दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला।राष्ट्रीय राजमार्ग-30 नाम सुनते ही सरकारी फाइलों में शायद विकास, कनेक्टिविटी और बेहतर आवागमन जैसे शब्द दिखाई देते होंगे। लेकिन इस सड़क पर सफर करने वाले राहगीरों से पूछिए तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। कहीं गड्ढे, कहीं उखड़ी सड़क, कहीं मरम्मत के नाम पर लीपापोती और कहीं सड़क की ऐसी हालत कि वाहन चालक सड़क पर वाहन चला रहा है या जोखिम भरे खेल में हिस्सा ले रहा है—समझना मुश्किल हो जाए।
जबलपुर से मंडला होते हुए छत्तीसगढ़ की ओर जाने वाला यह महत्वपूर्ण मार्ग रोजाना हजारों वाहनों का भार उठाता है। लेकिन सड़क की हालत और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। हाल के महीनों में इस मार्ग पर कई हादसे सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं।
*सड़क बनी तो सफर के लिए थी, परीक्षा के लिए नहीं*
NH-30 की हालत देखकर लगता है कि सड़क बनाने वालों ने शायद यह मान लिया कि सड़क पर चलने वालों को वाहन चलाने के साथ-साथ गड्ढों से बचने का प्रशिक्षण भी दिया गया होगा।
*राहगीर के सामने सवाल होता है गड्ढा किस तरफ से काटें?*
दाएं जाएं तो गड्ढा, बाएं जाएं तो उखड़ी सड़क, बीच में जाएं तो सामने से आता भारी वाहन।
ऐसे में वाहन चालक के पास एक ही विकल्प बचता है—भगवान का नाम लेकर आगे बढ़ो और उम्मीद करो कि मंजिल तक पहुंच जाओ।
*सिझौरा के पास फिर पलटा ट्रक*
इसी बीच सिझौरा के पास एक बार फिर ट्रक अनियंत्रित होकर पलट गया। बताया गया कि सड़क पर बने गड्ढे के कारण चालक का वाहन पर नियंत्रण बिगड़ा और ट्रक सड़क पर पलट गया।
गनीमत रही कि इस हादसे में जनहानि नहीं हुई। लेकिन सवाल यह है कि हर हादसे के बाद केवल “गनीमत” शब्द ही क्यों बचता है? क्या प्रशासन और संबंधित विभाग का काम भी हर हादसे के बाद केवल यह देखना है कि इस बार कितनी जानें बच गईं?
*हादसा हो तो चालक जिम्मेदार, सड़क खराब हो तो कौन?*
सरकारी व्यवस्था में सड़क हादसे के बाद अक्सर चालक की गति, लापरवाही या वाहन की तकनीकी खराबी की जांच शुरू हो जाती है। लेकिन जब सड़क पर गड्ढे हों, संकेतक पर्याप्त न हों, सड़क की सतह खराब हो और मरम्मत के नाम पर बार-बार पैबंद लगाए जाएं, तब सड़क की जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जनवरी 2026 से अब तक NH-30 पर मंडला जिले में कई हादसे सार्वजनिक रिपोर्टों में दर्ज हुए हैं।
जनवरी से अभी तक में अंजनिया घाट पर ट्रक अनियंत्रित होकर सड़क से नीचे जा गिरते हैं, जिसमें चालक और क्लीनर और राहगीर गंभीर रूप से घायल तो होते ही हैं साथ ही असमय काल के गाल में भी समा जाते हैं।
23 जनवरी को बंजारी घाट के पास अज्ञात ट्रक की टक्कर से बाइक चालक की मौत हुई और दो महिलाएं घायल हुईं।
4 अप्रैल को चारटोला के पास दो बाइकों की टक्कर में तीन युवकों की मौत और एक युवक के गंभीर घायल होने की खबर सामने आई।
6 जून को बीजाडांडी क्षेत्र में श्रद्धालुओं से भरी बस पलटने से 25 यात्री घायल हुए, जिनमें 11 गंभीर बताए गए।
19 जुलाई को ठोड़ा के पास बाइक सवार को बचाने के प्रयास में कार डिवाइडर से टकरा गई, जिसमें छात्रा सहित दो लोग घायल हुए।
आंकड़े तो ओर भी बहुत से हैं और सभी आंकड़े कहते हैं हादसे हो रहे हैं, सवाल पूछता है हाईवे
और विभाग?
