दैनिक रेवांचल टाइम्स – मंडला, जिले के जनपद पंचायत बीजाडांडी,में एक और नया घोटाला सामने आया है जहाँ प्राप्त जानकारी के अनुसार जनपद पंचायत बीजाडांडी में पदस्थ लेखापाल सतीश कुमार पांडेय के वेतन निर्धारण एवं सर्विस बुक से जुड़े प्रकरण में ₹45,26,450 की राशि वसूली के लिए निर्धारित किए जाने का मामला जनपद सदन में पहुंचा है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार वेतन पुनर्निर्धारण के बाद ₹29,62,990 का अधिक भुगतान तथा ₹15,63,460 का ब्याज निर्धारित किया गया है। हालांकि अभी इसे वास्तविक वसूली नहीं, बल्कि वसूली के लिए निर्धारित राशि कहना ही उचित होगा, क्योंकि अंतिम वसूली आदेश पर सक्षम स्तर से कार्रवाई होना शेष बताई जा रही है।
लेकिन इस पूरे मामले ने एक बड़ा और असहज सवाल खड़ा कर दिया है—जांच में सरकारी राशि की गड़बड़ी निकल आती है, राशि की गणना भी हो जाती है, ब्याज भी जोड़ दिया जाता है, फिर सरकारी खजाने में पैसा वापस कब आएगा?
शिकायत हुई, जांच हुई, राशि निकली... अब वसूली का इंतजार
जनपद सदस्य राजेंद्र पुट्टा ने 21 मार्च 2025 को लेखापाल की सर्विस बुक के संधारण एवं वेतन निर्धारण में कथित अनियमितताओं की शिकायत की थी। शिकायत के बाद सर्विस बुक को सुरक्षित कर जांच के लिए संबंधित कोष एवं लेखा/स्थानीय निधि संपरीक्षा अधिकारियों के पास भेजा गया।
जांच और पुनर्गणना के बाद उपलब्ध गणना-पत्रक में ₹29.62 लाख का अधिक भुगतान सामने आया। इसके साथ ₹15.63 लाख ब्याज जोड़े जाने पर कुल राशि ₹45.26 लाख निर्धारित की गई। यानी सरकारी मशीनरी ने यह तो पता लगा लिया कि कितनी राशि अधिक भुगतान के रूप में गई, लेकिन अब असली परीक्षा इस बात की है कि यह राशि सरकारी खाते में वापस आती भी है या नहीं।
मंडला जिले में ‘जांच’ के बाद क्या होता है?
बीजाडांडी का यह मामला अकेला सवाल नहीं है। मंडला जिले के विभिन्न सरकारी विभागों में समय-समय पर वित्तीय अनियमितताओं, शासकीय राशि के दुरुपयोग, नियम विरुद्ध भुगतान और कथित भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई मामलों में जांच बैठती है, फाइलें खुलती हैं, गणना होती है और वसूली योग्य राशि भी निर्धारित कर दी जाती है।
लेकिन इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण चरण—वास्तविक वसूली—कई मामलों में सवाल बनकर रह जाता है।
आम चर्चा और सामने आने वाले प्रकरणों में यह सवाल बार-बार उठता है कि जांच के बाद जिम्मेदारी तय करने और राशि निर्धारित करने को ही कार्रवाई की पूर्णता क्यों मान लिया जाता है? यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी से शासकीय राशि की वसूली निर्धारित हुई है तो फिर सरकारी खजाने में वह पैसा जमा हुआ या नहीं, इसकी सार्वजनिक जानकारी क्यों नहीं दिखाई देती?
‘रिकवरी निकाल दी’ और ‘रिकवरी कर ली’ में जमीन-आसमान का अंतर
सरकारी रिकॉर्ड में किसी कर्मचारी से ₹10 लाख, ₹20 लाख या ₹45 लाख की वसूली निर्धारित होना एक बात है और उस राशि का वास्तव में सरकारी खाते में जमा होना दूसरी बात।
वसूली निर्धारण कोई उपलब्धि नहीं, वसूली की रकम सरकारी खजाने में जमा होना असली परिणाम है।
यही वजह है कि बीजाडांडी के मामले में भी अब सबसे बड़ा सवाल अंतिम वसूली आदेश और उसके बाद की कार्रवाई को लेकर है। यदि ₹45.26 लाख की राशि वसूली योग्य निर्धारित हुई है तो जिला प्रशासन और संबंधित विभाग को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि वसूली आदेश कब जारी हुआ, राशि कब जमा हुई और यदि जमा नहीं हुई तो जिम्मेदार अधिकारी ने अब तक क्या कार्रवाई की?
भ्रष्टाचार पर कार्रवाई सिर्फ फाइलों तक सीमित न रहे सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच होना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि जांच का परिणाम जमीन पर दिखाई दे।
यदि जांच में शासकीय राशि का अधिक भुगतान या वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होती है, तो केवल ‘राशि निर्धारित’, ‘वसूली प्रस्तावित’ या ‘रिकवरी निकाली गई’ लिखकर फाइल बंद कर देना पर्याप्त नहीं हो सकता। जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकारी नुकसान की भरपाई वास्तव में हुई या नहीं।
और यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी की लापरवाही अथवा नियमविरुद्ध कृत्य से सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा है, तो केवल राशि की वसूली ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और सेवा संबंधी कार्रवाई का प्रश्न भी जांच के दायरे में आना चाहिए।
क्या वसूली तक पहुंचेगा प्रशासन का हाथ? बीजाडांडी के इस प्रकरण में जनपद सदस्य की शिकायत के बाद जांच आगे बढ़ी और ₹45.26 लाख की राशि निर्धारित होने तक मामला पहुंचा। अब गेंद सक्षम अधिकारी के पाले में है।
देखना यह होगा कि मामला भी मंडला जिले के उन प्रकरणों की तरह ‘जांच हुई—राशि निकली—फाइल आगे बढ़ी’ तक सीमित रहता है या वास्तव में सरकारी खजाने में पूरी राशि वापस जमा कराई जाती है।
क्योंकि जनता अब सिर्फ जांच रिपोर्ट नहीं चाहती। जनता जानना चाहती है—सरकारी पैसा गया कितना, दोष किसका था और वापस आया कितना?
जिला प्रशासन के सामने बड़ा सवाल
मंडला जिले में यदि अलग-अलग विभागों में वसूली योग्य राशि निर्धारित की गई है तो जिला प्रशासन को विभागवार यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए कि—
कितने मामलों में सरकारी राशि की वसूली निर्धारित हुई?
कितनी राशि वास्तव में सरकारी खाते में जमा हुई? कितनी राशि आज भी बकाया है? किन अधिकारियों-कर्मचारियों से वसूली लंबित है? किन मामलों में विभागीय अथवा अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई?
और कितने मामलों में संबंधित कर्मचारी अभी भी उसी पद अथवा जिम्मेदारी पर कार्यरत हैं?
जांच का उद्देश्य सिर्फ भ्रष्टाचार का आंकड़ा निकालना नहीं, बल्कि सरकारी नुकसान की भरपाई और जिम्मेदार व्यक्ति पर कार्रवाई सुनिश्चित करना होना चाहिए।
बीजाडांडी का ₹45.26 लाख वाला प्रकरण अब इसी कसौटी पर प्रशासन की परीक्षा है। राशि कागज पर निर्धारित हो चुकी है—अब देखना है कि सरकारी खजाने तक पहुंचती है या फिर एक और जांच की फाइल बनकर सरकारी कार्यालयों की अलमारियों में दब जाती है।
