जिस कार्यप्रणाली और संपत्ति को लेकर उठाए थे सवाल, अब जांच एजेंसी के रडार पर वही नाम—6.43 करोड़ की संपत्ति जांच के घेरे में, वैध आय करीब एक करोड़ बताई जा रही
दैनिक रेवांचल टाईम्स - सिवनी। भ्रष्टाचार के खिलाफ सवाल उठाना और व्यवस्था के सामने आईना रखना ही पत्रकारिता का मूल दायित्व है। रेवांचल टाइम्स ने पंचायत राज प्रशिक्षण केंद्र में पदस्थ सहायक ग्रेड-2 सुभाष शर्मा की कार्यप्रणाली, कथित अनियमितताओं और उनकी संपत्तियों को लेकर समय-समय पर सवाल उठाए थे। अब लोकायुक्त जबलपुर की आय से अधिक संपत्ति मामले में हुई कार्रवाई ने उन्हीं सवालों को एक बार फिर गंभीर जांच के केंद्र में ला खड़ा किया है।
शनिवार सुबह करीब साढ़े पांच बजे लोकायुक्त जबलपुर की टीम ने सुभाष शर्मा के सिवनी और पाटन स्थित ठिकानों पर दबिश दी। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार करीब 6.43 करोड़ रुपये की संपत्ति जांच के दायरे में सामने आई है, जबकि उनकी वैध आय करीब एक करोड़ रुपये बताई जा रही है। हालांकि संपत्तियों, दस्तावेजों और आय के स्रोतों का वास्तविक आकलन जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
जब मीडिया के सवालों को नजरअंदाज किया गया, अब जांच एजेंसी दरवाजे पर
रेवांचल टाइम्स ने जब सुभाष शर्मा की कार्यप्रणाली और संपत्तियों को लेकर सवाल उठाए थे, तब क्या संबंधित विभाग ने उन सवालों को गंभीरता से लिया? क्या किसी स्तर पर उनकी संपत्तियों और आय के स्रोतों की जांच कराई गई? यदि नहीं, तो आखिर क्यों?
आज लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद यही सवाल और अधिक गंभीर हो गए हैं। यदि किसी कर्मचारी की घोषित/ज्ञात आय और सामने आने वाली संपत्तियों के बीच बड़ा अंतर जांच में प्रमाणित होता है, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रहेगा, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र पर भी सवाल खड़े करेगा जिसने वर्षों तक ऐसी परिस्थितियों पर निगरानी क्यों नहीं रखी।
करोड़ों की संपत्ति—अब सिर्फ कागज नहीं, हर दस्तावेज की जांच जरूरी
लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद अब जांच एजेंसी के सामने कई अहम सवाल हैं—
संपत्तियां किन लोगों के नाम पर हैं?
इनके खरीदने के लिए धन का स्रोत क्या था?
संपत्तियों का निर्माण कब और किस आय से हुआ?
बैंक खातों और वित्तीय लेन-देन में क्या सामने आता है?
क्या चल-अचल संपत्तियों की जानकारी विभागीय रिकॉर्ड से मेल खाती है?
क्या परिवार अथवा अन्य संबंधित लोगों के नाम पर भी ऐसी संपत्तियां हैं?
पंचायत राज प्रशिक्षण केंद्र में पदस्थापना और कार्यकाल के दौरान लिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों की भी जांच होगी या नहीं?
क्या इस मामले में किसी अन्य अधिकारी, कर्मचारी या निजी व्यक्ति की भूमिका सामने आती है?
भ्रष्ट तंत्र के लिए चेतावनी या सिर्फ एक कार्रवाई?
लोकायुक्त की कार्रवाई निश्चित रूप से जांच का महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है। सवाल केवल यह नहीं कि सुभाष शर्मा के यहां क्या मिला, सवाल यह है कि इतनी संपत्तियां यदि जांच में आय से अधिक पाई जाती हैं तो वे बनी कैसे और वर्षों तक संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था क्या करती रही?
किसी एक कर्मचारी पर कार्रवाई कर देना आसान है, लेकिन उस व्यवस्था की जिम्मेदारी तय करना ज्यादा जरूरी है जिसमें कथित अनियमितताओं के बावजूद सवाल उठने तक कोई प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं देती।
जांच की आंच ऊपर तक पहुंचेगी या बीच रास्ते में थम जाएगी?
अब निगाह लोकायुक्त और संबंधित जांच एजेंसियों पर है। क्या जांच केवल संपत्तियों के आंकड़े जुटाने तक सीमित रहेगी या संपत्ति अर्जित करने के संभावित स्रोत, वित्तीय लेन-देन, विभागीय कार्यप्रणाली और उससे जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी गहराई से पड़ताल होगी?
रेवांचल टाइम्स द्वारा पहले उठाए गए सवालों की अब जांच के संदर्भ में प्रासंगिकता और बढ़ गई है। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़े तथा दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
अब जनता का सवाल सीधा है—अगर करोड़ों की संपत्ति का हिसाब जांच में सामने आता है तो सिर्फ संपत्ति की जांच क्यों? उस तंत्र की भी जांच होनी चाहिए जिसने वर्षों तक इस संपत्ति के बढ़ते दायरे को देखने के बावजूद आंखें बंद रखीं।
लोकायुक्त की यह कार्रवाई अंत नहीं, उस पूरे भ्रष्टाचार तंत्र की पड़ताल की शुरुआत बननी चाहिए।

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