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बिनैका पंचायत में भ्रष्टाचार पर जिला पंचायत का बड़ा प्रहार



वित्तीय अनियमितता पद का दुरुपयोग भ्रष्टाचार ग़बन सिद्ध, सरपंच-सचिव से होगी 493942.00 लाख की वसूली


15 दिन में राशि जमा नहीं की तो 30 दिन का सिविल कारावास, सरपंच पर अलग से कार्रवाई और सचिव पर विभागीय जांच के आदेश


दैनिक रेवांचल टाइम्स - मंडला, जिले मुख्यालय से लगी ग्राम पंचायत बिनेका में भ्रष्टाचार गबन घोटाले चरम पर, जैसे तेसे जाच तो हुई पर केवल मुंह देखा देखी की गई है और उन्हें राशि जमा कर इतिश्री कर ली गई वही सरपंच सचिव की शिकायत में वित्तीय अनियमितताओं और शासकीय धन के दुरुपयोग पर आखिरकार जिला पंचायत का शिकंजा कसना शुरू हो गया है। ग्राम पंचायत बिनैका में सामने आए वित्तीय गड़बड़ी के मामले में जिला पंचायत मण्डला के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के न्यायालय ने बड़ा और कड़ा फैसला सुनाते हुए तत्कालीन सरपंच श्रीमती अनुसुईया एवं सचिव  विपिन पटैल को शासकीय राशि के दुरुपयोग का दोषी माना है। पर निर्माण कार्य में राशि आहरण और मूलायांकन करने वाले उपयंत्री को बक्सा दिया गया क्यो वही न्यायालय ने मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 की धारा 92 के तहत दोनों से कुल 4 लाख 93 हजार 942 रुपये की वसूली के आदेश जारी किए हैं। वही बिनेका सरपंच श्रीमती अनुसुइया बाई को 2 लाख 46 हजार 9 सौ 71 रुपये एव ग्राम पंचायत बिनेका के सचिव विपिन पटैल 2 लाख 46 हजार 9 सौ 71 रुपये शासकीय कोष में जमा करने होंगे।


इतना ही नहीं, न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि 15 दिनों के भीतर राशि जमा नहीं की गई तो दोनों के विरुद्ध 30 दिन के सिविल कारावास की कार्रवाई की जाएगी। यह आदेश जिले की अन्य ग्राम पंचायतों के लिए भी एक कड़ा संदेश माना जा रहा है कि शासकीय धन में गड़बड़ी करने वालों को अब किसी भी स्तर पर राहत नहीं मिलेगी।


शिकायत से खुला सरकारी धन की लूट और भ्रष्टाचार का पूरा खेल


वही यह पूरा मामला मंडला मुख्यालय से लगी ग्राम बिनैका का है जहाँ ग्राम बिनेका के निवासी विजय चौरसिया द्वारा की गई शिकायत के बाद सामने आया। शिकायत मिलने पर जनपद पंचायत स्तर पर विस्तृत जांच कराई गई। जांच के दौरान पंचायत के अभिलेखों, वित्तीय दस्तावेजों और विकास कार्यों की पड़ताल की गई, जिसमें कई वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताएं उजागर हुईं।


जांच प्रतिवेदन के आधार पर मामला जिला पंचायत न्यायालय में पहुंचा, जहां दोनों पक्षों को सुनने के बाद उपलब्ध दस्तावेजों एवं साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय ने सरपंच और सचिव को दोषी ठहराया।


ग्रामसभा को अंधेरे में रखकर खर्च की गई राशि


जांच में यह तथ्य सामने आया कि पंचायत की आय-व्यय संबंधी जानकारी ग्रामसभा और पंचायत बैठकों में नियमित रूप से अनुमोदित नहीं कराई गई। पंचायत राज व्यवस्था में ग्रामसभा को सर्वोच्च संस्था माना जाता है, लेकिन यहां वित्तीय निर्णयों में पारदर्शिता नहीं बरती गई। बल्कि सरपंच सचिव के द्वारा नियंम क़ानून को ताक में रख पद दुरूपयोग कर शासकीय राशि में लूट मंचा दी 


आरोप है कि पंचायत स्तर पर विकास कार्यों और खर्च का लेखा-जोखा नियमानुसार ग्रामसभा के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे ग्रामीणों को वास्तविक वित्तीय स्थिति की जानकारी ही नहीं मिल सकी।


नल-जल योजना में नियमों की खुली अनदेखी


जांच में सबसे गंभीर अनियमितता नल-जल योजना में सामने आई। न्यायालय के आदेश के अनुसार जलकर के रूप में प्राप्त राशि को पंचायत के बैंक खाते में जमा करने के बजाय सीधे नगद खर्च कर दिया गया। यह वित्तीय नियमों का स्पष्ट उल्लंघन माना गया।

