नायब तहसीलदार बम्हनी वृत पर पचास हज़ार की रिश्वत मांगने के लगे गम्भीर आरोप
सरकारी दफ्तरों में बिना रिश्वत फाइल आगे नहीं बढ़ने के आरोपों से जनता त्रस्त, न्यायालय के आदेश भी कथित तौर पर बेअसर!
काम के बदले ‘नजराना’ मांगने की शिकायतें बढ़ीं, जिम्मेदारों की चुप्पी ने बढ़ाई आम आदमी की बेचैनी
दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला। क्या मंडला में कानून सिर्फ कागजों पर रह गया है? क्या आम आदमी को अपने जायज काम के लिए भी सरकारी दफ्तरों में रिश्वत की कीमत चुकानी पड़ेगी? और अगर कोई पैसा देने से इनकार कर दे तो क्या उसे महीनों-वर्षों तक दफ्तरों की चौखट पर भटकना ही उसकी नियति है?
वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मंडला जिला प्रशासन की प्रत्येक मंगलवार को होने वाली जनसुनवाई में राष्ट्रपति के नाम इच्छा मृत्यु की अनुमति मांगने वाला आवेदन सामने आने के बाद ये सवाल अब और ज्यादा तीखे हो गए हैं। आवेदनकर्ता ने राजस्व विभाग से जुड़े मामले में न्यायालयीन आदेशों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने और ₹50 हजार रिश्वत मांगने के गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोपों की स्वतंत्र जांच होना बाकी है, लेकिन शिकायत की गंभीरता ने प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
जब न्यायालय का आदेश भी सरकारी दफ्तर की चौखट पर दम तोड़ दे!
शिकायतकर्ता का आरोप है कि उसकी पत्नी से संबंधित मामले में सक्षम न्यायालयों के निर्णय होने के बावजूद राजस्व रिकॉर्ड में आवश्यक कार्रवाई नहीं की गई। न्यायालय के आदेश और दस्तावेज प्रस्तुत करने के बाद भी मामला आगे नहीं बढ़ा।
यहीं से असली सवाल पैदा होता है—अगर न्यायालय का आदेश है तो उसका पालन कौन करेगा?
कानून की किताबों में न्यायालयीन आदेश सर्वोपरि हैं, लेकिन यदि कोई अधिकारी अपनी प्रक्रिया, सिस्टम या अन्य कारणों का हवाला देकर कार्रवाई टालता रहे तो आम आदमी आखिर जाए कहां? काम की कीमत तय होने लगी तो कानून व्यवस्था किसके लिए?
सबसे सनसनीखेज आरोप ₹50 हजार रिश्वत मांगने का है। शिकायतकर्ता ने संबंधित राजस्व अधिकारी पर काम कराने के बदले रकम मांगने का आरोप लगाया है।
यह आरोप सही है या गलत, इसका फैसला जांच एजेंसी करेगी। लेकिन प्रशासन को यह जरूर बताना चाहिए कि सरकारी काम के लिए आम नागरिक से कथित तौर पर पैसे मांगने की शिकायतें आखिर बार-बार क्यों सामने आती हैं?
अगर रिश्वत नहीं मांगी गई तो शिकायतकर्ता के आरोपों की निष्पक्ष जांच कर उसे बेनकाब किया जाए। और यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बातें करने वाले जिम्मेदारों को कार्रवाई करने में देर किस बात की?
जनता काम कराने जाती है, ‘वसूली केंद्र’ के आरोप लेकर लौटती है!
मंडला में सरकारी कार्यालयों को लेकर आम लोगों के बीच लगातार असंतोष की चर्चाएं सामने आ रही हैं। कहीं प्रमाण पत्र, कहीं राजस्व रिकॉर्ड, कहीं आवास, कहीं पंचायत के काम, तो कहीं योजनाओं का लाभ—हर जगह अगर काम की गति ‘सिस्टम’ नहीं बल्कि ‘सिफारिश और रकम’ से तय होने लगे तो फिर शासन और प्रशासन की जरूरत ही क्या रह जाती है?
आम आदमी के लिए सरकारी कार्यालय राहत के केंद्र होने चाहिए, लेकिन यदि वहां उसे कथित तौर पर फाइल आगे बढ़ाने से लेकर काम कराने तक हर कदम पर पैसे की मांग का सामना करना पड़े, तो यह व्यवस्था की जड़ में लगी गंभीर बीमारी है।
‘इच्छा मृत्यु’ का आवेदन प्रशासन के लिए चेतावनी
वही सबसे चिंताजनक बात यह है कि शिकायतकर्ता ने कथित मानसिक प्रताड़ना और लंबे समय से चल रही परेशानी का हवाला देते हुए इच्छा मृत्यु की अनुमति तक मांग डाली है।
यह सिर्फ एक आवेदन नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है जहां आम नागरिक न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचता है। जिस नागरिक को न्याय देने के लिए कानून बनाया गया, अगर वही नागरिक न्याय मांगते-मांगते जिंदगी से हारने की बात करने लगे, तो जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुर्सी पर बैठकर खुद से सवाल करें—आखिर गलती कहां हो रही है?
अब प्रशासन को बयान नहीं, कार्रवाई दिखानी होगी
मामले में लगाए गए रिश्वत और न्यायालयीन आदेशों की कथित अवहेलना के आरोपों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच जरूरी है। शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों को न तो बिना जांच सच माना जा सकता है और न ही महज आवेदन समझकर खारिज किया जा सकता है।
जरूरत है कि प्रशासन:
नायब तहसीलदार हीरा मोहन तिवारी पर पचास हज़ार रुपये की रिश्वत मांगने के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराए। संबंधित न्यायालयीन आदेशों के पालन की स्थिति सार्वजनिक करे। राजस्व रिकॉर्ड में देरी के लिए जिम्मेदारी तय करे। शिकायतकर्ता के स्वास्थ्य एवं मानसिक स्थिति को देखते हुए संवेदनशीलता से कार्रवाई करे।
दोष सिद्ध होने पर संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई करे।
और सबसे महत्वपूर्ण—सरकारी कार्यालयों में ‘काम के बदले कथित रिश्वत’ की शिकायतों पर प्रभावी निगरानी व्यवस्था बनाए।
मंडला की जनता को भाषण नहीं, व्यवस्था चाहिए। आश्वासन नहीं, कार्रवाई चाहिए।
क्योंकि सवाल अब सिर्फ एक किसान का नहीं है। सवाल यह है कि क्या आम आदमी बिना पैसे, बिना पहुंच और बिना राजनीतिक संरक्षण के अपना वैध सरकारी काम करा सकता है?
अगर जवाब ‘हां’ है तो प्रशासन इस मामले में तत्काल कार्रवाई करके दिखाए। और अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो फिर कानून व्यवस्था और सुशासन के दावों की समीक्षा कौन करेगा?
जनता अब पूछ रही है—सरकारी दफ्तर जनता की सेवा के लिए हैं या कथित वसूली के लिए?

