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घुघरी में अवैध कॉलोनियों का खेल या प्रशासन की आंखों पर पट्टी?



*बिना अनुमति प्लॉटिंग के आरोप, कार्रवाई के नाम पर खामोशी; आरटीआई में जानकारी मांगते ही पूछा गया “जनहित क्या है?”*


*राजस्व अमले की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है कॉलोनियों का कारोबार?*


दैनिक रेवांचल टाइम्स | घुघरी, मंडला। तहसील मुख्यालय घुघरी में इन दिनों जमीन की कीमतों के साथ-साथ कथित अवैध प्लॉटिंग का बाजार भी गर्म होने की चर्चाएं हैं। शहर और आसपास के इलाकों में कृषि एवं अन्य भूमि पर भूखंड काटकर उनकी खरीद-फरोख्त किए जाने के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। स्थानीय लोगों का सवाल है कि यदि यह सब नियम-कायदों के दायरे में हो रहा है तो प्रशासन को इसकी जानकारी देने में आखिर परेशानी क्या है और यदि नियमों की अनदेखी हो रही है तो कार्रवाई क्यों नहीं?

मामला सिर्फ प्लॉट काटने तक सीमित नहीं है। असली सवाल तो यह है कि जिस जमीन पर कॉलोनी विकसित की जा रही है, क्या उसका वैध डायवर्जन है? क्या कॉलोनी विकास की आवश्यक अनुमति ली गई है? क्या लेआउट स्वीकृत है? क्या सड़क, नाली, बिजली, पानी सहित मूलभूत सुविधाओं के संबंध में निर्धारित प्रावधानों का पालन किया गया है?

  इन सवालों के जवाब आम जनता चाहती है, लेकिन घुघरी के राजस्व कार्यालय की कथित चुप्पी ने सवालों को और गहरा कर दिया है।


*जानकारी मांगने पहुंचे तो मौखिक जवाब से भी परहेज!*


मामले की पड़ताल के लिए दैनिक रेवांचल टाइम्स के घुघरी प्रतिनिधि द्वारा अनुविभागीय राजस्व कार्यालय पहुंचकर संबंधित कॉलोनियों और उनकी वैधता को लेकर जानकारी चाही गई। लेकिन आरोप है कि संबंधित अधिकारी ने मौखिक रूप से जानकारी देने से इनकार कर दिया।

इसके बाद अखबार के प्रतिनिधि द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत संबंधित कॉलोनियों की वैधता, अनुमति, भूमि उपयोग परिवर्तन, स्वीकृतियों और अन्य दस्तावेजों से संबंधित जानकारी मांगी गई।


*यहीं से मामला और दिलचस्प हो गया।*


बताया जाता है कि इसके बाद राजस्व कार्यालय के एक कर्मचारी का फोन आया और कथित तौर पर कहा गया कि “साहब पूछ रहे हैं, यह जानकारी लेने से पहले आपको जनहित का मुद्दा बताना पड़ेगा।” अब सवाल यह है कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी के लिए आवेदक से इस प्रकार का सवाल किस नियम के तहत पूछा जा रहा है? यदि मांगी गई जानकारी शासकीय अभिलेखों में उपलब्ध है और कानून के तहत अपवाद की श्रेणी में नहीं आती, तो जानकारी देने में इतनी हिचकिचाहट क्यों.? क्या अब सरकारी रिकॉर्ड की जानकारी लेने के लिए पहले यह प्रमाणित करना पड़ेगा कि सवाल जनहित में है या नहीं?


*साहब की जानकारी या जानकारी देने से बचने की कोशिश?*


घुघरी के राजस्व कार्यालय से कथित तौर पर आए फोन ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। सवाल यह भी है कि यदि जानकारी देना नियमसम्मत है तो “साहब पूछ रहे हैं” जैसी स्थिति पैदा होने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी?


क्या कार्यालय में सूचना देने की कोई निर्धारित प्रक्रिया है या फिर हर जानकारी देने से पहले मौखिक अनुमति की आवश्यकता पड़ती है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यदि संबंधित कॉलोनियां पूरी तरह वैध हैं तो उनके दस्तावेज सार्वजनिक करने में आखिर परेशानी क्या है? क्यों नहीं प्रशासन सामने आकर बता देता कि अमुक भूमि पर अमुक अनुमति के तहत कॉलोनी विकसित की जा रही है और इसमें किसी प्रकार की अनियमितता नहीं है?

