दैनिक रेवांचल टाइम्स | नैनपुर, मंडला"किसी अस्पताल की असली पहचान दीवार पर टंगे प्रमाणपत्रों से नहीं, बल्कि मरीज के चेहरे पर लौटती मुस्कान से होती है।" लेकिन नैनपुर सिविल अस्पताल को लेकर उठ रहे सवाल यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर प्रदेश में नंबर-1 का तमगा जमीनी हकीकत का आईना है या सिर्फ कागजी उपलब्धि?
नैनपुर सिविल अस्पताल को एनक्यूएस (National Quality Assurance Standards) में प्रदेश में प्रथम स्थान मिला। यह सम्मान निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन सम्मान के साथ जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। यदि अस्पताल वास्तव में प्रदेश का सर्वश्रेष्ठ है, तो फिर स्थानीय लोगों के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर इतने गंभीर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
सबसे बड़ा सवाल उन बांडेड डॉक्टरों को लेकर है, जिन पर आरोप हैं कि वे महीने में सीमित दिन अस्पताल आते हैं, लेकिन उपस्थिति और वेतन पूरे महीने का बनता है। यदि ये आरोप निराधार हैं, तो स्वास्थ्य विभाग को बायोमेट्रिक रिकॉर्ड, 'सार्थक' ऐप की उपस्थिति, ड्यूटी रोस्टर, सीसीटीवी फुटेज और ओपीडी रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध कराने चाहिए। पारदर्शिता होगी तो संदेह अपने आप समाप्त हो जाएगा। भोपाल में हुई कार्रवाई, तो नैनपुर में जांच क्यों नहीं?
भोपाल में हाल ही में 'सार्थक' ऐप के जरिए फर्जी उपस्थिति का मामला सामने आया था, जहां जांच में अनियमितताएं उजागर हुईं और कार्रवाई भी हुई। इससे स्पष्ट है कि डिजिटल व्यवस्था भी दुरुपयोग से अछूती नहीं है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि नैनपुर सहित अन्य सरकारी अस्पतालों में स्वतंत्र ऑडिट क्यों नहीं कराया जाता?
जनता पूछ रही है ये सवाल...
सोनोग्राफी मशीन होने के बावजूद मरीजों को निजी केंद्रों पर क्यों भेजा जाता है?
पैथोलॉजी विशेषज्ञ बीएमओ होने के बावजूद आज तक ब्लड बैंक क्यों शुरू नहीं हो पाया?
रक्त की आवश्यकता होने पर मरीजों को मंडला क्यों भटकना पड़ता है?
झोलाछाप चिकित्सकों और अवैध पैथोलॉजी लैब पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
यदि सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस प्रतिबंधित है, तो उसकी निगरानी कौन कर रहा है? यदि अस्पताल प्रदेश में नंबर-1 है, तो आम मरीजों को हर सुविधा स्थानीय स्तर पर क्यों नहीं मिल रही? पुरस्कार से बड़ा है जनता का विश्वास सरकारी नियम स्पष्ट हैं कि सरकारी चिकित्सक बिना अनुमति निजी प्रैक्टिस नहीं कर सकते, बांडेड डॉक्टरों को नियमित सेवा देना अनिवार्य है और चिकित्सा सेवाएं निर्धारित मानकों के अनुरूप ही संचालित होनी चाहिए। यदि कहीं इन नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो उसकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।
स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि वह केवल पुरस्कारों का जश्न मनाने तक सीमित न रहे, बल्कि अस्पताल की व्यवस्थाओं की स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच भी कराए। क्योंकि जनता को कागजों पर नंबर-1 अस्पताल नहीं, बल्कि ऐसा अस्पताल चाहिए जहां डॉक्टर समय पर मिलें, जांच की सुविधाएं उपलब्ध हों, ब्लड बैंक संचालित हो और मरीज को इलाज के लिए भटकना न पड़े।
जनहित का सवाल यही है—
"जनता को दीवार पर टंगा 'प्रदेश में प्रथम' का बोर्ड नहीं चाहिए, बल्कि अस्पताल में उपलब्ध डॉक्टर, समय पर इलाज, ब्लड बैंक, पारदर्शी व्यवस्था और जवाबदेह स्वास्थ्य तंत्र चाहिए। यदि सुविधाएं कागजों में हैं और मरीज परेशान हैं, तो 'नंबर-1' का तमगा भी सवालों के घेरे में रहेगा।"
