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बड़े छान रहे मलाई, छोटे कर्मचारी छान रहे खाक! चार दिवस की जांच आज भी लटकी अधर में


बड़े छान रहे मलाई, छोटे कर्मचारी छान रहे खाक! चार दिवस की जांच आज भी लटकी अधर में

वेतन पत्रक के नाम पर 25 हजार की कथित मांग, शिकायतकर्ता का दावा10 हजार देने के बाद भी शेष 15 हजार के लिए अटका वेतन

जनजातीय कार्य विभाग में लगे आरोपों ने खड़े किए गंभीर सवाल; 20 अगस्त को चार दिवस में मांगी गई थी जांच रिपोर्ट, 8 सितंबर तक कार्रवाई का इंतजार

दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला। “बड़े छान रहे मलाई और छोटे कर्मचारी छान रहे खाक”—जनजातीय कार्य विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच यह कहावत एक बार फिर चर्चा में है। शासकीय हाई स्कूल खड़देवरा में अंशकालिक कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में कार्यरत अनिल कुमार परते ने विभागीय व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि वेतन पत्रक जमा कराने के एवज में उनसे कथित तौर पर 25 हजार रुपये की मांग की गई। शिकायतकर्ता के अनुसार वे 10 हजार रुपये दे चुके हैं, लेकिन शेष 15 हजार रुपये नहीं देने के कारण उनका वेतन पत्रक आगे नहीं बढ़ाया जा रहा।

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना शेष है। लेकिन शिकायत के बाद गठित जांच समिति को चार दिवस में रिपोर्ट देने के निर्देश और उसके बाद भी कथित तौर पर जांच पूरी नहीं होने से मामला अब केवल वेतन तक सीमित नहीं रह गया है। विभागीय जवाबदेही पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

चार दिन की जांच को बीत गए कई दिन, रिपोर्ट कहां?

उपलब्ध जानकारी के अनुसार सहायक आयुक्त कार्यालय द्वारा 20 अगस्त 2026 को तीन सदस्यीय जांच टीम गठित कर चार दिवस के भीतर जांच पूरी कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे। शिकायतकर्ता का आरोप है कि 8 सितंबर 2026 तक न तो उसे जांच के निष्कर्ष की जानकारी मिली और न ही शिकायत पर अपेक्षित कार्रवाई होती दिखाई दी।

वेतन कमाने के लिए काम किया या कथित कमीशन देने के लिए

शिकायतकर्ता अनिल कुमार परते के अनुसार वे 1 फरवरी 2026 से शासकीय हाई स्कूल खड़देवरा में अंशकालिक कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में कार्यरत हैं। उनका दावा है कि विद्यालय में कंप्यूटर संबंधी कार्य, अंकसूची अपडेशन तथा अन्य ऑनलाइन कार्य उनके द्वारा किए जाते रहे हैं।

आरोप है कि जब उनके काम के बदले वेतन भुगतान की प्रक्रिया की बारी आई तो वेतन पत्रक जमा कराने के लिए 25 हजार रुपये की कथित मांग की गई। परते का दावा है कि उन्होंने इसमें से 10 हजार रुपये दे भी दिए, इसके बावजूद शेष 15 हजार रुपये को लेकर उनका वेतन पत्रक जमा नहीं किया गया।

अगर आरोप सही हैं तो सवाल सिर्फ 15 हजार का नहीं

यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो मामला केवल एक कर्मचारी के लंबित वेतन का नहीं रहेगा। सवाल उस व्यवस्था पर भी उठेगा जिसमें मेहनत का पारिश्रमिक पाने के लिए किसी कर्मचारी से कथित रूप से अतिरिक्त रकम मांगे जाने का आरोप लग रहा है।

शिकायत पर शिकायत, जांच समिति बनी... फिर कार्रवाई कहां अटकी?

शिकायतकर्ता का कहना है कि उसने कलेक्टर कार्यालय मंडला के डिस्पैच सेक्शन और जनसुनवाई में आवेदन दिया। इसके बाद जांच समिति गठित होने की जानकारी सामने आई। शिकायतकर्ता का आरोप है कि निर्धारित समय बीतने के बावजूद जांच का परिणाम सामने नहीं आया और वह न्याय की उम्मीद में कार्यालयों के चक्कर काट रहा है।

सहायक आयुक्त, आदिवासी विकास विभाग मंडला के समक्ष भी कई आवेदन दिए जाने का दावा किया गया है। शिकायतकर्ता के मुताबिक विकासखंड शिक्षा अधिकारी स्तर से जांच संबंधी निर्देश जारी होने के बावजूद कार्रवाई की गति बेहद धीमी बनी हुई है।

जांच समिति बनी तो समयसीमा का पालन क्यों नहीं?

सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल यही है कि यदि चार दिवस में जांच रिपोर्ट देने का निर्देश था तो निर्धारित समयसीमा में रिपोर्ट क्यों नहीं आई? क्या जांच पूरी हो चुकी है और रिपोर्ट लंबित है, या जांच ही पूरी नहीं हुई? विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

181 पर भी शिकायत, शिकायतकर्ता का आरोप—निराकरण के बिना बंद हो जाती है शिकायत

अनिल परते का दावा है कि उन्होंने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 181 पर भी शिकायत दर्ज कराई, लेकिन उनकी समस्या का संतोषजनक समाधान नहीं हुआ। उनका आरोप है कि शिकायतों को उचित निराकरण के बिना बंद कर दिया जाता है। उन्होंने सांसद स्तर पर भी आवेदन दिए जाने का दावा किया है।

अब सवाल सीधे विभाग से

चार दिवस में होने वाली जांच अब तक पूरी क्यों नहीं हुई?

वेतन पत्रक आखिर किस कारण लंबित है?

25 हजार रुपये की कथित मांग के आरोप की जांच किस स्तर तक पहुंची?

यदि शिकायत गलत है तो विभाग अब तक तथ्य सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं कर पाया?

और यदि आरोपों में तथ्य हैं तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

जातिगत भेदभाव और प्रताड़ना का भी आरोप

अनिल कुमार परते ने अपनी शिकायत में जनजातीय पहचान के कारण भेदभाव और प्रताड़ना किए जाने का भी आरोप लगाया है। इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे गंभीर आरोप की वास्तविकता भी निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।

निष्पक्ष जांच हुई तो साफ होगा—आरोप में कितना दम?

पूरे मामले में सबसे जरूरी है कि जांच निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से पूरी हो। यदि 25 हजार रुपये की कथित मांग और 10 हजार रुपये दिए जाने के आरोप सही साबित होते हैं तो जिम्मेदारों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि शिकायत में लगाए गए आरोप निराधार निकलते हैं तो विभाग को भी तथ्य सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

सवाल एक कर्मचारी का नहीं, व्यवस्था की जवाबदेही का है

एक छोटे कर्मचारी को अपने काम का वेतन पाने के लिए आखिर कितने आवेदन देने पड़ेंगे? जांच के लिए निर्धारित चार दिवस की समयसीमा का क्या हुआ? शिकायतकर्ता कार्यालयों के चक्कर लगाता रहेगा या विभाग आरोपों की निष्पक्ष जांच कर स्थिति स्पष्ट करेगा? अब निगाह जांच रिपोर्ट और विभागीय कार्रवाई पर टिकी है।



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