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हेलमेट दिखता है, बच्चों से लदा ऑटो क्यों नहीं?



बाइक पर शिकंजा, ऑटो पर रहम! सड़कों पर खुलेआम नियमों की धज्जियां, जनता त्रस्त—पुलिस और परिवहन विभाग की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल


दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला।मंडला जिले की सड़कों पर यातायात व्यवस्था अब व्यवस्था कम और मनमानी का खुला मैदान ज्यादा नजर आने लगी है। एक तरफ पुलिस सड़कों पर उतरकर मोटरसाइकिल चालकों का हेलमेट और कागजात तलाशती है, कार चालकों की सीट बेल्ट और दस्तावेज जांचे जाते हैं, चालान काटे जाते हैं। दूसरी तरफ सड़कों पर क्षमता से कई गुना अधिक सवारियां ठूंसकर दौड़ते ऑटो दिखाई देते हैं—जिनमें स्कूली बच्चे तक अंदर से लेकर बाहर और ऊपर तक लटकते नजर आते हैं।

सवाल यह है कि पुलिस की नजर में हेलमेट तो दिखाई देता है, लेकिन बच्चों से लदा ऑटो क्यों दिखाई नहीं देता?

तस्वीर में साफ दिखाई दे रहा है कि ऑटो में बैठने की क्षमता खत्म होने के बाद भी बच्चों और सवारियों को वाहन के बाहर तक लटकाकर ले जाया जा रहा है। यह केवल यातायात नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि किसी संभावित बड़े हादसे को खुला निमंत्रण है।

क्या हादसे के बाद जागेंगे जिम्मेदार?

मंडला जिले के बिछिया, मवई, निवास, नारायणगंज, बीजाडांडी, मोहगांव, नैनपुर और घुघरी सहित ग्रामीण अंचलों से बच्चे बेहतर शिक्षा के लिए कस्बों और शहरों तक पहुंचते हैं। इनके लिए ऑटो कई स्थानों पर आवागमन का प्रमुख साधन हैं।

लेकिन सवाल यह है कि जिस वाहन में बच्चों को सुरक्षित बैठाने की जगह तक नहीं है, उसमें उन्हें इस तरह ठूंसकर ले जाने की अनुमति आखिर किसने दी?

क्या प्रशासन किसी बच्चे के सड़क पर गिरने का इंतजार कर रहा है?

क्या किसी ऑटो के पलटने के बाद ही जिम्मेदारों को ओवरलोडिंग दिखाई देगी?

क्या किसी परिवार का बच्चा घायल होगा, तभी परिवहन विभाग की चेकिंग टीम सड़क पर उतरेगी?

मोटरसाइकिल वालों के लिए कानून, ऑटो वालों के लिए छूट?

यातायात नियम यदि कानून हैं तो सबके लिए समान होने चाहिए।

फिर यह कैसा यातायात नियंत्रण है जिसमें बाइक पर तीन सवारी दिख गई तो कार्रवाई, हेलमेट नहीं है तो चालान, कागज अधूरे हैं तो कार्रवाई—लेकिन ऑटो में क्षमता से कई गुना अधिक सवारियां भरकर बच्चे बाहर लटक रहे हों तो जिम्मेदार आंखें फेर लेते हैं?

यह सवाल अब आम जनता पूछ रही है।

क्या यातायात नियमों की किताब में ऑटो के लिए अलग कानून लिखा है?

सड़क को ऑटो चालकों ने बना दिया निजी स्टैंड!

समस्या सिर्फ ओवरलोडिंग तक सीमित नहीं है। शहर और कस्बों में कई जगह ऑटो चालक जहां मन आया, वहीं वाहन रोककर सवारी बैठाते और उतारते दिखाई देते हैं। बीच सड़क में ऑटो खड़ा कर दिया, पीछे वाहनों की कतार लग गई—लेकिन चालक को कोई फर्क नहीं।

चौराहे हों, बाजार हों या व्यस्त सड़कें—कई जगह ऑटो चालकों की मनमानी से यातायात प्रभावित होता है।

सड़क जनता के आवागमन के लिए है या ऑटो चालकों की मनमर्जी के लिए?

यदि नो-पार्किंग और सड़क अवरोध यातायात नियमों का उल्लंघन हैं, तो फिर इन पर कार्रवाई कहां है?

परिवहन विभाग आखिर कर क्या रहा है?

सबसे बड़ा सवाल जिला परिवहन विभाग से है।

क्या विभाग की जिम्मेदारी केवल कार्यालय में बैठकर कागज देखने तक है?

सड़कों पर दौड़ रहे यात्री ऑटो की फिटनेस, परमिट, निर्धारित क्षमता, दस्तावेज, चालक की पात्रता और सुरक्षा मानकों की जांच कौन करेगा?

यदि परिवहन विभाग नियमित जांच कर रहा है तो जनता को सड़क पर उसका असर क्यों नहीं दिखाई देता?

