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अनुशासित जीवन से ही परिवार, समाज और राष्ट्र की उन्नति संभव : सरोज कंसारी

 *आलेख:* शिक्षक दिवस

 



दैनिक रेवाँचल टाईम्स - शिक्षक एक दिया जो पढ़ाते-पढ़ाते खुद भी निरंतर सीखता रहता है : सुश्री सरोज कंसारी 

'अनुशासित जीवन से ही किसी भी परिवार, समाज व राष्ट्र की उन्नति संभव है। बच्चों के सर्वांगीण विकास का प्रमुख आधार अनुशासित जीवन ही है।'_


जीवन जीने के सबके अपने-अपने ढंग होते हैं। कोई सामान्य रूप से जीते हैं, बस हर पल को काटते हैं। न कोई उद्देश्य होता है, न उत्साह। बस रोटी, कपड़ा और मकान के लिए प्रयत्नशील रहते हैं, इससे ज्यादा न सोचते हैं और न चाहते हैं।...और ऐसे भी बहुत लोग हमारे आसपास होते हैं, जिन्हें अधिक धन-दौलत, शोहरत, भौतिक सुख-सुविधा और पद-प्रतिष्ठा की चाह होती है। जिसके लिए वे दिन-रात मेहनत करते हैं, कहीं विश्राम नहीं करते। उनकी एक ही सोच होती है कि किसी चीज की कमी न हो। उन्हें बाह्य समृद्धि और दिखावे से भरे जीवन से अधिक लगाव होता है, जिसके लिए वे किसी भी तरीके से कमाई करने से पीछे नहीं हटते। भाग-दौड़ करते हैं और कभी संतुष्ट नहीं होते। एक-एक पाई का हिसाब रखते हैं, लेकिन अंत तक उसका कुछ अंश भी न जरूरतमंद को देते हैं, न दान करते हैं, न किसी सार्वजनिक हित के कार्य में खर्च करते हैं। सोते, उठते-बैठते एक ही चिंता होती है कि कैसे और कहाँ से अधिक एकत्रित किया जाए। पूरी जिंदगी गुजर जाती है, लेकिन अपनी ही कमाई का वे उपभोग नहीं कर पाते, क्योंकि समय ही नहीं मिलता और अपने व्यवहार से भी कभी किसी के दिल में स्थान नहीं बना पाते। कुछ साधारण दिखने और सहज रहने वाले, असाधारण प्रतिभा के धनी भी होते हैं, जो अपने लिए एक स्वस्थ दिनचर्या का निर्माण करते हैं। जिनके लक्ष्य विशाल होते हैं, जो मानवता के कल्याण, धर्म, नैतिकता और बुराइयों को मिटाने के लिए दृढ़ संकल्पित होते हैं। अपने हर सुख को औरों के हित में समर्पित कर देते हैं और त्याग, तपस्या, साधना के पथ पर चलकर महान व्यक्तित्व का निर्माण कर औरों से अलग अपनी पहचान बनाते हैं। वे कहते नहीं, अपने नेक विचार और अनुशासित जीवन से अनुकरणीय चारित्रिक गुणों का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जो हर वर्ग के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होते हैं। जब कोई संसार के लिए मंगलमय कामना कर उस दिशा में बढ़ता है, तो उसके मार्ग में कई बाधाएं आती हैं, पर वे घबराते नहीं। एक चमक होती है उनके चेहरे पर कुछ कर दिखाने की। वे अपने लिए नहीं, समस्त मानव जाति के लिए जीते हैं, जिन्हें कुछ भी खोने और पाने का भय नहीं होता। वे अपने-पराए, मेरे-तेरे के भाव से परे हो जाते हैं, सिर्फ कर्म पर विश्वास करते हैं। जीवन में महान कार्य करने वाले संयमित, मर्यादित और संस्कारी होते हैं, अपनी हर गतिविधि पर खुद नियंत्रण रखकर कार्य करते हैं। उनके एक-एक पल का सदुपयोग होता है, वे कभी किसी के बहकावे में नहीं आते। मंजिल उन्हीं को मिलती है, जो किसी भी परिस्थिति में अच्छाई का मार्ग नहीं छोड़ते, अपने लिए एक नियम बनाते हैं और आजीवन उसी पर अमल करते हैं। हम अक्सर कहते-सुनते हैं कि बच्चे अव्यावहारिक हो रहे हैं, जीवन में कोई खुशी नहीं, शांति नहीं, चारों