  इससे न केवल प्रशासन की पारदर्शिता साबित होगी, बल्कि उन लोगों को भी राहत मिलेगी जिन्होंने अपनी जिंदगी भर की कमाई लगाकर इन कॉलोनियों में प्लॉट खरीदे हैं।


*अखबारों में खबरें आती रहीं, कार्रवाई कहां गई?*


घुघरी क्षेत्र में कथित अवैध प्लॉटिंग का मुद्दा कोई नया नहीं है। समय-समय पर समाचार पत्रों के माध्यम से भी इस प्रकार की गतिविधियों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय स्तर पर शिकायतों और चर्चाओं का दौर भी चलता रहा है। लेकिन सवाल यह है कि खबरें आती रहीं और फाइलें कहां जाती रहीं? यदि शिकायतें गलत थीं तो संबंधित विभाग ने जांच कर यह स्पष्ट क्यों नहीं किया कि प्लॉटिंग पूरी तरह वैध है? और यदि शिकायतों में दम था तो जिम्मेदार कॉलोनाइजरों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

   कहीं ऐसा तो नहीं कि शिकायत से लेकर जांच और जांच से लेकर कार्रवाई तक सरकारी प्रक्रिया इतनी लंबी है कि तब तक अवैध कॉलोनी पूरी तरह विकसित होकर वैध दिखने लगे?


*उपजाऊ जमीन पर प्लॉटिंग का बढ़ता खेल!*


स्थानीय सूत्रों के अनुसार मंडला जिले के कई क्षेत्रों में उपजाऊ कृषि भूमि को छोटे-छोटे भूखंडों में बांटकर बेचने का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। कथित रूप से कम कीमत में जमीन खरीदकर उसे प्लॉटिंग के माध्यम से अधिक कीमत पर बेचने का खेल चल रहा है।


ग्राहकों को सड़क, बिजली, पानी और बेहतर भविष्य के सपने दिखाए जाते हैं। लेकिन जब खरीदार प्लॉट खरीद लेता है और बाद में निर्माण अथवा अन्य प्रक्रिया के दौरान कानूनी अड़चन सामने आती है, तब उसे पता चलता है कि जिस जमीन को उसने “अपना आशियाना” समझकर खरीदा था, उसकी वैधानिक स्थिति ही स्पष्ट नहीं है। ऐसे मामलों में सबसे बड़ा नुकसान आम आदमी का होता है।

कॉलोनाइजर पैसा लेकर निकल जाता है, लेकिन खरीदार कागज लेकर कार्यालयों के चक्कर काटता रहता है।


*जब सब “ओके” है तो सूचना बोर्ड क्यों नहीं?*


घुघरी में चल रही कथित प्लॉटिंग को लेकर जनता का एक सीधा सवाल है—


यदि कॉलोनी पूरी तरह वैध है तो कॉलोनी में स्पष्ट सूचना बोर्ड क्यों नहीं लगाया जाता?


भूमि का सर्वे नंबर क्या है?

भूमि का उपयोग क्या है?

डायवर्जन हुआ है या नहीं?

कॉलोनी का लेआउट किस विभाग ने स्वीकृत किया?

स्वीकृति क्रमांक क्या है?

कॉलोनाइजर कौन है?

कौन-कौन सी अनुमतियां प्राप्त हैं?


यदि यह तमाम जानकारी नियमानुसार उपलब्ध है तो उसे सार्वजनिक करने में आखिर हर्ज क्या है?


*जनता पूछ रही—कार्रवाई कब होगी?*


अब सवाल सिर्फ एक-दो कॉलोनियों का नहीं है। सवाल प्रशासनिक पारदर्शिता का है।


यदि घुघरी में अवैध कॉलोनियां नहीं काटी जा रही हैं तो प्रशासन जांच कर स्थिति स्पष्ट करे।


यदि अवैध प्लॉटिंग हो रही है तो जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई करे। और यदि मामला जांच के अधीन है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक की जाए। क्योंकि साहब की चुप्पी हमेशा संदेह को जन्म देती है। आम आदमी यह जानना चाहता है कि उसने जिस जमीन पर अपना घर बनाने का सपना देखा है, वह जमीन भविष्य में उसके लिए परेशानी का कारण तो नहीं बनेगी।


*सबसे बड़ा सवाल यही—*


घुघरी में कॉलोनियां नियम से कट रही हैं या नियमों को काटकर कॉलोनियां बनाई जा रही हैं?


अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक है तो दस्तावेज सामने रखिए।

अगर नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कार्रवाई कीजिए।

और अगर दोनों नहीं हो रहा है, तो फिर जनता पूछने को मजबूर हैं आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है यह प्लॉटिंग का खेल?


अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं कि वह घुघरी में विकसित हो रही कथित कॉलोनियों की निष्पक्ष जांच कराकर स्थिति स्पष्ट करता है या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों में दबे उन सवालों की सूची में शामिल हो जाएगा, जिनके जवाब जनता आज भी तलाश रही है।


क्या कहते हैं जिम्मेदार


आपके द्वारा जो जानकारी मांगी गई हैं वो अस्पष्ट हैं आप लिखित में कोई एक जगह चिन्हित कर दीजिए में आपको जानकारी उपलब्ध करवा दूंगा।

                   सचिन जैन 

        एसडीएम घुघरी मंडला

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