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घटना घटने के बाद जागते हैं विभाग, जहरीली शराब के खतरे से पहले क्या सोया था अमला?

घटना घटने के बाद जागते हैं विभाग, जहरीली शराब के खतरे से पहले क्या सोया था अमला?

मंडला में अवैध शराब का कारोबार चरम पर होने के आरोप, अब अचानक आबकारी और पुलिस की सक्रियता पर उठे सवाल

रेवांचल टाइम्स, मंडला।

जिले में इन दिनों आबकारी विभाग और पुलिस अचानक बेहद चुस्त-दुरुस्त नजर आ रहे हैं। गली-मोहल्लों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक अवैध शराब के खिलाफ छापामार कार्रवाई की जा रही है। कहीं कच्ची महुआ शराब पकड़ी जा रही है तो कहीं देशी-विदेशी शराब के अवैध कारोबार पर कार्रवाई के दावे किए जा रहे हैं।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—विभागों की यह सक्रियता पहले कहां थी?

क्या अवैध शराब का कारोबार अचानक शुरू हुआ है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को इतने दिनों तक इसकी भनक नहीं थी? या फिर कार्रवाई तभी तेज होती है, जब मामला मीडिया की सुर्खियों में पहुंच जाए और ऊपर से दबाव बनने लगे?

मध्यप्रदेश के सागर जिले में जहरीली शराब से मौत की घटना के बाद अवैध शराब के खिलाफ प्रशासनिक अमले की सक्रियता और बढ़ गई है। मंडला में भी इसके बाद जगह-जगह दबिश और कार्रवाई का सिलसिला दिखाई देने लगा है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विभाग किसी बड़े हादसे के बाद ही अपनी जिम्मेदारी निभाएगा?

वर्षों से शिकायतें, अब अचानक छापेमारी

मंडला शहर हो या ग्रामीण क्षेत्र, अवैध शराब के कारोबार की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं। कच्ची महुआ शराब बनाने और बेचने से लेकर लाइसेंसी शराब के कथित अवैध वितरण तक के मामले समय-समय पर चर्चा में रहे हैं।

कई इलाकों में शराब आसानी से उपलब्ध होने की शिकायतों के बावजूद आबकारी और पुलिस विभाग की नियमित निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठते रहे हैं।

यदि विभागों के पास पर्याप्त सूचना तंत्र है तो फिर अवैध शराब का कारोबार इतने लंबे समय तक कैसे चलता रहा? और यदि जानकारी नहीं थी, तो क्षेत्रीय निगरानी तंत्र कितना प्रभावी था?

कार्रवाई पर भी उठ रहे सवाल

विभागीय कार्रवाई को लेकर स्थानीय स्तर पर कई तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। सूत्रों के हवाले से आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ स्थानों पर अवैध शराब के कारोबार से जुड़े लोगों के खिलाफ मामूली कार्रवाई कर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है।

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं तो वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा निष्पक्ष जांच कराया जाना जरूरी है।

स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि कुछ कथित शराब विक्रेताओं को छोटे प्रकरणों में उलझाकर कार्रवाई दिखा दी जाती है और बाद में कारोबार फिर शुरू हो जाता है। यदि ऐसा वास्तव में हो रहा है तो यह गंभीर विभागीय प्रश्न खड़े करता है।

ठेकेदार के कथित नेटवर्क पर भी सवाल

सूत्रों के अनुसार शराब कारोबार से जुड़े कुछ लोगों द्वारा कथित रूप से अवैध बिक्री करने वालों के संपर्क में रहने और उन्हें शराब उपलब्ध कराने की बातें भी सामने आ रही हैं।

एक कथित शराब विक्रेता ने नाम न छापने की शर्त पर दावा किया कि अधिकारियों पर फिलहाल मीडिया और अन्य प्रकार का दबाव है, इसलिए कार्रवाई की जा रही है और कुछ समय बाद स्थिति फिर सामान्य हो सकती है।

इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि ऐसा कोई नेटवर्क वास्तव में सक्रिय है तो जांच केवल छोटे विक्रेताओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि शराब की आपूर्ति करने वाले वास्तविक स्रोत तक पहुंचनी चाहिए।

सिर्फ दो-चार बोतल या कुछ लीटर कच्ची शराब पकड़कर आंकड़ा बढ़ाना पर्याप्त नहीं। असली सवाल है—शराब पहुंच कैसे रही है, सप्लाई कौन कर रहा है और पूरे कारोबार की आर्थिक श्रृंखला कहां तक जाती है?

