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लहूलुहान हाथ लेकर थाने पहुंची महिला, फिर भी कार्रवाई की जगह बना दिया आरोपी!




दूध पीते बच्चे को गोद में लेकर बचाती रही जान, कैंची हाथ में धंसी; पुलिस की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

181 में शिकायत की तो वापस लेने का दबाव और गंभीर धाराओं में फंसाने की कथित धमकी—पीड़िता ने एसपी से लगाई न्याय की गुहार



दैनिक रेवांचल टाईम्स - मंडला। पुलिस से आम आदमी न्याय और सुरक्षा की उम्मीद लेकर थाने पहुंचता है, लेकिन यदि शिकायत लेकर पहुंचने वाले पीड़ित के साथ ही कथित तौर पर दबाव, धमकी और उल्टी कार्रवाई होने लगे तो पुलिस व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। 



       वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार बीजाडांडी थाना क्षेत्र की एक 24 वर्षीय महिला ने पुलिस अधीक्षक मंडला को आवेदन देकर ऐसा ही गंभीर आरोप लगाया है। आवेदिका टिकिया गौठरिया उर्फ जानवी, पति ब्रजेश गौठरिया, निवासी ब्लॉक मोहल्ला, थाना बीजाडांडी ने आरोप लगाया है कि 6 अगस्त 2026 को सिलाई सेंटर में सामान्य हंसी-मजाक के दौरान गौरी मरकाम ने अचानक उस पर हमला कर दिया। उस समय महिला की गोद में उसका दूध पीता छोटा बच्चा भी था। अपने और बच्चे के बचाव के दौरान कथित रूप से गौरी मरकाम ने सिलाई मशीन पर रखी कैंची से उस पर वार किया। महिला ने वार रोकने के लिए हाथ आगे किया तो कैंची उसके बाएं हाथ में धंस गई और खून बहने लगा।

घायल महिला थाने पहुंची, लेकिन कार्रवाई पर ही सवाल

पीड़िता का आरोप है कि लहूलुहान हाथ और गोद में बच्चे को लेकर वह तत्काल बीजाडांडी थाने पहुंची और वहां मौजूद एसआई धुर्वे को पूरी घटना बताई। आरोप है कि पुलिस ने गौरी मरकाम के पति को फोन कर बुलाया, लेकिन आवेदिका को कथित रूप से पूरे दिन थाने के बाहर बैठाए रखा गया।

सबसे गंभीर आरोप यह है कि जिस महिला का कहना है कि उस पर हमला हुआ, उसी के विरुद्ध पुलिस ने कार्रवाई कर दी। आवेदिका के अनुसार शाम को उसके विरुद्ध एनसीआर दर्ज कर दी गई।

यहीं से पुलिस की भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—अगर महिला घायल अवस्था में थाने पहुंची थी तो उसके आरोपों की निष्पक्ष जांच कहां हुई? चोट किसे लगी, कैंची किसके हाथ में थी और घटना की वास्तविकता क्या थी—इन बिंदुओं की जांच किए बिना कार्रवाई किस आधार पर हुई?

181 में शिकायत करना पड़ा भारी?

थाना स्तर की कार्रवाई से असंतुष्ट महिला ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 181 पर शिकायत दर्ज कराई। आवेदिका का आरोप है कि शिकायत के बाद उसे उसकी मां के साथ दोबारा थाने बुलाया गया और एएसआई झरिया द्वारा कथित तौर पर 181 की शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया गया।

महिला का दावा है कि शिकायत वापस नहीं लेने पर उसे गंभीर धाराओं में फंसाने की धमकी दी गई और उसके विरुद्ध धारा 126(B), 135(3) BNSS के तहत प्रकरण दर्ज कर दिया गया। मामले में 3 सितंबर को पेशी थी, जिसके बाद अगली तारीख 24 सितंबर दी गई है।

यदि महिला द्वारा लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल दो पक्षों के विवाद तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह पुलिस की कार्यप्रणाली, निष्पक्षता और पीड़ित के प्रति संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

एसपी ने मांगी पूरी जानकारी, अब निगाह जांच पर

आवेदिका के अनुसार उसने पुलिस अधीक्षक मंडला से बात की। एसपी द्वारा उसे व्हाट्सऐप पर मामले की पूरी जानकारी भेजने के लिए कहा गया। इसके बाद आवेदिका ने अपने मोबाइल से घटनाक्रम, शिकायत और संबंधित दस्तावेजों की जानकारी एसपी को भेज दी है।

अब सवाल यह है कि क्या एसपी स्तर से इस मामले की निष्पक्ष जांच किसी वरिष्ठ अधिकारी से कराई जाएगी? क्या यह पता लगाया जाएगा कि घायल महिला की शिकायत पर तत्काल क्या कार्रवाई की गई? उसके विरुद्ध एनसीआर किस आधार पर दर्ज हुई? 181 शिकायत वापस लेने का दबाव वास्तव में बनाया गया था या नहीं? और यदि दबाव बनाया गया तो जिम्मेदार कौन है?

पीड़िता को न्याय चाहिए, पुलिसिया दबाव नहीं

आवेदिका ने पुलिस अधीक्षक से मांग की है कि मामले की जांच बीजाडांडी थाना स्तर से हटाकर किसी वरिष्ठ अधिकारी से कराई जाए। साथ ही गौरी मरकाम के विरुद्ध महिला द्वारा लगाए गए हमले और चोट के आरोपों की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

महिला ने कथित रूप से दबाव बनाने और गलत कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मियों की भूमिका की भी जांच कर अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की है।

शिकायत कर्ता का सवाल सीधा है—अगर थाने की चौखट पर घायल होकर पहुंची महिला को ही न्याय की जगह आरोपी बनने का सामना करना पड़े, तो फिर पीड़ित आखिर जाए कहां?

पुलिस का काम किसी एक पक्ष को बचाना या किसी को फंसाना नहीं, बल्कि सच्चाई तक पहुंचकर निष्पक्ष कार्रवाई करना है। इसलिए अब इस मामले में थाना स्तर की सफाई से ज्यादा जरूरी है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच हो और यदि किसी पुलिस अधिकारी-कर्मचारी की भूमिका में लापरवाही, पक्षपात या दबाव की पुष्टि होती है तो उसके विरुद्ध भी कार्रवाई हो।

      वही अब गेंद पुलिस अधीक्षक के पाले में है—देखना होगा कि घायल महिला की शिकायत फाइलों में दबती है या फिर जांच की निष्पक्षता से पुलिस व्यवस्था पर उठे सवालों का जवाब मिलता है।


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