ही विकल्प बचते हैं—या तो इंतजार करे या फिर निजी अस्पताल का खर्च उठाए।

यही कारण है कि अस्पताल में डॉक्टरों की उपस्थिति की नियमित और सख्त निगरानी बेहद जरूरी है।

मंत्री और कलेक्टर के दौरे, फिर भी तस्वीर जस की तस

मंडला जिला चिकित्सालय में समय-समय पर मंत्री, जनप्रतिनिधि और जिला प्रशासन के अधिकारी निरीक्षण करते रहे हैं। अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर बैठकों और निरीक्षणों का दौर भी चलता रहता है। लेकिन इसके बावजूद यदि मरीजों को डॉक्टर के इंतजार में घंटों बैठना पड़ रहा है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि इन निरीक्षणों और बैठकों का असर आखिर जमीन पर क्यों नहीं दिखाई देता।

जनता को अस्पताल में केवल निरीक्षण और आश्वासन नहीं चाहिए। मरीजों को समय पर डॉक्टर, उपलब्ध विशेषज्ञ, पर्याप्त स्टाफ और जवाबदेह स्वास्थ्य व्यवस्था चाहिए।

यदि निरीक्षण के बाद भी वही पुरानी अव्यवस्था बनी रहती है तो फिर निरीक्षण की उपयोगिता पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब उपस्थिति रजिस्टर और ड्यूटी चार्ट की जांच जरूरी

इस पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग को केवल मौखिक जानकारी के आधार पर मामला समाप्त करने के बजाय चिकित्सकों की वास्तविक उपस्थिति की जांच करनी चाहिए। संबंधित दिनों के ड्यूटी चार्ट, उपस्थिति रजिस्टर, बायोमेट्रिक रिकॉर्ड और मरीजों की ओपीडी पर्चियों की जांच की जाए तो स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

यदि कोई चिकित्सक निर्धारित समय में ड्यूटी पर अनुपस्थित पाया जाता है तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसी तरह यदि अस्पताल में स्टाफ की लापरवाही सामने आती है तो उस पर भी कार्रवाई होना जरूरी है।

सरकारी अस्पताल गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए सबसे बड़ा सहारा है। यहां आने वाला हर मरीज उम्मीद लेकर आता है कि उसे समय पर इलाज मिलेगा। लेकिन जब विशेषज्ञ डॉक्टर के कक्ष के बाहर मरीजों की लंबी कतार लगी हो और विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध न हों, तब व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मंडला जिला चिकित्सालय की गुरुवार की तस्वीर ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा कर दिया है—क्या यहां मरीजों का इलाज व्यवस्था के भरोसे है या डॉक्टरों की उपलब्धता के भरोसे अब देखना यह होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले को महज एक दिन की अव्यवस्था मानकर भूल जाता है या फिर चिकित्सकों की उपस्थिति, ड्यूटी व्यवस्था और मरीजों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय करता है।

मंडला की जनता का सवाल साफ है—जब मरीज समय पर अस्पताल पहुंच सकता है, तो डॉक्टर समय पर अस्पताल क्यों नहीं पहुंच सकते।

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