आदेश जारी होने के बावजूद नहीं किया कार्यमुक्त, स्थानांतरण के अमल के लिए कलेक्टर को आवेदन के बाद हाईकोर्ट जबलपुर पहुंचा मामला
दैनिक रेवांचल टाइम्स – जबलपुर। सीधी जिले के राजस्व न्यायालयों में तीन वर्ष से अधिक समय से एक ही पीठासीन अधिकारी के साथ पदस्थ प्रवाचकों के स्थानांतरण का मामला अब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य पीठ, जबलपुर तक पहुंच गया है। आरोप है कि स्थानांतरण आदेश जारी होने के बावजूद संबंधित प्रवाचकों को वर्तमान पदस्थापना से कार्यमुक्त नहीं किया गया, जिसके चलते शासन के स्थानांतरण आदेश का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो सका।
मामला उस समय और गंभीर हो जाता है जब स्थानांतरण की कार्रवाई लंबे समय से एक ही न्यायालय में पदस्थ कर्मचारियों के संबंध में जारी न्यायालयीन निर्देशों और राजस्व मंडल के आदेशों के अनुपालन में की गई थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब स्थानांतरण आदेश जारी हो चुका था तो आखिर संबंधित कर्मचारियों को कार्यमुक्त करने में कौन-सी अड़चन सामने आई?
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद जारी हुए थे आदेश याचिकाकर्ता मुकेश श्रीवास, संपादक रेवांचल टाइम्स मंडला, की ओर से प्रस्तुत याचिका में बताया गया है कि हाईकोर्ट द्वारा W.P. No. 7629/2025 में 3 अप्रैल 2025 को राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली से संबंधित महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए थे। याचिका के अनुसार न्यायालय ने लंबे समय से एक ही न्यायालय में पदस्थ प्रवाचकों के प्रभाव को देखते हुए तीन वर्ष की अवधि के बाद स्थानांतरण की व्यवस्था पर जोर दिया था।
इसके बाद राजस्व मंडल, मध्यप्रदेश, ग्वालियर द्वारा पत्र क्रमांक 976-77, दिनांक 11 अप्रैल 2025 जारी कर तीन वर्ष से अधिक समय से एक ही पीठासीन अधिकारी के न्यायालय में पदस्थ प्रवाचकों को अन्यत्र स्थानांतरित करने तथा अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए।
कलेक्टर ने जारी किए स्थानांतरण आदेश
उक्त निर्देशों के अनुपालन में कलेक्टर सीधी द्वारा 30 जून 2025 को संबंधित प्रवाचकों के स्थानांतरण आदेश जारी किए जाने की जानकारी याचिका में दी गई है।
स्थानांतरण सूची में लक्ष्मीकांत शर्मा, गुरुवचन सिंह, संजीव कुमार तिवारी, लक्ष्मीकांत यादव, रमेश कुमार मिश्रा, बृजेश कुमार पांडेय और श्यामलाल केवट के नाम शामिल बताए गए हैं।
लेकिन आदेश जारी होने के बाद मामला एक नए सवाल पर अटक गया—क्या स्थानांतरण आदेश केवल कागज पर ही रह गया?
आदेश के बावजूद कार्यमुक्त क्यों नहीं?
याचिका में आरोप लगाया गया है कि स्थानांतरण आदेश जारी होने के बावजूद संबंधित सातों प्रवाचकों को उनकी वर्तमान पदस्थापना से कार्यमुक्त नहीं किया गया। परिणामस्वरूप वे पूर्व पदस्थापना स्थल पर ही कार्यरत बने हुए हैं और नवीन पदस्थापना पर स्थानांतरण आदेश का प्रभावी पालन नहीं हो सका।
यहीं से प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। यदि सक्षम अधिकारी द्वारा बाकायदा स्थानांतरण आदेश जारी किया जा चुका है तो उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी किसकी है? क्या कोई ऐसा आदेश है जिसके आधार पर कार्यमुक्ति रोकी गई? यदि हां, तो वह आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? और यदि कार्यमुक्ति रोकने का कोई वैधानिक आधार नहीं है तो फिर स्थानांतरण आदेश पर अमल क्यों नहीं हुआ?
पहले कलेक्टर से लगाई गुहार, फिर पहुंचा मामला हाईकोर्ट
याचिकाकर्ता द्वारा पहले कलेक्टर सीधी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर स्थानांतरण आदेश का पालन कराने तथा संबंधित प्रवाचकों को तत्काल कार्यमुक्त करने की मांग की गई थी। याचिका के अनुसार अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने के बाद अब मामला हाईकोर्ट की शरण में पहुंचा है।
याचिका में न्यायालय से मांग की गई है कि पूर्व में पारित न्यायालयीन आदेश तथा राजस्व मंडल के निर्देशों के अनुरूप कलेक्टर सीधी द्वारा जारी स्थानांतरण आदेश का प्रभावी एवं पूर्ण पालन कराया जाए और संबंधित सातों प्रवाचकों को कार्यमुक्त कर नवीन पदस्थापना स्थल पर कार्यभार ग्रहण कराया जाए।
तीन साल की पदस्थापना नीति पर ही सवाल
यह मामला केवल सात कर्मचारियों के स्थानांतरण तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में वह व्यवस्था है जिसके तहत राजस्व न्यायालयों में लंबे समय तक एक ही पीठासीन अधिकारी के साथ काम करने वाले प्रवाचकों के स्थानांतरण की जरूरत महसूस की गई।
ऐसे में यदि स्थानांतरण आदेश जारी होने के बाद भी कर्मचारी पुराने स्थान पर बने रहते हैं तो यह सवाल स्वाभाविक है कि स्थानांतरण नीति और उसके पीछे की प्रशासनिक मंशा का वास्तविक पालन कैसे होगा?
राजस्व न्यायालयों में पारदर्शिता, निष्पक्षता और प्रशासनिक संतुलन बनाए रखने के लिए लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों के स्थानांतरण को महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए इस मामले में अब निगाहें हाईकोर्ट की सुनवाई और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
सोमवार को सुनवाई
मामले की सुनवाई सोमवार को नियत बताई गई है। याचिकाकर्ता मुकेश श्रीवास की ओर से अधिवक्ता गोपाल सिंह बघेल हाईकोर्ट जबलपुर में पैरवी कर रहे हैं।
वही अब देखना होगा कि हाईकोर्ट के समक्ष रखे गए तथ्यों पर क्या आदेश सामने आता है और सीधी जिला प्रशासन द्वारा पहले से जारी स्थानांतरण आदेश का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाता है या नहीं।
सवाल सीधा है—जब आदेश जारी हो चुका है, तो फिर कार्यमुक्ति क्यों नहीं? और यदि आदेश का पालन ही नहीं होना है, तो प्रशासनिक आदेशों की वैधानिकता और प्रभावशीलता पर भरोसा कैसे कायम रहेगा?
.jpg)