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चुटका परमाणु परियोजना को लेकर प्रकाशित खबर पर ग्रामीणों का विरोध, बोले—हमने नहीं छोड़ी जमीन-जंगल, न दी परियोजना को सामूहिक सहमति


चुटका परमाणु परियोजना को लेकर प्रकाशित खबर पर ग्रामीणों का विरोध, बोले—हमने नहीं छोड़ी जमीन-जंगल, न दी परियोजना को सामूहिक सहमति

परियोजना प्रभावितों ने 7 सितंबर को प्रकाशित समाचार को बताया भ्रामक, कहा कुछ परिवारों के पुनर्वास स्थल पर जाने को पूरे गांव की सहमति बताना गलत

8 सितंबर को कलेक्टर के नाम सौंपा ज्ञापन; पर्यावरण, स्वास्थ्य, विकिरण और सुरक्षा से जुड़े सवालों पर पारदर्शी जानकारी और सार्वजनिक संवाद की मांग

दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला। जिले में प्रस्तावित चुटका परमाणु ऊर्जा परियोजना को लेकर 7 सितंबर 2026 को जबलपुर से प्रकाशित एक समाचार पर चुटका एवं परियोजना प्रभावित गांवों के ग्रामीणों ने कड़ी आपत्ति जताई है। चुटका परमाणु विरोधी संघर्ष समिति से जुड़े प्रतिनिधियों और ग्रामीणों का कहना है कि प्रकाशित खबर से प्रभावित क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को लेकर गलत संदेश जा रहा है।

ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि कुछ भूमिहीन परिवार पुनर्वास स्थल पर गए हैं, लेकिन इसे परियोजना प्रभावित अधिकांश परिवारों द्वारा गांव छोड़ने अथवा परियोजना स्वीकार कर लेने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। संघर्ष समिति का दावा है कि अधिकांश ग्रामीण आज भी अपने मूल गांवों में रह रहे हैं और जमीन, जंगल तथा गांव नहीं छोड़ने के अपने संकल्प पर कायम हैं।

ग्रामीणों का सवाल कुछ परिवार गए तो क्या पूरा गांव तैयार मान लिया जाए?

प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि कुछ परिवारों के पुनर्वास स्थल पर जाने को समस्त परियोजना प्रभावित परिवारों के विस्थापन या परियोजना के समर्थन के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। उनका दावा है कि परियोजना के समर्थन में ग्रामवासियों की कोई सामूहिक सहमति अथवा निर्णय नहीं हुआ है।

'हम आज भी अपने गांव में, जमीन-जंगल छोड़ने का सवाल ही नहीं'

चुटका परमाणु विरोधी संघर्ष समिति के प्रतिनिधियों ने कहा कि परियोजना प्रभावित अधिकांश परिवार अभी भी अपने मूल गांवों में निवास कर रहे हैं। ग्रामीणों ने गांव, जंगल और जमीन नहीं छोड़ने के अपने पुराने संकल्प को दोहराते हुए कहा कि उनकी स्थिति को किसी सीमित पुनर्वास गतिविधि के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए।

ग्रामीणों के मुताबिक समाचार में विस्थापित परिवारों को राहत मिलने और परियोजना पर काम शुरू करने की तैयारी को जिस तरह प्रस्तुत किया गया, उससे यह संदेश जा सकता है कि प्रभावित समुदाय ने परियोजना को स्वीकार कर लिया है। ग्रामीण इसी धारणा का विरोध कर रहे हैं।


'चुटका केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, हमारी पहचान और आजीविका भी'

जमीन के साथ जल, जंगल और सामाजिक पहचान का सवाल

प्रभावित परिवारों का कहना है कि चुटका उनके लिए केवल रहने की जगह नहीं है। उनकी जमीन, जंगल, जलस्रोत, आजीविका और सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान इस क्षेत्र से जुड़ी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि उनका विरोध केवल व्यक्तिगत मुआवजे या आर्थिक लाभ का विषय नहीं, बल्कि जीवन, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों से जुड़े अधिकारों का सवाल है।

