Breaking

revanchal times new

एफआईआर के बाद भी कुर्सी बरकरार! नगर परिषद भुआ-बिछिया में आरोपी अधिकारी-कर्मचारी से शासकीय काम लेने पर उठे सवाल




नगर परिषद भुआ-बिछिया में अधिकारी राजेश मार्को, कर्मचारी दीपक रजक से शासकीय कार्य लिए जाने पर उठे सवाल — भ्रष्टाचार और गबन के मामलों में कार्रवाई सिर्फ एफआईआर तक सीमित रहने के गंभीर आरोप....


दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला जिला आदिवासी बाहुल्य जिला होने के साथ साथ सरकारी कार्यालयों में अधिकारी कर्मचारियों के लिए लूट ग़बन और भ्रष्टाचार का अड्डा बनता जा रहा है भय मुक्त होकर जनहितकारी योजनाओं ग़बन लूट के साथ साथ हितग्राहियों को लाभान्वित करने खुल्लमखुल्ला सेवा शुल्क यानि रिश्वत की माँग की जाती है और बिना सेवा शुल्क के इनकी टेविल फाईल आगे बढ़ती ही नही चाहे आप कुछ भी कर ले ऐसे जिले में अनेकों मामंले प्रकाश में आ चुके ओर जाँच एजेंसी और स्थानीय जांच टीम जाँच करती है पर कार्यवाही भगवान भरोसे छोड़ कर आगे बढ़ते हैं।

    वही सूत्रो से प्राप्त जानकारी के अनुसार भुआ-बिछिया, नगर परिषद भुआ-बिछिया की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। नगर परिषद में पदस्थ कर्मचारी दीपक रजक के विरुद्ध एफआईआर दर्ज होने के बावजूद उनसे शासकीय कार्य लिए जाने की बात सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर आपराधिक प्रकरण दर्ज होने के बाद भी संबंधित कर्मचारी को शासकीय दायित्व निभाने की अनुमति किस अधिकारी के आदेश से दी गई?

यदि कर्मचारी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज है और इसके बावजूद वह नियमित रूप से शासकीय कार्य कर रहे हैं, तो नगर परिषद प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनकी सेवा स्थिति क्या है, विभागीय स्तर पर क्या कार्रवाई हुई और उन्हें कार्य पर बनाए रखने का आधार क्या है?

एफआईआर हुई... फिर आगे क्या हुआ?

मंडला जिले में भ्रष्टाचार, गबन और रिश्वतखोरी से जुड़े मामलों में कार्रवाई की कहानी कई बार एक ही मोड़ पर आकर रुकती दिखाई देती है—एफआईआर दर्ज हुई, कुछ दिनों तक हड़कंप मचा, अधिकारी-कर्मचारी इधर-उधर दिखाई दिए और फिर मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

सवाल यह है कि एफआईआर किसी कार्रवाई का अंतिम पड़ाव है या जांच और विभागीय कार्रवाई की शुरुआत?

अगर एफआईआर के बाद भी संबंधित कर्मचारी उसी व्यवस्था में अपनी जिम्मेदारियां निभाता रहे, तो आम जनता के बीच यह संदेश जाता है कि कानून की कार्रवाई से डरने की जरूरत नहीं है।

यही स्थिति भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करती है।

भ्रष्टाचार करो, एफआईआर झेलो और फिर उसी कुर्सी पर लौट आओ?

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि सरकारी योजनाओं और सार्वजनिक धन से जुड़े मामलों में यदि किसी अधिकारी-कर्मचारी पर गंभीर आरोप लगते हैं, तो कार्रवाई का असर जमीन पर दिखाई देना चाहिए। लेकिन कई मामलों में कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रहने की शिकायतें सामने आती रही हैं।

एफआईआर हो गई तो जांच कौन करेगा?

जांच शुरू हुई तो पूरी कब होगी?

जांच पूरी हुई तो दोष तय कब होगा?

दोष तय हुआ तो विभागीय कार्रवाई कब होगी? और यदि दोष गंभीर है तो संबंधित व्यक्ति उसी पद और उसी प्रभावशाली जिम्मेदारी में क्यों बना रहेगा?

यह सवाल केवल दीपक रजक के मामले का नहीं है, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही का है।

रिटायरमेंट आ गया, लेकिन जांच नहीं!