इसके अलावा पाइप लाइन मरम्मत एवं विस्तार कार्यों में निर्धारित मूल्यांकन से अधिक भुगतान किया गया। कई भुगतान ऐसे पाए गए जिनका समुचित तकनीकी परीक्षण एवं प्रशासनिक अनुमोदन उपलब्ध नहीं था।


बिना स्वीकृति खर्च, अभिलेख भी नहीं मिले


मोटर पम्प सुधार कार्य, पम्प हाउस संधारण और अन्य मदों में भी बिना विधिवत स्वीकृति के खर्च किए जाने की बात जांच में सामने आई। कई मामलों में संबंधित बिल, वाउचर, माप पुस्तिका एवं अन्य आवश्यक अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए जा सके।


न्यायालय ने माना कि जब खर्च का समर्थन करने वाले दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं हैं तो शासकीय राशि के उपयोग को वैध नहीं माना जा सकता। यही कारण रहा कि संबंधित राशि की वसूली का आदेश जारी किया गया।


स्वच्छ भारत अभियान की राशि भी हुई बर्बाद


मामले में केवल वित्तीय गड़बड़ी ही नहीं बल्कि सरकारी संपत्तियों की अनदेखी भी सामने आई। स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत निर्मित नाडेप संरचना को सुरक्षित रखने के बजाय उसे नष्ट होने दिया गया।


न्यायालय ने इसे शासकीय धन का अपव्यय माना और इसकी जिम्मेदारी भी तत्कालीन सरपंच एवं सचिव पर तय की। यह टिप्पणी बताती है कि केवल धन खर्च कर देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उससे निर्मित परिसंपत्तियों का संरक्षण करना भी पंचायत की जिम्मेदारी है।


15 दिन की मोहलत, नहीं तो जेल


मुख्य कार्यपालन अधिकारी के न्यायालय ने आदेश दिया है कि दोनों आरोपित 15 दिनों के भीतर निर्धारित राशि जिला पंचायत के शासकीय कोष में जमा कर उसकी रसीद प्रस्तुत करें।

यदि तय समय सीमा में राशि जमा नहीं की जाती है तो मध्यप्रदेश पंचायतीराज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 की धारा 92 के तहत 30 दिन के सिविल कारावास की कार्रवाई की जाएगी। इससे स्पष्ट है कि न्यायालय ने इस मामले में नरमी बरतने के बजाय सख्त रुख अपनाया है।


सरपंच पर अलग प्रकरण, सचिव पर विभागीय कार्रवाई


न्यायालय ने केवल वसूली तक ही मामला सीमित नहीं रखा। आदेश में तत्कालीन सरपंच श्रीमती अनुसुईया के विरुद्ध अधिनियम की धारा 40 के तहत पृथक प्रकरण दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं।


वहीं तत्कालीन सचिव विपिन पटैल के विरुद्ध मध्यप्रदेश पंचायत सेवा (अनुशासन तथा अपील) नियम, 1999 के तहत विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रारंभ करने के आदेश भी जारी किए गए हैं। इससे दोनों की प्रशासनिक जिम्मेदारी भी तय होती दिखाई दे रही है।


अन्य पंचायतों के लिए भी चेतावनी


जिला पंचायत न्यायालय का यह आदेश जिले की अन्य ग्राम पंचायतों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है कि पंचायत निधि को निजी जागीर समझने वालों पर अब कार्रवाई तय है। यदि पंचायतों में नियमों को दरकिनार कर शासकीय राशि का उपयोग किया जाएगा या अभिलेखों में पारदर्शिता नहीं रखी जाएगी, तो संबंधित जनप्रतिनिधियों एवं कर्मचारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जाएगा।


ग्रामीणों की मांग—अब हो आपराधिक जांच भी


ग्रामीणों का कहना है कि यदि जांच में वित्तीय अनियमितताएं सिद्ध हो चुकी हैं और न्यायालय ने वसूली के आदेश भी जारी कर दिए हैं, तो पूरे मामले की विस्तृत जांच कर यह भी देखा जाना चाहिए कि कहीं अन्य विकास कार्यों में भी इसी प्रकार की गड़बड़ियां तो नहीं हुईं। दोषियों के खिलाफ आवश्यक होने पर आपराधिक कार्रवाई भी की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में पंचायत स्तर पर शासकीय धन के दुरुपयोग की पुनरावृत्ति न हो।


29 जून 2026 को पारित यह आदेश मंडला जिले में पंचायतों की वित्तीय जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दोषी निर्धारित समय में राशि जमा करते हैं या फिर उन्हें न्यायालय के आदेशानुसार सिविल कारावास का सामना करना पड़ेगा।

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