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डिजिटल इंडिया के दौर में पन्नी के आशियाने! मंडला की सड़कों पर बेबसी की तस्वीर

दैनिक रेवाँचल टाईम्स | मंडला

डिजिटल इंडिया के दौर में पन्नी के आशियाने! मंडला की सड़कों पर बेबसी की ये तस्वीरें किसे दिखेंगी?

हाईटेंशन लाइन के नीचे महिला, कलेक्ट्रेट के पीछे दिव्यांग और तिराहे पर बुजुर्ग का बसेरा; परोपकारी लोकमंच ने सर्वे कर पात्र जरूरतमंदों के तत्काल पुनर्वास की उठाई मांग

मंडला। एक तरफ विकास, डिजिटल इंडिया और जनकल्याणकारी योजनाओं के बड़े-बड़े दावे हैं, तो दूसरी तरफ जिला मुख्यालय की सड़कों पर पन्नी के नीचे गुजरती जिंदगी ऐसी तस्वीर पेश कर रही है, जो व्यवस्था की पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े करती है। कहीं हाईटेंशन लाइन और ट्रांसफार्मर के पास पन्नी का आशियाना बताया जा रहा है, कहीं कलेक्ट्रेट के पीछे एक दिव्यांग व्यक्ति असुरक्षित परिस्थितियों में दिखाई देता है, तो कहीं तिराहे पर पेड़ के नीचे एक बुजुर्ग का बसेरा होने की बात सामने आई है।

सवाल सिर्फ गरीबी का नहीं, सुरक्षित जीवन का भी
यदि जरूरतमंद लोग जिला मुख्यालय में खुले और असुरक्षित स्थानों पर रहने को मजबूर हैं, तो उनकी पहचान, पात्रता, सामाजिक सुरक्षा और पुनर्वास की स्थिति की पड़ताल जरूरी है।

⚡ हाईटेंशन लाइन के नीचे पन्नी का घर—सुरक्षा पर बड़ा सवाल

परोपकारी लोकमंच के अनुसार कृषि उपज मंडी मंडला के सामने व्यस्त सड़क के डिवाइडर पर एक महिला लंबे समय से पन्नी का अस्थायी आशियाना बनाकर रह रही है। संस्था का कहना है कि संबंधित स्थान के आसपास विद्युत लाइन, ट्रांसफार्मर और व्यस्त यातायात होने के कारण सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है।

ऐसे स्थान पर खाना बनाना और रात गुजारना विद्युत दुर्घटना, आग अथवा सड़क हादसे जैसी संभावित परिस्थितियों में जोखिम बढ़ा सकता है। ऐसे में संबंधित महिला की वास्तविक परिस्थितियों की जांच कर सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराने की जरूरत बताई जा रही है।

🏢 कलेक्ट्रेट के पीछे असुरक्षित जिंदगी

दूसरा मामला कलेक्ट्रेट परिसर स्थित हनुमान मंदिर के पीछे का बताया गया है। संस्था के मुताबिक यहां एक दिव्यांग व्यक्ति पुराने कपड़ों और अन्य सामान के बीच असुरक्षित स्थिति में समय गुजारता दिखाई देता है।

जिस प्रशासनिक परिसर से जिले की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं की निगरानी और क्रियान्वयन होता है, उसी क्षेत्र में किसी जरूरतमंद व्यक्ति की ऐसी स्थिति सामने आने पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संबंधित व्यक्ति तक सामाजिक सुरक्षा अथवा पुनर्वास योजनाओं की पहुंच हो पाई है?