मंडला जिले में ऐसे मामलों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं, जहां आरोपों और शिकायतों के बावजूद विभागीय जांच वर्षों तक पूरी नहीं हो पाती और संबंधित अधिकारी-कर्मचारी अपनी सेवा अवधि पूरी कर सेवानिवृत्त तक हो जाते हैं।

जब अधिकारी रिटायर हो गया, जांच पूरी नहीं हुई तो फिर जवाबदेही किसकी?

क्या जांच फाइलों में धूल खाने के लिए होती है? क्या जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी केवल एफआईआर दर्ज करने तक है? अगर ऐसा नहीं है तो जनता को बताया जाए कि एफआईआर के बाद आगे की कार्रवाई किस स्तर पर पहुंची और उसका परिणाम क्या निकला।

जांच एजेंसियां सिर्फ एफआईआर दर्ज करने तक सीमित?

      वही मंडला में समय-समय पर भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के आरोपों से जुड़े मामले सामने आते रहे हैं। कृषि विभाग के उपसंचालक स्तर से जुड़े मामले हों, या लोक निर्माण विभाग हो या फिर भुआ-बिछिया और निवास के नगर निकायों में मुख्य नगर पालिका अधिकारी स्तर से जुड़े आरोप हों, सहायक आयुक्त कार्यालय में सहायक यंत्री से जुड़े रिश्वत के आरोप हों अथवा मंडला डीपीसी कार्यालय से जुड़े रिश्वत प्रकरण में पति-पत्नी के नाम सामने आने का मामला—हर मामले की वास्तविक स्थिति आधिकारिक दस्तावेज और जांच के परिणाम से ही तय होगी, लेकिन इन प्रकरणों के बहाने अब एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा हो गया है।

आखिर एफआईआर के बाद होता क्या है?

क्या आरोपी अधिकारी-कर्मचारी को निलंबित किया जाता है?

क्या उसे जांच पूरी होने तक संवेदनशील पद से हटाया जाता है? क्या विभागीय जांच समयसीमा में पूरी होती है? क्या दोष सिद्ध होने पर कठोर दंड होता है? या फिर कुछ समय के लिए तबादला, पदस्थापना में बदलाव और उसके बाद वही विभाग, वही कुर्सी और वही व्यवस्था? भ्रष्टाचार पर कार्रवाई या भ्रष्टाचारियों के लिए सुरक्षा कवच?

सरकारी योजनाओं में करोड़ों रुपये का बजट आता है। सड़क, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, नगरीय विकास, पंचायत और कृषि सहित तमाम योजनाओं का पैसा जनता के विकास के लिए होता है।

लेकिन यदि किसी अधिकारी-कर्मचारी पर सरकारी धन के दुरुपयोग, गबन या रिश्वतखोरी जैसे गंभीर आरोप सामने आते हैं और उसके बाद भी कार्रवाई वर्षों तक लंबित रहती है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जांच की धीमी रफ्तार भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा सुरक्षा कवच बन चुकी है?

क्योंकि भ्रष्टाचार करने वाले को यदि यह भरोसा हो जाए कि एफआईआर के बाद भी वर्षों तक मामला चलेगा, जांच पूरी नहीं होगी और वह नौकरी करता रहेगा, तो कानून का भय कैसे पैदा होगा?

'कार्रवाई हो चुकी है' का तमगा और फिर बेखौफ व्यवस्था?

व्यवस्था पर यह सवाल भी गंभीर है कि कहीं एफआईआर और प्रारंभिक कार्रवाई को ही अंतिम उपलब्धि तो नहीं मान लिया गया?

कई मामलों में आरोपी अधिकारी-कर्मचारी कुछ समय के लिए इधर-उधर दिखाई देते हैं। फिर समय बीतता है और वही लोग दोबारा प्रभावशाली पदों पर नजर आने लगते हैं। न कोई भय, न कोई डर—क्योंकि कार्रवाई तो हो ही चुकी है!

अगर कार्रवाई का मतलब केवल एफआईआर दर्ज होना है और उसके बाद वर्षों तक अंतिम परिणाम सामने नहीं आता, तो भ्रष्टाचारियों के मन में कानून का डर कैसे पैदा होगा?

नगर परिषद भुआ-बिछिया से सीधे सवाल

    वही लिपिक दीपक रजक और मुख्य नगर पालिका अधिकारी राजेश मार्को के मामले में नगर परिषद प्रशासन को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए—

संबंधित कर्मचारी के विरुद्ध दर्ज एफआईआर की वर्तमान स्थिति क्या है?

एफआईआर दर्ज होने के बाद क्या विभागीय जांच शुरू की गई?