छोटे विक्रेता ही क्यों बनते हैं निशाना?

अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई में अक्सर छोटे स्तर पर शराब बेचने वालों की गिरफ्तारी या प्रकरण दर्ज करने की खबरें सामने आती हैं। लेकिन जनता यह जानना चाहती है कि इन विक्रेताओं तक शराब पहुंचाने वाले बड़े सप्लायर कौन हैं।

जब तक कार्रवाई आपूर्ति के स्रोत तक नहीं पहुंचेगी, तब तक एक विक्रेता के हटने के बाद दूसरे के खड़े होने का खतरा बना रहेगा।

इसलिए कार्रवाई को केवल सड़क या मोहल्ले के छोटे विक्रेताओं तक सीमित रखने के बजाय सप्लाई चेन, भंडारण, परिवहन और आर्थिक नेटवर्क की भी जांच आवश्यक है।

जहरीली शराब का खतरा सबसे बड़ा

अवैध शराब का सबसे खतरनाक पहलू केवल राजस्व चोरी नहीं है। इसका सीधा संबंध लोगों की जान से है। कच्ची या मिलावटी शराब में जहरीले पदार्थों की मौजूदगी जानलेवा साबित हो सकती है और एक छोटी सी लापरवाही कई परिवारों को तबाह कर सकती है।

सागर की घटना ने फिर चेताया है कि प्रशासन को हादसे का इंतजार नहीं करना चाहिए। शिकायत मिलते ही प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए—मौत होने के बाद नहीं।

जनता के सवालों का जवाब कौन देगा?

क्या संबंधित क्षेत्रों में नियमित निरीक्षण हुए?
क्या अवैध शराब की शिकायतें पहले मिली थीं?
यदि मिली थीं तो उन पर क्या कार्रवाई हुई?
कितने प्रकरण दर्ज किए गए और कितनी शराब जब्त हुई?
बड़े सप्लायरों तक कार्रवाई क्यों नहीं पहुंची?
क्या क्षेत्रीय अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई?

मीडिया में खबर आई तो जागा अमला?

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि विभागीय कार्रवाई किसी नियमित रणनीति का हिस्सा है या मीडिया और सोशल मीडिया में मुद्दा उठने के बाद तेज हुई गतिविधि।

यदि कार्रवाई पहले से नियमित थी तो अवैध शराब के कारोबार को लेकर लगातार शिकायतें क्यों आती रहीं? और यदि शिकायतें लगातार थीं तो जिम्मेदार अधिकारियों ने पहले सख्त कदम क्यों नहीं उठाए?

विभाग की सक्रियता का असली पैमाना छापों की संख्या नहीं, बल्कि अवैध शराब के कारोबार पर स्थायी रोक है।

अब जरूरत दिखावे की नहीं, जड़ पर प्रहार की

मंडला में अवैध शराब के खिलाफ अभियान को प्रभावी बनाना है तो कार्रवाई सड़क किनारे शराब बेचने वाले छोटे व्यक्ति से शुरू होकर वहीं समाप्त नहीं होनी चाहिए। विभाग को सप्लाई चैन, भंडारण, परिवहन और कथित संरक्षण के प्रत्येक स्तर की जांच करनी होगी।

साथ ही जिन क्षेत्रों में लंबे समय से अवैध शराब के कारोबार की शिकायतें बनी हुई हैं, वहां निगरानी की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।

क्योंकि सवाल सिर्फ सरकारी राजस्व का नहीं, लोगों की जिंदगी का है। हादसे के बाद जागना व्यवस्था की मजबूरी नहीं होना चाहिए—हादसे से पहले जागना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

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