🌳 तिराहे पर पेड़ और पन्नी बना बुजुर्ग का आशियाना

तीसरा मामला कलेक्ट्रेट-कोर्ट-योजना भवन तिराहे के आसपास का बताया गया है। यहां एक वयोवृद्ध दिव्यांग व्यक्ति के आम के पेड़ के नीचे पन्नी के सहारे अस्थायी रूप से रहने की जानकारी संस्था ने दी है।

बारिश, गर्मी और ठंड जैसे मौसम में खुले स्थान पर रहने वाले बुजुर्ग की स्थिति को देखते हुए संस्था ने प्रशासन से उनकी पहचान कर पात्रतानुसार आश्रय, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ने की मांग की है।

❓ रोज गुजरते हैं जिम्मेदार, फिर भी क्यों नहीं बदली स्थिति?
इन स्थानों से अधिकारियों, कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों की नियमित आवाजाही होती है। ऐसे में सवाल है कि खुले में रह रहे जरूरतमंदों की पहचान कर उन्हें उपलब्ध योजनाओं से जोड़ने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है?

परोपकारी लोकमंच ने प्रशासन को सौंपा पत्र

परोपकारी लोकमंच मंडला के संयोजक पी.डी. खैरवार, महासचिव चंद्रगुप्त नामदेव एवं उपाध्यक्ष सहजान सिंह परस्ते ने 17 सितंबर को जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को पत्र सौंपकर जिले में ऐसे जरूरतमंद व्यक्तियों की पहचान के लिए सर्वे कराने और पात्र व्यक्तियों के पुनर्वास की व्यवस्था करने की मांग की है।

संस्था के अनुसार पत्र की प्रतिलिपि कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और सामाजिक न्याय विभाग को भी दी गई है। लोकमंच का कहना है कि प्रशासन को जिला मुख्यालय के साथ जिले के अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे लोगों की पहचान करनी चाहिए, जो खुले आसमान के नीचे अथवा असुरक्षित परिस्थितियों में जीवन गुजार रहे हैं।

योजनाएं हैं तो जरूरतमंदों तक पहुंच कितनी?

निराश्रित, दिव्यांग, बुजुर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों के लिए विभिन्न स्तरों पर सामाजिक सुरक्षा एवं सहायता योजनाएं संचालित होती हैं। हालांकि किसी व्यक्ति की पात्रता और उसे मिलने वाली सहायता का निर्धारण संबंधित विभाग की जांच एवं निर्धारित नियमों के आधार पर ही किया जा सकता है।

इसलिए इन मामलों में सबसे पहले प्रशासनिक सर्वे और सत्यापन आवश्यक है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि संबंधित व्यक्ति कौन हैं, उनकी पारिवारिक और आर्थिक स्थिति क्या है तथा उन्हें किन योजनाओं अथवा पुनर्वास सुविधाओं से जोड़ा जा सकता है।

सिर्फ सर्वे नहीं, संस्था ने मांगा पुनर्वास

✔ जरूरतमंद व्यक्तियों की पहचान
✔ सुरक्षित आश्रय की व्यवस्था
✔ भोजन एवं आवश्यक सहायता
✔ स्वास्थ्य परीक्षण एवं उपचार
✔ दिव्यांग और वृद्धजनों को पात्रतानुसार सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ना
✔ जिला स्तर पर नियमित निगरानी

अब तस्वीरों के बाद प्रशासन की कार्रवाई पर नजर

जिला मुख्यालय में सामने आई इन स्थितियों ने प्रशासन के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल रखा है। योजनाओं और बजट का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब सहायता उस व्यक्ति तक पहुंचे जिसे वास्तव में उसकी जरूरत है।

परोपकारी लोकमंच द्वारा उठाए गए मामलों में प्रशासनिक सत्यापन के बाद ही प्रत्येक व्यक्ति की वास्तविक परिस्थिति और पात्रता स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल संस्था ने तत्काल सर्वे और पुनर्वास की मांग उठाई है। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग इन मामलों में क्या कदम उठाते हैं और खुले में जीवन गुजार रहे जरूरतमंदों को सुरक्षित आश्रय एवं सामाजिक सुरक्षा से जोड़ने के लिए क्या कार्रवाई की जाती है।

पन्नी के आशियाने पूछ रहे सवाल—विकास की योजनाओं में हमारा हिस्सा कहां?

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