खुलासा | विशेष प्रतिनिधि अवधेश सिह की रिपोर्ट
25 साल का हिसाब धुंधला, करोड़ों के जेवरातों का रिकॉर्ड गायब! ट्रस्ट, प्रशासन और जवाबदेही पर बड़े सवाल आख़िर कहाँ है ट्रस्ट के ज़िम्मेदार
दैनिक रेवांचल टाइम्स | अमरकंटक जिस मां नर्मदा के उद्गम स्थल पर श्रद्धालु अपनी आस्था, आभूषण और दान अर्पित करते हैं, उसी पवित्र धरोहर के संरक्षण को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि सामने आए आरोप और उपलब्ध तथ्यों में सच्चाई है, तो मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं बल्कि सार्वजनिक न्यास (पब्लिक ट्रस्ट) की जवाबदेही, वित्तीय पारदर्शिता और भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए भी गंभीर चिंता का विषय बन सकता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या करोड़ों रुपये के दान और सोना-चांदी के जेवरात बिना समुचित अभिलेखों (रिकॉर्ड) और निर्धारित प्रक्रिया के वर्षों तक संचालित होते रहे? यदि हां, तो जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी?
*थाना कह रहा- "हमारे पास कुछ नहीं", ट्रस्ट कह रहा- "सब थाने में है"*
पूरा विवाद तब और गंभीर हो गया जब ट्रस्ट प्रबंधन ने दावा किया कि मंदिर के बहुमूल्य जेवरात सुरक्षा के लिए थाने में रखे जाते रहे हैं। वहीं अमरकंटक थाना प्रभारी एल.बी. तिवारी ने स्पष्ट कहा कि थाने में ट्रस्ट के जेवरात या नकदी जमा होने का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
*अब सवाल यह है कि—*
यदि जेवरात थाने में नहीं हैं तो आखिर कहां हैं?
यदि थाने में हैं तो उसकी रसीद, मालखाना रजिस्टर और जब्ती/जमा प्रविष्टि कहां है?
दोनों में से कौन सच बोल रहा है?
यदि दोनों पक्षों के बयान परस्पर विरोधी हैं, तो निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है।
*कोषाध्यक्ष बोले- "जानकारी नहीं", फिर जवाबदेही किसकी?*
नगर परिषद अमरकंटक के सीएमओ एवं ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष चैन सिंह परस्ते ने स्वीकार किया कि उन्हें यह जानकारी नहीं है कि जेवरात कब, किस आदेश से और किस प्रक्रिया के तहत थाने भेजे जाते थे। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी माना कि ट्रस्ट के पास जेवरातों की संपूर्ण सूची और व्यवस्थित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
प्रश्न उठता है कि जब कोषाध्यक्ष को ही जानकारी नहीं, तो फिर वर्षों से करोड़ों की संपत्ति की निगरानी कौन कर रहा था?
*रिकॉर्ड नहीं, नियम नहीं... फिर करोड़ों का हिसाब कैसे?*
ट्रस्ट का संचालन नगर परिषद के माध्यम से किया जा रहा है, लेकिन स्वयं नगर परिषद के पास दान, जेवरात और उनकी सुरक्षा का समुचित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं बताया जा रहा।
यदि यह स्थिति सही है, तो यह केवल प्रशासनिक कमी नहीं बल्कि वित्तीय नियंत्रण प्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है।
*सीसीटीवी बंद... क्या पारदर्शिता भी बंद?*
दान पेटियों की गिनती जिस प्रसादी कक्ष में की जाती है, वहां लगे सीसीटीवी कैमरे बंद पाए जाने का दावा किया जा रहा है।
आज जब सरकारी कार्यालयों से लेकर बैंकों तक हर संवेदनशील प्रक्रिया कैमरे की निगरानी में होती है, तब करोड़ों की आस्था से जुड़े चढ़ावे की गिनती बिना प्रभावी निगरानी के क्यों?
*क्या यह मात्र संयोग है या व्यवस्था की गंभीर विफलता?*
हस्ताक्षर बाद में... गिनती पहले?
मंदिर के पुजारी दुर्गेश द्विवेदी ने आरोप लगाया है कि दान पेटी खोलने के समय जिन सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य होती है, वे कई बार मौके पर मौजूद नहीं रहते और बाद में रजिस्टर पर हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं।
यदि यह आरोप सही पाया जाता है तो यह पूरी गिनती प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा करता है।
*रजिस्टरों में वाइटनर और कटिंग... आखिर क्यों?*
दान से संबंधित रजिस्टरों में वाइटनर और कटिंग होने के आरोप भी सामने आए हैं।
सरकारी अभिलेखों में इस प्रकार की काट-छांट सामान्य प्रक्रिया नहीं मानी जाती। यदि सुधार आवश्यक भी हो, तो उसके लिए निर्धारित नियम और प्रमाणित प्रक्रिया होती है।
*कानूनी नजरिए से मामला कितना गंभीर?*
यदि जांच में रिकॉर्ड गायब होना, वित्तीय अनियमितता या संपत्ति का गलत प्रबंधन सिद्ध होता है तो निम्न कानूनी प्रावधान लागू हो सकते हैं—
*भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अंतर्गत*.. आपराधिक विश्वासघात, रिकॉर्ड से छेड़छाड़, सार्वजनिक संपत्ति के दुरुपयोग और धोखाधड़ी से जुड़े प्रावधान।*
*मध्यप्रदेश सार्वजनिक न्यास अधिनियम, 1951 के तहत*... ट्रस्ट संपत्ति के संरक्षण और लेखा-जोखा की जवाबदेही।*
वित्तीय अनियमितता पाए जाने पर विभागीय जांच, विशेष ऑडिट तथा आर्थिक अपराध शाखा (EOW) या सक्षम एजेंसी से जांच की मांग भी उठ सकती है।
(अंतिम कानूनी निष्कर्ष सक्षम जांच एजेंसी और न्यायालय के निर्णय पर निर्भर करेगा।)
*दैनिक रेवांचल टाइम्स और दानदाताओं के साथ ही श्रद्धालुओं का सबसे बड़ा सवाल...*
1करोड़ों के दान का ऑडिट किसने किया?
2 25 वर्षों का पूरा हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं?
3 जेवरातों की डिजिटल सूची क्यों नहीं बनाई गई?
4 सीसीटीवी बंद क्यों मिले?
रिकॉर्ड गायब होने पर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
5 यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ, तो दस्तावेज सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों?
अब सवाल यह उठता हैं कि जिस मां नर्मदा के चरणों में श्रद्धालु अपनी श्रद्धा सौंपते हैं, क्या उस श्रद्धा का हिसाब भी अब "भगवान भरोसे" है?
यदि आस्था की रक्षा करने वाले ही रिकॉर्ड नहीं संभाल पाए, तो फिर सवाल केवल जेवरातों का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में औपचारिक जांच कर सच्चाई सामने लाता है या फिर यह पूरा प्रकरण भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा।



