साक्षरता का ढोल पीट रही सरकार, शिक्षा प्रेरकों का भविष्य क्यों अंधेरे में?
अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर साक्षर भारत मिशन के पूर्व शिक्षा प्रेरकों का फूटा आक्रोश वर्षों तक गांव-गांव शिक्षा की अलख जगाने वालों को अब सेवा बहाली के लिए करना पड़ रहा संघर्ष
साक्षर भारत मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षों तक काम कर चुके शिक्षा प्रेरक आज सेवा बहाली और रोजगार की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जिस समय सरकार को साक्षरता अभियान जमीन तक पहुंचाना था, तब उनकी सेवाएं ली गईं, लेकिन मिशन समाप्त होने के बाद बड़ी संख्या में प्रेरक बेरोजगारी के दौर में पहुंच गए।
जिस सरकार को निरक्षरों को साक्षर बनाने के लिए शिक्षा प्रेरकों की जरूरत थी, उसी व्यवस्था में अब उनके वर्षों के अनुभव का उपयोग क्यों नहीं हो रहा?
जिन्होंने दूसरों को अक्षर ज्ञान दिया, उनके घर का चूल्हा कौन जलाएगा?
शिक्षा प्रेरकों का कहना है कि साक्षर भारत मिशन के दौरान उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में निरक्षर लोगों को पढ़ाने, उन्हें शिक्षा से जोड़ने, सर्वे करने और साक्षरता के प्रति जागरूकता फैलाने का काम किया। गांवों की चौपाल से लेकर घर-घर तक अभियान पहुंचाने में उन्होंने वर्षों तक सेवाएं दीं।
मिशन समाप्त होने के बाद बड़ी संख्या में शिक्षा प्रेरकों की सेवाएं भी समाप्त हो गईं। अब उनकी मांग है कि सरकार उनके अनुभव, सेवाकाल, योग्यता और योगदान को देखते हुए उन्हें पुनः रोजगार देने अथवा उपयुक्त शासकीय योजनाओं में समायोजित करने का रास्ता निकाले।
पूर्व शिक्षा प्रेरकों का आरोप है कि उनकी मांग लंबे समय से सरकार के सामने रखी जा रही है, लेकिन सेवा बहाली अथवा वैकल्पिक रोजगार को लेकर अब तक अपेक्षित ठोस नीतिगत निर्णय सामने नहीं आया है।
साक्षरता दिवस पर सरकार से पांच बड़े सवाल
पहला सवाल— अगर शिक्षा प्रेरकों का काम महत्वपूर्ण था, तो उनकी सेवाएं समाप्त होने के बाद उनके भविष्य की जिम्मेदारी किसकी है?
दूसरा सवाल— वर्षों तक सरकार की साक्षरता मुहिम को जमीन पर उतारने वाले शिक्षा प्रेरकों के अनुभव का उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा?
तीसरा सवाल— नई योजनाओं में रोजगार के अवसर तैयार किए जा सकते हैं तो अनुभवी पूर्व शिक्षा प्रेरकों के लिए कोई रास्ता क्यों नहीं बनाया जा सकता?
चौथा सवाल— क्या शिक्षा प्रेरकों के योगदान की चर्चा केवल साक्षरता दिवस तक सीमित रहेगी या उनके परिवारों की आजीविका पर भी कोई निर्णय होगा?
सबसे बड़ा सवाल— जब लक्ष्य “सब पढ़ें, सब बढ़ें” है, तो देश को पढ़ाने में योगदान देने वाले पूर्व शिक्षा प्रेरकों के रोजगार और भविष्य की दिशा कौन तय करेगा?
मंच पर साक्षरता, जमीन पर बेरोजगारी!
शिक्षा प्रेरकों का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाते समय उन लोगों की स्थिति पर भी चर्चा होनी चाहिए, जिन्होंने साक्षरता अभियान को गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचाने में भूमिका निभाई।
उनका आरोप है कि घोषणाओं और उनकी मौजूदा स्थिति के बीच बड़ा अंतर है। एक तरफ शिक्षा और साक्षरता के विस्तार की बात की जाती है, वहीं दूसरी तरफ इसी व्यवस्था में वर्षों तक काम कर चुके पूर्व प्रेरक रोजगार की मांग लेकर संघर्ष कर रहे हैं।
शिक्षा प्रेरकों का कहना है कि उनके पुराने अनुभव का उपयोग पंचायत स्तर, शिक्षा विभाग, साक्षरता कार्यक्रमों और अन्य उपयुक्त शासकीय योजनाओं में किया जा सकता है। सरकार को उनकी योग्यता और सेवाकाल को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट नीति बनानी चाहिए।
आश्वासन नहीं, नीतिगत निर्णय की मांग
पूर्व शिक्षा प्रेरकों ने सरकार से सेवा बहाली अथवा सम्मानजनक वैकल्पिक रोजगार के संबंध में ठोस निर्णय लेने की मांग की है। उनका कहना है कि अब केवल आश्वासन से समस्या का समाधान नहीं होगा। सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें वर्षों तक साक्षरता अभियान में काम करने वाले लोगों के अनुभव का उपयोग हो सके।
अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर पूर्व शिक्षा प्रेरकों का सवाल केवल नौकरी तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि वर्षों तक सरकारी अभियान में काम करने वाले लोगों के अनुभव और भविष्य को लेकर नीति क्या है? क्या इन हाथों को दोबारा काम मिलेगा, या हर वर्ष साक्षरता दिवस के भाषणों के बीच उनकी रोजगार की मांग फिर फाइलों में दब जाएगी?