तरफ एक गमगीन माहौल है, सभी एक-दूसरे के स्वभाव से परेशान हैं, सफलता नहीं मिलती। इसका एक ही कारण है - अनुशासित जीवन की कमी। लोग जरा-सी बात पर व्याकुल हो जाते हैं, नियंत्रण नहीं कर पाते, गुस्से पर काबू नहीं रख पाते, कोई भी बात अपने खिलाफ सुन नहीं सकते, अपनी गलती को स्वीकार नहीं करते। कारण है, अनुशासन का सर्वत्र अभाव। अपनी जिंदगी में तो सब कुछ बेहतर ही करना चाहते हैं, लेकिन दूसरों को वह अपने आचरण से नहीं दे पाते, जो वे औरों से अपने लिए चाहते हैं। हर इंसान को अपने लिए एक सार्थक नियम, लक्ष्य और सकारात्मक जीवन शैली बनाकर उस पर चलने की आदत होनी चाहिए, जिसमें क्या सही और क्या गलत है इसका विवेक हो, पवित्र हृदय और भाव हो, जिससे किसी का अहित न हो। आज जरूरत है एक सार्थक चिंतन की, जिसमें बालक-बालिकाओं के संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास कर भविष्य के लिए एक श्रेष्ठ, सेवाभावी, देशभक्त, आज्ञाकारी, परोपकारी, साहसी, पराक्रमी, धैर्यवान और सक्रिय मनुष्य का निर्माण करने में हम सफल हो सकें, ताकि आने वाली पीढ़ी का भविष्य उज्ज्वल हो, उनमें मानवीय गुणों का संचार हो, जिसकी कल्पना हर अभिभावक, शिक्षक और समाज करता है। आज चारों तरफ आधुनिकता की हवा चल रही है, पाश्चात्य सभ्यता को अपनाने के लिए हर कोई आतुर नजर आता है। ऐसे में यह एक चिंतनीय विषय है। उद्दंड होते बच्चे, युवा वर्ग और तनाव से ग्रसित परिवार के मुखिया - सभी के पास एक अहम जिम्मेदारी है। यदि उनकी अश्लीलता, फूहड़ता, आपराधिक प्रवृत्ति और नुकसानदायक शरारत को समय रहते सुधारने का प्रयास नहीं करेंगे, तो आने वाले समय में बहुत ही भयानक स्थिति का सामना करना पड़ेगा। कल को बेहतर बनाने और समृद्ध राष्ट्र के निर्माण के लिए अपने युवा बच्चों की भावनाओं, आकांक्षाओं और कल्पनाओं को हौसले की उड़ान देनी होगी। चारित्रिक विकास के बिना किसी भी प्रगति की कल्पना नहीं की जा सकती। आज हम शिक्षा के साथ सभी भौतिक सुविधाएं बच्चों को दे रहे हैं, लेकिन सबसे जरूरी है अनुशासित जीवन, जिसकी कल्पना तो करते हैं, लेकिन उस दिशा में जितने प्रयास जरूरी हैं, उतने कर नहीं पा रहे। आज की युवा पीढ़ी को अनुशासित जीवन जीने के लिए सुखद वातावरण और उसके अनुरूप व्यवहार देने की आवश्यकता है। एक बच्चे को अगर बचपन से ही अच्छा माहौल दें, तो उसे हम भविष्य में अच्छे कार्य के लिए तैयार कर सकते हैं। जीवन के सफर में कठिन कार्य करने और मंजिल तक पहुंचने के लिए अनुशासित कार्य हेतु उन्हें प्रेरित करना जरूरी है। हर किसी के लिए अनुशासन जरूरी है। बच्चे किसी भी राष्ट्र की मजबूत नींव होते हैं। उन्हें समाज, परिवार और किसी भी विपरीत परिस्थिति में अनुकूल व्यवहार करने के लिए मार्गदर्शन देना जरूरी है। बच्चों को लाड़-प्यार देना गलत बात नहीं है। प्रेम से सींचकर ही उनकी कोमल भावनाओं को संस्कृति, परंपरा और सभ्यता के अनुकूल आकार देना है। क्या सही है और क्या गलत, इस पर उनका ध्यान आकर्षित करें, उनमें सुनने की आदत डालें। जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, उनका मानसिक विकास होता है, वे हर बात का अनुकरण करने लगते हैं, अपने परिवार और आसपास को देखकर सीखते हैं।...