विभाग के लिए सड़क शायद एक परियोजना है।ठेकेदार के लिए सड़क शायद एक ठेका है।फाइल के लिए सड़क शायद एक स्वीकृत राशि है।लेकिन आम आदमी के लिए सड़क क्या है?
*घर से निकलकर सुरक्षित घर लौटने का रास्ता।*
*यही फर्क शायद फाइलों और सड़क के बीच है।*
फाइल में सड़क पूरी हो सकती है, भुगतान पूरा हो सकता है, मरम्मत पूरी हो सकती है और प्रमाणपत्र भी जारी हो सकता है। मगर सड़क पर निकलते ही यदि वाहन चालक गड्ढों से बचने के लिए स्टेयरिंग घुमाता मिले, तो समझिए विकास अभी कागज से बाहर नहीं निकला है।
*मरम्मत ऐसी कि सड़क फिर मरम्मत मांगने लगे*
NH-30 की बदहाली का मुद्दा नया नहीं है। 2025 में भी मंडला से गुजरने वाले इस हाईवे की खराब हालत और मरम्मत के बाद दोबारा जर्जर होने को लेकर रिपोर्टें सामने आई थीं।
अब सवाल यह है कि यदि सड़क की मरम्मत के बावजूद हालत फिर खराब हो रही है तो उसकी गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या सड़क की गुणवत्ता की जांच हुई?क्या ठेकेदार की जवाबदेही तय हुई?क्या रखरखाव की निगरानी हुई?क्या गड्ढों की शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हुई?
या फिर व्यवस्था का सिद्धांत यही है कि
सड़क खराब होगी तो मरम्मत होगी,मरम्मत होगी तो फिर खराब होगी,और जब हादसा होगा तो कहा जाएगा—“चालक ने नियंत्रण खो दिया।”
*हादसों से पहले जागना जरूरी*
हर हादसे के बाद मौके पर पुलिस, एंबुलेंस और भीड़ पहुंच जाती है। लेकिन असली जरूरत हादसे के बाद पहुंचने की नहीं, हादसे से पहले पहुंचने की है।
संबंधित विभाग को NH-30 के मंडला जिले के संवेदनशील हिस्सों का तत्काल सुरक्षा ऑडिट कराना चाहिए। गड्ढों की मरम्मत, सड़क की गुणवत्ता, संकेतक, मोड़, घाट सेक्शन, डिवाइडर, सड़क किनारे सुरक्षा व्यवस्था और भारी वाहनों के लिए आवश्यक चेतावनी संकेतों की जांच होनी चाहिए।
क्योंकि सड़क हादसे को केवल “दुर्घटना” कहकर फाइल बंद कर देना आसान है। लेकिन यदि सड़क की खामी बार-बार हादसों का कारण बन रही है तो फिर सवाल दुर्घटना का नहीं, जिम्मेदारी का है।
*अब विभाग बताए—हाईवे कब बनेगा सुरक्षित?*
जनता को चमकती हुई सड़क का सपना नहीं चाहिए। उसे ऐसी सड़क चाहिए जिस पर घर से निकलने के बाद परिवार को यह चिंता न करनी पड़े कि वाहन वापस आएगा या केवल उसकी खबर।
NH-30 कोई रेसिंग ट्रैक नहीं है।यह जनता का रास्ता है।इस पर गड्ढे नहीं, जिम्मेदारी दिखाई देनी चाहिए।
अब देखना यह है कि संबंधित विभाग हादसों के आंकड़े बढ़ने का इंतजार करता है या उससे पहले सड़क की हालत सुधारकर यह साबित करता है कि नेशनल हाईवे वास्तव में हाईवे है—हादसों का हाईवे नहीं।
