अटैचमेंट की मलाई पर कलेक्टर का वार! मूल स्कूलों में लौटेंगे शिक्षक, शिक्षकविहीन स्कूलों को मिलेगी संजीवनी
जिले के आदिवासी अंचलों में लंबे समय से शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर रही शिक्षकों की अटैचमेंट और संलग्नीकरण व्यवस्था पर अब जिला प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। कलेक्टर (जनजातीय कार्य विभाग) मंडला द्वारा 7 सितंबर 2026 को जारी आदेश क्रमांक 6103 में जनजातीय कार्य विभाग के अंतर्गत संचालित विद्यालयों में स्थानांतरण नीति के अतिरिक्त अन्य व्यवस्था के नाम पर मूल पदस्थापना वाले विद्यालय से अलग कार्य कर रहे शिक्षकों के आदेश तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिए गए हैं।
सात दिन में मूल स्कूल में देनी होगी आमद
आदेश में स्पष्ट किया गया है कि ऐसे सभी शिक्षक सात दिवस के भीतर अपनी मूल पदस्थापना वाले विद्यालय में उपस्थित होकर आमद देंगे तथा उनकी उपस्थिति का प्रतिवेदन विकासखंड शिक्षा अधिकारी के माध्यम से जिला कार्यालय को भेजा जाएगा।
संबंधित संस्था प्रमुखों को भी आदेश के पालन के लिए आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। यानी अब केवल आदेश जारी कर देना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि शिक्षकों की मूल संस्था में वापसी की जानकारी भी जिला स्तर तक पहुंचानी होगी।
- स्थानांतरण नीति से अलग किए गए संलग्नीकरण तत्काल प्रभाव से निरस्त।
- संबंधित शिक्षकों को सात दिवस में मूल विद्यालय लौटना होगा।
- मूल पदस्थापना वाले विद्यालय में आमद देना अनिवार्य।
- विकासखंड शिक्षा अधिकारी के माध्यम से जिला कार्यालय को भेजा जाएगा प्रतिवेदन।
- संस्था प्रमुखों को आदेश के पालन की जिम्मेदारी दी गई।
मवई, घुघरी जैसे दूरस्थ अंचलों के शिक्षकविहीन स्कूलों को मिल सकती है बड़ी राहत
मंडला जिले के मवई, घुघरी सहित अन्य दूरस्थ एवं आदिवासी विकासखंडों में कई ऐसे विद्यालय हैं, जहां शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की शिकायतें सामने आती रही हैं।
दूसरी ओर, मूल पदस्थापना वाले विद्यालय से शिक्षक को हटाकर अन्य स्थानों पर संलग्न किए जाने से कहीं-कहीं विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता असंतुलित होने के सवाल उठते रहे हैं।
कलेक्टर का यह आदेश यदि जमीनी स्तर पर पूरी सख्ती से लागू होता है तो मूल पदस्थापना वाले शिक्षकविहीन एवं शिक्षकों की कमी से जूझ रहे विद्यालयों में शिक्षकों की वापसी से बच्चों की पढ़ाई को सीधा लाभ मिल सकता है।
अब देखना यह है—कागज का आदेश जमीन पर कितना उतरता है?
आदेश जारी होना निश्चित रूप से एक सकारात्मक पहल है, लेकिन असली परीक्षा अब इसके क्रियान्वयन की है। सवाल यह भी रहेगा कि वर्षों से विभिन्न कार्यालयों, सुविधाजनक स्थानों अथवा अन्य विद्यालयों में संलग्न शिक्षकों की वास्तव में मूल पदस्थापना पर वापसी होती है या फिर किसी नए आदेश के जरिए व्यवस्था को फिर पुराने ढर्रे पर डाल दिया जाता है।
विकासखंड शिक्षा अधिकारियों पर टिकी निगाहें
कलेक्टर की इस कार्रवाई से शिक्षा व्यवस्था में यदि ‘अटैचमेंट संस्कृति’ पर स्थायी रोक लगती है तो यह मंडला के दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों के हजारों विद्यार्थियों के हित में बड़ा कदम साबित हो सकता है।
अब निगाहें विकासखंड शिक्षा अधिकारियों और संबंधित संस्था प्रमुखों पर हैं कि वे कलेक्टर के आदेश का पालन कितनी गंभीरता से कराते हैं और सात दिन की समय-सीमा समाप्त होने तक कितने शिक्षक वास्तव में अपने मूल विद्यालयों में वापस पहुंचते हैं।