दूसरे शहरों में पुलिस ने ऑटो और ई-रिक्शा की ओवरलोडिंग, नो-पार्किंग और दस्तावेज संबंधी उल्लंघनों पर विशेष अभियान चलाकर कार्रवाई की है। जब यह कार्रवाई दूसरे जिलों में संभव है तो मंडला में नियमों का पहिया आखिर क्यों जाम है?

पुलिस की चेकिंग का दायरा इतना छोटा क्यों?

स्थानीय पुलिस सड़क पर चेकिंग करती है तो आम तौर पर बाइक और कार चालक सबसे पहले निशाने पर दिखाई देते हैं। सवाल यह नहीं कि उनकी जांच क्यों होती है—सवाल यह है कि ऑटो और बसों की जांच उसी गंभीरता से क्यों नहीं दिखाई देती?

यदि पुलिस को सड़क सुरक्षा की चिंता है तो उसे यह भी देखना होगा कि—

ऑटो में निर्धारित क्षमता से अधिक सवारी तो नहीं?

बच्चे वाहन से बाहर तो नहीं लटक रहे?

चालक बीच सड़क में वाहन तो नहीं रोक रहा?

वाहन फिटनेस के मानकों पर खरा उतरता है या नहीं?

परमिट और दस्तावेज सही हैं या नहीं?

बसों में क्षमता से अधिक यात्री तो नहीं?

स्कूल जाने वाले बच्चों को असुरक्षित तरीके से तो नहीं ढोया जा रहा?

जबलपुर पुलिस की हालिया कार्रवाई में क्षमता से अधिक सवारी बैठाने वाले ऑटो चालकों पर भी कार्रवाई का उल्लेख है। यानी ओवरलोडिंग पर कार्रवाई कोई असंभव काम नहीं है।

'हफ्ता-महीना' की चर्चा है तो जांच क्यों नहीं? सड़क किनारे लोग तरह-तरह की चर्चाएं करते हैं। कहीं कथित संरक्षण की बात होती है तो कहीं 'हफ्ता-महीना' और 'सेवा शुल्क' जैसे आरोपों की चर्चा सुनाई देती है।

इन चर्चाओं को प्रमाण मानना उचित नहीं होगा, लेकिन यदि जनता के बीच ऐसी बातें लगातार उठ रही हैं तो विभागीय स्तर पर निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई जाती?

जांच हो, सच सामने आए और दोषी मिले तो कार्रवाई हो।

लेकिन चुप्पी क्यों?

यातायात व्यवस्था बिगड़ी तो जिम्मेदार कौन?

मंडला की जनता अब यह पूछने को मजबूर है कि जिले की यातायात व्यवस्था की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

पुलिस की? जिला परिवहन विभाग की? प्रशासन की?

या फिर किसी की भी नहीं?

अगर जिम्मेदारी पुलिस की है तो सड़क पर मनमानी करते ऑटो क्यों दौड़ रहे हैं?

अगर जिम्मेदारी परिवहन विभाग की है तो ओवरलोड और असुरक्षित यात्री वाहन क्यों नजर नहीं आ रहे?

अगर दोनों विभागों की जिम्मेदारी है तो फिर जनता को सुरक्षित और व्यवस्थित यातायात कब मिलेगा?

अब कार्रवाई चाहिए, खानापूर्ति नहीं

जिला प्रशासन को केवल बैठकें और निर्देश जारी करने के बजाय मंडला जिले के सभी विकासखंडों में विशेष यातायात अभियान चलाना चाहिए।

बिछिया से लेकर मवई, निवास, नारायणगंज, बीजाडांडी, मोहगांव, नैनपुर और घुघरी तक यात्री ऑटो, ई-रिक्शा और बसों की वास्तविक जांच हो। क्षमता से अधिक सवारी, बच्चों को लटकाकर ले जाने, बीच सड़क में वाहन खड़ा करने, बिना जरूरी दस्तावेज, फिटनेस और परमिट संबंधी उल्लंघनों पर प्रभावी कार्रवाई की जाए।

क्योंकि सवाल चालान का नहीं, जिंदगी का है।

आज ऑटो से बच्चा लटक रहा है, कल वही बच्चा सड़क पर गिर सकता है।

आज वाहन क्षमता से अधिक भरा है, कल वही वाहन पलट सकता है।

आज विभाग आंखें बंद कर सकता है, लेकिन हादसा होने के बाद जिम्मेदारी से आंखें नहीं चुराई जा सकेगी।

मंडला की जनता जानना चाहती है—

हेलमेट की जांच के लिए पुलिस सड़क पर उतर सकती है तो बच्चों से लदे ऑटो की जांच क्यों नहीं?

परिवहन विभाग के अधिकारी सड़क पर उतरकर ओवरलोडिंग पर कार्रवाई कब करेंगे? ऑटो चालकों की मनमानी पर लगाम कौन लगाएगा?

और सबसे बड़ा सवाल—किसी बड़े हादसे से पहले व्यवस्था सुधरेगी या हादसे के बाद जिम्मेदारों की तलाश शुरू होगी? आखिर अब जिम्मेदार विभागों को जवाब देना होगा—क्योंकि मंडला की सड़कें मनमानी के लिए नहीं, सुरक्षित यातायात के लिए हैं।

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