Breaking

revanchal times new

पशुओं का आधार जनता के लिए जरूरी, लेकिन साहब की गायों के लिए जरूरी नहीं.? साहब की मनमानी विभाग और जनता दोनों त्रस्त



*नियमों पर उठे सवाल?*


दैनिक रेवांचल टाइम्स मंडला |

मंडला जिले में पशुपालन विभाग वर्षों से पशुओं की टैगिंग, पंजीयन, कृत्रिम गर्भाधान, टीकाकरण और नस्ल सुधार जैसी योजनाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार करता रहा है। गांव-गांव जाकर पशुपालकों को समझाया जाता है कि बिना टैग और पंजीयन के पशुधन का रिकॉर्ड अधूरा माना जाएगा। लेकिन अब सवाल तब खड़े हो रहे हैं, जब आरोप विभाग के शीर्ष अधिकारी के अपने पशुधन पर ही लग रहे हैं।

वही चर्चा है कि पशुपालन विभाग एव डेरी विभाग के उपसंचालक के निवास पर मौजूद गायों में टैग नहीं लगे हैं और उनका विवरण विभाग के पशुधन (INAPH/संबंधित) रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है। यदि यह तथ्य सही है, तो सबसे पहला प्रश्न यही उठता है कि क्या नियम केवल आम पशुपालकों के लिए बनाए गए हैं, जबकि विभागीय अधिकारियों पर उनका पालन आवश्यक नहीं?

हास्यास्पद बात तो यह है कि विभाग गांव-गांव जाकर कहता है—"हर पशु की पहचान जरूरी है", लेकिन यदि साहब की गायों की पहचान ही सरकारी रिकॉर्ड में न मिले तो फिर यह अभियान किसके लिए चल रहा है? क्या सरकारी नियम भी अब पद देखकर लागू होंगे?

वही जानकारी के अनुसार इतना ही नहीं, जिले में कृत्रिम गर्भाधान (एआई) और टीकाकरण के आंकड़ों को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। 

     जहां बैगा आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में कई पशुपालकों का कहना है कि उन्हें योजनाओं की पूरी जानकारी तक नहीं दी जाती। और विभाग में मनमानी चल रही हैं, यदि कहीं बिना वास्तविक सेवा दिए केवल कागजों में उपलब्धियां दर्ज की जा रही हैं, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है और इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।


वही सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि जिन पशुओं के नाम पर विभाग योजनाओं का लाभ, टीकाकरण, कृत्रिम गर्भाधान या अन्य सेवाओं का दावा करता है, क्या उनका भौतिक सत्यापन किया जाता है? क्या सभी पशुओं का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, टीकाकरण और रिकॉर्ड अद्यतन है? यदि नहीं, तो सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है।


अब आवश्यकता केवल सफाई देने की नहीं, बल्कि तथ्यों के साथ जवाब देने की है। यदि मंडला उपसंचालक के निजी पशुओं का टैगिंग, पंजीयन, टीकाकरण और कृत्रिम गर्भाधान संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध है, तो उसे सार्वजनिक किया जाए। और यदि रिकॉर्ड नहीं है, तो विभाग स्पष्ट करे कि जिन नियमों का पालन वह जनता से करवाता है, उनका पालन स्वयं क्यों नहीं हुआ?


जनता यह भी जानना चाहती है कि जिले में पिछले वर्षों में हुए कृत्रिम गर्भाधान, टैगिंग और टीकाकरण के दावों का स्वतंत्र सामाजिक एवं तकनीकी ऑडिट कब होगा। क्योंकि सरकारी योजनाएं आंकड़ों से नहीं, धरातल पर दिखाई देने वाले परिणामों से सफल मानी जाती हैं।


सवाल यह है कि यदि "साहब की गाय" भी सरकारी रिकॉर्ड में गुम हो जाए, तो फिर गांव के किसान की गाय का हिसाब कौन रखेगा? और यदि नियमों की घंटी दूसरों के गले में ही बंधे, तो जवाबदेही की घंटी आखिर बजेगी किसके दरवाजे पर?

Post a Comment

Previous Post Next Post