विकिरण, स्वास्थ्य और पर्यावरण को लेकर उठाए सवाल

ग्रामीणों ने परमाणु ऊर्जा परियोजना से जुड़े संभावित विकिरण, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सुरक्षा संबंधी प्रभावों को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि इन विषयों पर प्रभावित आबादी को विस्तृत, पारदर्शी और समझने योग्य जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

संघर्ष समिति ने मांग की है कि परियोजना के संभावित प्रभावों और जोखिमों का समुचित एवं स्वतंत्र आकलन हो तथा ग्रामीणों द्वारा उठाए जा रहे सवालों पर सार्वजनिक संवाद की व्यवस्था की जाए।

ग्रामीणों की मांग—हमारी आपत्तियां भी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हों

ग्रामीणों ने मांग की कि गांव, जंगल और जमीन नहीं छोड़ने के उनके सामूहिक संकल्प तथा ग्रामसभा और प्रभावित ग्रामीणों की आपत्तियों को आधिकारिक अभिलेख में दर्ज किया जाए। साथ ही ऐसी किसी कार्रवाई से पहले प्रभावित लोगों के अधिकारों और उनकी स्वतंत्र सहमति से जुड़े पहलुओं का ध्यान रखा जाए।

8 सितंबर को कलेक्टर के नाम सौंपा ज्ञापन

परियोजना प्रभावित परिवारों के प्रतिनिधि मंगलवार, 8 सितंबर को मंडला कलेक्ट्रेट पहुंचे और प्रकाशित समाचार के संदर्भ में अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए ज्ञापन सौंपा। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की कि कुछ भूमिहीन परिवारों के पुनर्वास स्थल पर जाने को पूरे प्रभावित समुदाय के विस्थापन अथवा परियोजना की सामूहिक स्वीकृति के रूप में न देखा जाए।

कलेक्टर मंडला की अनुपस्थिति में डिप्टी कलेक्टर सचिन जैन ने प्रभावित ग्रामीणों से मुलाकात कर ज्ञापन लिया। प्रतिनिधिमंडल के अनुसार उन्होंने ज्ञापन को उचित स्तर तक पहुंचाने की बात कही।

ज्ञापन में प्रमुख मांगें

कुछ परिवारों के पुनर्वास को पूरे प्रभावित समुदाय के विस्थापन अथवा परियोजना की स्वीकृति न माना जाए।

ग्रामीणों के गांव, जंगल और जमीन नहीं छोड़ने संबंधी पक्ष तथा ग्रामसभा की आपत्तियों को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए।

परियोजना से संबंधित पर्यावरणीय, स्वास्थ्य, विकिरण और सुरक्षा पहलुओं की पारदर्शी जानकारी प्रभावित ग्रामीणों को उपलब्ध कराई जाए।

प्रभावित लोगों की आपत्तियों और चिंताओं पर सार्वजनिक संवाद की व्यवस्था की जाए।

बड़ी संख्या में प्रभावित ग्रामीण रहे मौजूद

ज्ञापन सौंपने के दौरान चुटका परमाणु विरोधी संघर्ष समिति के अध्यक्ष दादु लाल कुङापे, महिला मोर्चा अध्यक्ष मीरा बाई मरावी, बराती लाल बरकङे, दयाल सिंह काकोङिया, डूमारी लाल बरकङे, वेद प्रकाश यादव, लखन बर्मन, सोना बाई बरकङे, गौरा बाई तिलगाम, मुन्नी बाई काकोङिया, भागवती बाई कुङापे और सेववती तेकाम सहित अन्य ग्रामीण मौजूद रहे।

प्रतिनिधिमंडल में राजीव गांधी पंचायती राज संगठन जबलपुर से विवेक अवस्थी, बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से राज कुमार सिन्हा और सरमन रजक सहित अन्य लोग भी शामिल थे।

ग्रामीणों का स्पष्ट संदेश

प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि पुनर्वास स्थल पर कुछ परिवारों की मौजूदगी को पूरे चुटका क्षेत्र की राय नहीं माना जाना चाहिए। परियोजना को लेकर ग्रामीणों की आपत्तियां, पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं तथा जमीन-जंगल से जुड़े सवाल अभी कायम हैं और वे चाहते हैं कि प्रशासन उनके पक्ष को भी आधिकारिक रूप से दर्ज करे।


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