एकदम ज्यादा बंधन भी ठीक नहीं, न ही ज्यादा छूट देना ठीक है। कभी गलती हो जाने पर उन्हें पहले प्रेम से समझाइए, उदाहरण दीजिए, गलत करने का परिणाम क्या हो सकता है यह बताइए। कुछ बच्चे जिद्दी होते हैं, जो समझने की कोशिश नहीं करते और मनमानी करते हैं, जब तक चोट न लगे तब तक सुधरते नहीं। अलग-अलग स्वभाव के बच्चे होने के कारण उन्हें उनकी शरारत के अनुसार नियंत्रित करना पड़ता है। सजा देने से कुछ हद तक सुधार हो सकता है, यह ठीक भी है, लेकिन आज सबसे ज्यादा उन्हें स्नेह, करुणा, दया और ममता की जरूरत होती है। हम किसी के असभ्य व्यवहार को अपनेपन से सुधार सकते हैं। ज्यादा मारने-डांटने से उनकी मानसिक और बौद्धिक क्षमता अवरुद्ध हो जाती है। शालीनता और धैर्य से उन्हें सुधारने का प्रयास करें। ज्यादा रोकने-टोकने, पढ़ाई के लिए जोर देने, तुलना करने और ताना देने से उनमें हीन भावना आती है और वे कुंठित हो जाते हैं। कठोर व्यवहार पाकर उनमें उदासी आती है, वे गुमसुम हो जाते हैं, डरे और भयभीत रहते हैं, फिर आगे चलकर अपने मन की बात को भी ठीक से व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं। इसलिए हर क्षेत्र में आगे ले जाने और प्रतिस्पर्धा जिताने के चक्कर में उनके बचपन से खिलवाड़ न करें। उन्हें खुले आसमान के नीचे रहने दीजिए, मुस्कुराने, उछलने-कूदने, भागने, खिलखिलाकर हंसने की वजह दीजिए, फिर देखिए वे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहेंगे और आपकी बात भी सुनेंगे। हर बच्चा सुरक्षात्मक वातावरण चाहता है। बस उन्हें सही कार्य के लिए प्रेरित करते रहिए, उन्हें समय दीजिए, उनकी संगति और सोच को जानिए, वे क्या चाहते हैं यह समझिए और खुद भी वैसा ही व्यवहार कीजिए जैसी वे अपेक्षा करते हैं। उनसे प्रेम से ही बात करें और अपने साथ होने का एहसास दिलाएं, उनके मन की हर बात सुनें, जीवन के पथ पर आने वाली हर बाधा से अवगत कराते रहें और बचपन से ही उन्हें मजबूत बनाने का प्रयास करें। एकदम से हाथ पकड़कर न रखें, गिरने, उठने, संभलने और चोट लगने पर रोकर अपने आंसू खुद पोंछने की आदत डालें। बच्चों की एक नियमित दिनचर्या हो। घर का वातावरण ऐसा रखें जिसे देखकर वे स्वयं अनुकरण करें। जल्दी सोने-जागने, स्नान, पूजन, ध्यान-योग, बड़ों का आशीर्वाद लेना, चरण स्पर्श, भजन करना, समय पर भोजन, खेलने-पढ़ने और अपनी रुचि के कार्य को करने का निर्धारित क्रम हो। प्रतिदिन एक निश्चित समय पर कार्य करने की आदत हो जाने पर वे बड़े होकर भी वैसा ही करेंगे।...सबसे ज्यादा जरूरी है उनके मन की भावनाओं को पढ़ना। छोटे बच्चे नादान होते हैं, तीन से लेकर पांच साल तक नाजुक मन के होते हैं। जब तक उनकी इंद्रियों का पूर्ण विकास नहीं हो जाता, वे बड़ी-बड़ी बातों को नहीं जान पाते। अक्सर हम देखते हैं कि जिद्दी बच्चों को डराने के लिए भूत-प्रेत, चुड़ैल, बड़े जानवर का नाम बताया जाता है, जो बिल्कुल गलत है। इससे उनकी मानसिकता विचलित होती है, रात में सपने आते हैं और उनमें डर का संचार होता है। बच्चों से उनकी ही भाषा में बात करें और छोटी-छोटी अच्छी बातों को सिखाएं - गीत, कहानी, कविता, नृत्य, दृश्य के माध्यम से। और उनकी शारीरिक क्षमता के अनुसार काम करने की आदत डालें, जैसे पानी निकालकर पीना, अपना सामान एक स्थान पर रखना, हाथ से भोजन करना, कचरा कूड़ेदान में डालना और भी कई ऐसे कार्य हैं जो कराए जा सकते हैं। अच्छे