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₹10.99 करोड़ की खरीद पर EOW की FIR, सामाजिक न्याय विभाग की टेंडर प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल



*नए कंप्यूटरों की जगह पुराने उपकरण सप्लाई करने का आरोप, चार फर्मों की भूमिका जांच के घेरे में; UPS की कीमत में भी बड़ा अंतर सामने आया*

दैनिक रेवांचल टाइम्स | भोपाल। मध्यप्रदेश के सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग में कंप्यूटर, प्रिंटर और UPS सहित अन्य उपकरणों की करीब ₹10.99 करोड़ की खरीदी अब जांच के घेरे में आ गई है। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने मामले में चार लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। जांच में टेंडर प्रक्रिया, उपकरणों की खरीदी, और उनकी स्थापना तथा संबंधित फर्मों के बीच कथित संबंधों को लेकर गंभीर सवाल सामने आने की बात कही गई है।

*टेंडर बाद में, उपकरण पहले ही लगाए जाने का आरोप*

मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह निकल कर सामने आ रही हे कि जिन उपकरणों की खरीदी के लिए बाद में निविदा जारी की गई, उनमें से कुछ उपकरण कथित तौर पर उससे पहले ही विभागीय कार्यालयों में गलत तरीके से लगाए जा चुके थे। जांच से जुड़े आरोपों के अनुसार, एक मामले में 22 जुलाई 2024 को कंप्यूटर लगाए जाने की बात सामने आई, जबकि संबंधित निविदा 23 सितंबर 2024 को जारी हुई थी। ऐसे में सवाल है कि यदि उपकरणों की स्थापना टेंडर से पहले हो चुकी थी तो उनकी खरीदी किस प्रक्रिया के तहत की गई?


*चार कंपनियां, लेकिन आपसी संबंधों पर भी सवाल*

EOW की जांच में टेंडर में भाग लेने वाली चार कंपनियों के बीच कथित आपसी संबंधों की भी पड़ताल की जा रही है। आरोप है कि अलग-अलग कंपनियों के नाम से टेंडर में प्रतिस्पर्धा दिखाई गई, लेकिन उनके मोबाइल नंबर, ई-मेल अथवा पते में समानता जैसी बातें जांच में सामने आईं। जो  कि एक सोची समझी प्लानिंग के तहत रुपए को गबन करने की बात निकल कर आ रही हैं। यदि यह तथ्य जांच में प्रमाणित होता है तो इससे पूरी निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।


UPS की कीमत ने भी खड़े किए सवाल*

जांच में उपकरणों की कीमतों को लेकर भी अंतर सामने आने की बात कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार, जिस UPS का अंकित मूल्य करीब ₹6,086 बताया गया, उसकी विभागीय खरीद करीब ₹11,247 में किए जाने का आरोप है। वहीं GeM पर उसी उत्पाद की कीमत करीब ₹3,754 बताए जाने की बात सामने आई है। जो वास्तविक खरीदी से करीब तीन गुना ज्यादा कीमत पर विभागीय खरीदी की गई है। यदि इन कीमतों और उत्पादों का तकनीकी मिलान जांच में सही पाया जाता है तो सरकारी खरीद में मूल्य निर्धारण और खरीद प्रक्रिया की भूमिका भी जांच का महत्वपूर्ण विषय बन सकती है।

*फर्जी Authorization Letter की भी जांच*

मामले में एक कंपनी द्वारा कंप्यूटर निर्माता कंपनी का कथित Authorization Letter प्रस्तुत किए जाने को लेकर भी जांच की जा रही है। आरोप है कि यह दस्तावेज फर्जी हो सकता है। अब जांच एजेंसी इस बात का सत्यापन कर रही है कि संबंधित कंपनी वास्तव में निर्माता कंपनी की अधिकृत विक्रेता थी या नहीं।

*सरकारी खरीद प्रक्रिया पर उठ रहे कई सवाल*

पूरे मामले ने सरकारी विभागों में होने वाली बड़ी खरीद प्रक्रियाओं की निगरानी और पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि करोड़ों रुपये की खरीदी में टेंडर से पहले उपकरणों की स्थापना, कंपनियों के आपसी संबंध, कीमतों में भारी अंतर और अधिकृत दस्तावेजों को लेकर अनियमितताएं जांच में प्रमाणित होती हैं तो यह सरकारी धन के उपयोग और खरीद प्रक्रिया की गंभीर चूक मानी जा सकती है।हालांकि, EOW की जांच अभी जारी है और आरोपों का अंतिम निर्धारण न्यायालय द्वारा किया जाना है। FIR में नाम आने मात्र से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता।


*इन सवालों के जवाब कौन देगा?*

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि करीब 10.99 करोड़ रुपये की इस खरीदी में निर्णय लेने वाले अधिकारी कौन थे? टेंडर से पहले उपकरणों की स्थापना किसके आदेश पर हुई? चारों कंपनियों की पात्रता किसने जांची? उपकरणों की वास्तविक कीमत का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया? और यदि किसी कंपनी ने गलत अथवा फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत किए तो विभागीय स्तर पर उनका सत्यापन क्यों नहीं हुआ? मामले की जांच आगे बढ़ने के साथ यह स्पष्ट होना बाकी है कि सरकारी खजाने से खर्च हुई इतनी बड़ी राशि की खरीद प्रक्रिया में वास्तविक जिम्मेदारी किसकी थी और क्या इससे शासन को आर्थिक नुकसान हुआ।

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