Breaking

revanchal times new

वर्दी का रौब या व्यवस्था का दुरुपयोग? वायरल वीडियो ने खोली ‘वायरलेस’ की कहानी!



नगर सुरक्षा कर्मचारियों के हाथ में पुलिस जैसा वायरलेस सेट! सोशल मीडिया वीडियो के बाद मचा हड़कंप, वसूली के आरोपों ने बढ़ाई चिंता

दैनिक रेवाँचल टाईम्स - मंडला। शहर की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पुलिस और नगर सुरक्षा व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर वायरल हो रहे एक वीडियो में रूपम नामदेव नामक व्यक्ति के पास पुलिस विभाग में उपयोग होने वाले वायरलेस सेट जैसा उपकरण दिखाई दे रहा है। साथ ही वह पुलिस विभाग की वर्दी जैसी दिखाई देने वाली डांगरी पहने नजर आ रहा है।

  वही सोशल मीडिया में वीडियो सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पुलिस जैसी पहचान देने वाले उपकरण और परिधान एक आम व्यक्ति तक कैसे पहुंचे? यदि यह वास्तव में पुलिस विभाग का अधिकृत वायरलेस सेट है, तो इसे संबंधित व्यक्ति को किस अधिकारी ने उपलब्ध कराया और इसके उपयोग की अनुमति किस आधार पर दी गई?

सुरक्षा कर्मचारी या पुलिस की ‘छाया’?

स्थानीय स्तर पर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि नगर सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े कुछ कर्मचारी सरकारी वॉकी-टॉकी का उपयोग करते हुए स्वयं को पुलिसकर्मी जैसा प्रस्तुत कर रहे हैं। कुछ लोगों ने इन कर्मचारियों पर शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में लोगों से कथित रूप से वसूली किए जाने के आरोप भी लगाए हैं।

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल वायरलेस सेट के उपयोग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी उपकरण, पुलिस की पहचान और आम नागरिकों पर कथित प्रभाव के इस्तेमाल तक पहुंच सकता है।

कभी फल की गाड़ी तो कभी जनप्रतिनिधियों के वाहन के साथ नजर आने के दावे, स्थानीय लोगों का कहना है कि सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े बताए जा रहे कुछ कर्मचारियों की गतिविधियां भी सवालों के घेरे में हैं। कभी फल की गाड़ी चलाते हुए तो कभी जनप्रतिनिधियों के वाहनों के साथ दिखाई देने की बातें सामने आ रही हैं।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि इन कर्मचारियों की वास्तविक जिम्मेदारी क्या है और उन्हें कौन-कौन से अधिकार दिए गए हैं?

वायरलेस किसके आदेश पर मिला?

मामले का सबसे अहम प्रश्न यही है—

नगर सुरक्षा कर्मचारियों को वायरलेस सेट उपलब्ध कराने का अधिकार किसके पास है? क्या उन्हें पुलिस विभाग के संचार उपकरण इस्तेमाल करने की अनुमति है? क्या उन्हें पुलिस जैसी वर्दी या पहचान प्रदर्शित करने की अनुमति है? और यदि नहीं, तो अब तक इस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

वीडियो की जांच से खुल सकता है पूरा मामला

पुलिस विभाग के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वायरल वीडियो की सत्यता की जांच करे। साथ ही यह भी पता लगाया जाए कि वीडियो में दिखाई दे रहा वायरलेस सेट वास्तव में पुलिस विभाग का अधिकृत संचार उपकरण है या कोई अन्य डिवाइस।

इसके अलावा उपकरण का स्रोत, संबंधित व्यक्ति को उसकी उपलब्धता, वर्दी जैसी डांगरी के इस्तेमाल और सोशल मीडिया पर उसके प्रदर्शन के संबंध में भी जांच की जरूरत है।

यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर स्वयं को पुलिसकर्मी के रूप में प्रस्तुत किया, पुलिस के अधिकृत उपकरण का अनधिकृत इस्तेमाल किया या आम लोगों को भ्रमित करने का प्रयास किया, तो उसके विरुद्ध लागू कानूनों के तहत कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।

अब निगाह पुलिस की जांच पर

फिलहाल वायरल वीडियो और सामने आए आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है। पुलिस की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि वीडियो में दिखाई दे रहा उपकरण क्या है, संबंधित व्यक्ति को वह कैसे मिला और क्या उसके उपयोग की कोई वैध अनुमति थी।

लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है—

अगर वायरलेस पुलिस का है तो वह गैर-पुलिस व्यक्ति के हाथ में कैसे पहुंचा? और अगर पुलिस का नहीं है, तो पुलिस जैसी पहचान के साथ उसका प्रदर्शन क्यों?

    अब देखना यह है कि पुलिस विभाग इस वायरल वीडियो को महज सोशल मीडिया की बात मानकर नजरअंदाज करता है या फिर जांच कर वायरलेस, वर्दी और कथित वसूली के पूरे खेल की हकीकत सामने लाता है।

Post a Comment

Previous Post Next Post