सूचना के अधिकार के नियमों को ठेंगा, आधी-अधूरी जानकारी देकर विभाग ने खड़े किए सवाल
पशु चिकित्सालय भुआ-बिछिया की संस्था ठोड़ा का मामला, हितग्राहियों से जुड़े अभिलेख मांगे तो अधूरी जानकारी थमाने का आरोप
सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लागू सूचना का अधिकार अधिनियम अब कई विभागों में महज कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाने के आरोपों से घिरता दिखाई दे रहा है।
आम नागरिक द्वारा सरकारी योजनाओं, हितग्राहियों और विभागीय अभिलेखों से संबंधित जानकारी मांगने पर स्पष्ट एवं पूर्ण जानकारी देने के बजाय आधे-अधूरे जवाब देकर मामला निपटाने की कोशिश किए जाने के आरोप सामने आ रहे हैं।
ऐसा ही मामला कार्यालय पशु चिकित्सालय भुआ-बिछिया से सामने आया है, जहां संस्था ठोड़ा के अंतर्गत ग्रामों के हितग्राहियों और पशुओं से संबंधित अभिलेखों की जानकारी आरटीआई के तहत मांगी गई थी।
हितग्राहियों का पूरा रिकॉर्ड मांगा, अधूरी सूचना मिलने का आरोप
संस्था ठोड़ा के अंतर्गत आने वाले ग्रामों में पशुओं से संबंधित हितग्राहियों की सूची, नाम-पता एवं संबंधित अभिलेखों की जानकारी सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई थी।
आवेदक का आरोप है कि विभाग द्वारा मांगी गई सूचना का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के बजाय चुनिंदा एवं आधी-अधूरी जानकारी प्रदान कर दी गई।
सवाल सिर्फ सूचना का नहीं, विभागीय पारदर्शिता का
मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि सूचना का अधिकार किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत सुविधा नहीं, बल्कि शासन की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने वाला महत्वपूर्ण कानून है।
जब कोई नागरिक विभागीय योजनाओं के लाभार्थियों, सरकारी सहायता और उससे जुड़े अभिलेखों की जानकारी मांगता है तो विभाग की जिम्मेदारी बनती है कि नियमानुसार उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर स्पष्ट और पूर्ण जानकारी प्रदान करे।
लेकिन यहां जानकारी अधूरी मिलने के आरोपों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
आखिर पूरे अभिलेख देने में परेशानी क्यों?
संस्था ठोड़ा के अंतर्गत आने वाले ग्रामों में सहायक पशु चिकित्सा अधिकारी से पशुओं से संबंधित विभिन्न हितग्राहियों की जानकारी एवं अभिलेख मांगे गए थे। इसमें हितग्राहियों की सूची, उनके नाम-पते तथा संबंधित दस्तावेजों की जानकारी शामिल थी।
सवाल यह है कि जिन अभिलेखों के आधार पर सरकारी योजनाओं का संचालन और हितग्राहियों को लाभ दिया गया, उन्हीं अभिलेखों की पूरी जानकारी उपलब्ध कराने में विभाग को परेशानी क्यों हो रही है?
अधूरी जानकारी ने बढ़ाया संदेह
सूत्रों के हवाले से यह आरोप भी सामने आया है कि संबंधित विभाग में हितग्राहियों और पशुपालन से जुड़ी योजनाओं में कथित अनियमितताएं हुई हैं।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है। ऐसे में इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि जांच योग्य आरोप के रूप में देखा जाना चाहिए।
लेकिन यदि विभागीय रिकॉर्ड पूरी तरह व्यवस्थित और नियमानुसार है तो सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होनी चाहिए। अधूरी जानकारी मिलने से संदेह और गहरा रहा है।
अब तीन बड़े सवाल:
क्या विभाग के पास संबंधित हितग्राहियों का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है?
यदि रिकॉर्ड उपलब्ध है तो मांगी गई सूचना पूरी क्यों नहीं दी गई?
और यदि रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है तो योजनाओं का क्रियान्वयन किस आधार पर किया गया?
आरटीआई का मूल उद्देश्य ही पारदर्शिता
सूचना का अधिकार व्यवस्था नागरिकों को यह ताकत देती है कि वे सरकारी विभागों से उनके कार्यों और अभिलेखों से संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकें।
इसी व्यवस्था के माध्यम से सरकारी योजनाओं में संभावित गड़बड़ी, फर्जीवाड़े और अनियमितताओं पर निगरानी रखी जा सकती है। लेकिन यदि विभाग ही अधूरी जानकारी देकर सवालों से बचने लगे तो कानून की मूल भावना प्रभावित होती है।
विभागीय पारदर्शिता की परीक्षा बना मामला
भुआ-बिछिया के पशु चिकित्सालय से सामने आया यह मामला अब विभागीय पारदर्शिता की परीक्षा बन गया है। जरूरत इस बात की है कि सक्षम अधिकारी पूरे मामले की जांच कर यह स्पष्ट करें कि आरटीआई आवेदन में मांगी गई जानकारी का प्रत्येक बिंदु नियमानुसार क्यों उपलब्ध नहीं कराया गया।
जांच में ये तथ्य भी सामने आने चाहिए
✔ संस्था ठोड़ा के अंतर्गत कितने वास्तविक हितग्राहियों को लाभ मिला?
✔ किन योजनाओं के तहत लाभ दिया गया?
✔ लाभार्थियों की सूची और संबंधित अभिलेख क्या हैं?
✔ योजनाओं पर कुल कितना शासकीय व्यय किया गया?
✔ मांगी गई सूचना पूरी उपलब्ध क्यों नहीं कराई गई?
रिकॉर्ड साफ है तो सामने लाने में संकोच क्यों?
यदि रिकॉर्ड में सब कुछ नियमानुसार है तो उसे सामने लाने में विभाग को कोई संकोच नहीं होना चाहिए। लेकिन यदि जानकारी अधूरी देने या रोकने के पीछे कोई वजह है तो उसकी जवाबदेही तय होना जरूरी है।
अब निगाहें विभागीय अधिकारियों पर हैं कि वे सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई पूरी जानकारी उपलब्ध कराकर स्थिति स्पष्ट करते हैं या फिर कागजी जवाबों के सहारे मामला आगे भी उलझा रहता है।