काम के लिए ताली बजाकर, पीठ थपथपाकर, कुछ उपहार देकर प्रेरित कर सकते हैं। कोई भी चीज हो, मिल-बांटकर खाने की आदत डालें, मारने-झगड़ने पर उन्हें मना करें, किसी का सामान बिना पूछे लेने पर उन्हें बताएं कि यह सही नहीं है। कहते हैं कि प्रेम की भाषा तो पशु भी समझते हैं, फिर बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी को इसकी जरूरत होती है। बच्चे वो बन जाएंगे जो उन्हें बनना है, बस उनके बचपन को संवारने की जिम्मेदारी आपकी है। गुस्सा बच्चों के सामने बिल्कुल न करें, इससे उन पर विपरीत असर होता है। प्रेम से तो सभी वश में हो जाते हैं, फिर वे तो बच्चे हैं। नफरत की एक बूंद भी उन्हें न मिले। युवा होते बच्चे अधिक उत्साही, जिज्ञासु, उतावले और चंचल होते हैं। किसी मनपसंद चीज को पाने, करने और देखने की चाह उनकी बलवती होती है। अपने माता-पिता को देखकर वे बहुत कुछ सीखते हैं। उनके व्यवहार का सबसे ज्यादा प्रभाव युवावस्था में होता है, क्योंकि उनके सोचने-समझने की क्षमता विकसित होती है। लड़ाई-झगड़े और कलहपूर्ण माहौल से वे दुखी होते हैं और यही समय होता है भटकाव का। उन्हें सही मार्गदर्शन न मिलने पर वे बाहरी लोगों की संगति में आकर दिशा भटक जाते हैं। इसलिए उनके जीवन में मिठास घोलने के लिए मीठी वाणी का प्रयोग करें। कड़वाहट के भाव जिंदगी के लिए जहर के समान हैं, इसलिए समझदारी से काम लें। उन्हें समय पर जिम्मेदारी दें, घर-परिवार से जोड़कर रखें, रिश्तों का महत्व बताएं। बड़े-बुजुर्गों के सानिध्य में रहकर वे बहुत कुछ सीखते हैं, उनके अनुभव अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। सेवा करने के लिए उन्हें अवसर दें, सहयोग का महत्व बताएं कि एक-दूसरे के सहयोग से हर काम सफल होता है। गलती हर किसी से होती है और युवा वर्ग में जोश-जुनून अधिक होता है, कभी-कभी वे मनमानी भी करते हैं। गलती हो जाने पर उन्हें माफी मांगने और उसे सुधारने के लिए जरूर कहें। बच्चों को अनुशासन में रहना और जीवन के हर मोड़ पर उसका पालन करने की आदत आप विकसित कर दीजिए, फिर वे उस जगह जरूर पहुंच जाएंगे जहाँ एक सुखद भविष्य होगा, वे स्वयं अपनी मंजिल ढूंढ लेंगे। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे सर्वगुण संपन्न हों और आगे बढ़ें, लेकिन इस बात पर भी ध्यान दें कि पढ़ाई का ज्यादा दबाव और उनसे जरूरत से ज्यादा अपेक्षा उनकी सोच को संकुचित कर देती है। उनमें जो हुनर है, उसी क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर दें। बच्चे को नौकरी, पद-प्रतिष्ठा दिलाने से पहले मर्यादित, अनुशासित और संयमित व्यवहार दें। जब नियम में रहना, बड़ों का सम्मान करना और ध्यान से सुनने की आदत का उनमें विकास हो जाएगा, तो जीवन की हर मुसीबत का सामना करने की कला वे सीख जाएंगे। सबसे जरूरी है चरित्र का निर्माण करना, बाकी सब कुछ बालक अपनी मेहनत से पाने की कोशिश जरूर करते हैं। इसलिए सिर्फ अपने सपनों को पूरा करने के लिए उन पर अनावश्यक दबाव न बनाएं, वे क्या चाहते हैं इस पर भी विचार करें। एक अनुशासित बालक परिवार, समाज और पूरे राष्ट्र के लिए सहयोगी होता है।

   *सुश्री सरोज कंसारी*

लेखिका, कवयित्री व शिक्षिका 

नवापारा, राजिम, रायपुर (छ.ग.)

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