क्या उन्हें निलंबित किया गया या कोई अन्य प्रशासनिक कार्रवाई की गई?

यदि निलंबित नहीं किया गया तो इसके पीछे सक्षम अधिकारी का आदेश क्या है? और वर्तमान में उनसे शासकीय कार्य किस आदेश के तहत लिया जा रहा है? क्या उनके विरुद्ध आरोपों का असर उनकी सेवा संबंधी जिम्मेदारियों पर पड़ता है?

क्या इस मामले की जांच समयसीमा में पूरी करने के लिए कोई अधिकारी नियुक्त किया गया है?

नगर परिषद को इन सवालों का जवाब मौखिक सफाई से नहीं, बल्कि लिखित आदेश और दस्तावेजों के आधार पर देना चाहिए। पुराने मामलों की फाइलें भी खोलने की जरूरत, इसी बीच नगर परिषद से जुड़े पुराने मामलों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। गबन के आरोपों से जुड़े कर्मचारी रोहित दुबे के संबंध में परिषद स्तर पर प्रस्ताव पारित किए जाने की चर्चा है। पूर्व सीएमओ संजय घटोड़े से जुड़े प्रकरण तथा उनके पुत्र की अनुकंपा नियुक्ति को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

इन मामलों में आरोपों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। दस्तावेज, विभागीय आदेश, जांच रिपोर्ट और सक्षम प्राधिकारी का निर्णय ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकता है। लेकिन यदि शिकायतें और सवाल लगातार उठ रहे हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच कराने में प्रशासन को परेशानी क्यों होनी चाहिए?

जनता के पैसे पर खेल हुआ तो जवाब भी जनता को चाहिए

नगर परिषद कोई निजी संस्था नहीं है। यहां खर्च होने वाला पैसा जनता का है। यहां लिए जाने वाले निर्णय जनता के हित और सरकारी नियमों के अनुसार होने चाहिए। इसलिए यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी पर सरकारी योजनाओं, धनराशि या शासकीय कार्यों में अनियमितता के गंभीर आरोप लगते हैं, तो जांच को दबाकर, लटकाकर या अनिश्चितकाल तक टालकर मामले को खत्म नहीं किया जा सकता।

अब सवाल सिर्फ दीपक रजक या मुख्य नगर पालिका अधिकारी राजेश मार्को का नहीं है। सवाल है उस पूरी व्यवस्था का, जिसमें— जाँच एजंसी ने गड़बड़ी पाई और एफआईआर दर्ज की है, जांच शुरू होती है, फाइल चलती है,

समय गुजरता है, अधिकारी बदलते हैं,

सरकारें बदलती हैं, लेकिन जांच का नतीजा नहीं आता। और इसी बीच यदि वही अधिकारी-कर्मचारी फिर से उसी व्यवस्था में प्रभावी भूमिका निभाने लगें तो जनता पूछेगी ही—

क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का मतलब सिर्फ एफआईआर दर्ज करना रह गया है? क्या जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी एफआईआर के बाद खत्म हो जाती है? क्या विभागीय कार्रवाई की फाइलें इसलिए लंबित रहती हैं कि आरोपी सेवानिवृत्त हो जाए?

क्या सरकारी योजनाओं में गड़बड़ी करने वालों को कार्रवाई नहीं, बल्कि लंबी जांच का 'सुरक्षा कवच' मिल गया है?

और सबसे बड़ा सवाल—

अगर एफआईआर के बाद भी कुर्सी सुरक्षित है, तो फिर भ्रष्टाचार करने वाले को डर किस बात का?

मंडला में ऐसे मामलों की संख्या और उनकी वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए एफआईआर से लेकर अंतिम जांच रिपोर्ट और विभागीय कार्रवाई तक की पूरी कड़ी सार्वजनिक की जानी चाहिए।

क्योंकि जनता को केवल यह सुनना नहीं है कि “कार्रवाई कर दी गई है।” जनता यह जानना चाहती है— एफआईआर के बाद क्या हुआ? जांच कहां पहुंची?

दोषी कौन पाया गया? किस पर क्या कार्रवाई हुई? सरकारी नुकसान की वसूली कितनी हुई? और यदि कोई दोषी है तो वह आज किस कुर्सी पर बैठा है?

अब कागजी कार्रवाई नहीं, परिणाम चाहिए। क्योंकि सरकारी धन की लूट पर खामोशी भी सवालों के घेरे में है।...

                            ..... शेष अगले अंक पर मुकेश श्रीवास

Post a Comment

Previous Post Next Post