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बिना विज्ञापन ‘त्रुटि सुधार’ पर उठे गंभीर सवाल नगर परिषद भुआ-बिछिया के तत्कालीन सीएमओ लक्ष्मण सिंह सारस की कार्यप्रणाली की जांच की मांग


दैनिक रेवांचल टाइम्स – भुआ-बिछिया। नगर परिषद भुआ-बिछिया में तत्कालीन मुख्य नगर पालिका अधिकारी लक्ष्मण सिंह सारस के कार्यकाल के दौरान किए गए कथित ‘त्रुटि सुधार’ की कार्रवाई अब सवालों के घेरे में है। आरोप है कि संबंधित मामले में सार्वजनिक विज्ञापन अथवा आवश्यक सूचना प्रक्रिया अपनाए बिना ही शासकीय अभिलेखों में त्रुटि सुधार की कार्रवाई कर दी गई। हालांकि कार्रवाई वास्तव में किन परिस्थितियों में और किस नियम के तहत की गई, इसका अंतिम सच संबंधित मूल अभिलेखों की निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आ सकेगा।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर शासकीय अभिलेखों में सुधार किस आधार पर किया गया? क्या संबंधित व्यक्ति द्वारा आवेदन प्रस्तुत किया गया था? यदि आवेदन दिया गया तो उसके साथ कौन-कौन से दस्तावेज लगाए गए? मूल अभिलेख में दर्ज जानकारी और बाद में किए गए कथित सुधार के बीच अंतर क्या था? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या इस प्रक्रिया में निर्धारित वैधानिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन किया गया?

मामले की निष्पक्षता से जांच के लिए मूल आवेदन, मूल अभिलेख, संबंधित फाइल, नोटशीट, सक्षम अधिकारी की स्वीकृति, जांच प्रतिवेदन, आपत्तियों से संबंधित दस्तावेज, सार्वजनिक सूचना/विज्ञापन की स्थिति तथा अंतिम आदेश को जांच के दायरे में लिया जाना आवश्यक है। इन्हीं दस्तावेजों से स्पष्ट हो सकेगा कि यह महज अभिलेखीय त्रुटि का नियमानुसार सुधार था या प्रक्रिया में किसी स्तर पर गंभीर चूक हुई।

‘त्रुटि सुधार’ के नाम पर क्या बदला गया?

नगर परिषद जैसे सार्वजनिक निकाय में अभिलेख केवल कागज का हिस्सा नहीं होते, बल्कि नागरिकों के अधिकार और शासकीय निर्णयों का आधार होते हैं। ऐसे में अभिलेखों में किसी भी प्रकार का परिवर्तन पारदर्शी प्रक्रिया के तहत होना आवश्यक है। यदि संबंधित कार्रवाई पूरी तरह नियमों के अनुरूप हुई है तो नगर परिषद और जिला प्रशासन के पास दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

वहीं यदि जांच में यह सामने आता है कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना अभिलेखों में बदलाव किया गया, तो यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि ऐसी कार्रवाई की अनुमति किस स्तर से मिली और उसकी जिम्मेदारी किसकी थी?

उच्चस्तरीय जांच की मांग

स्थानीय नागरिकों ने मामले की निष्पक्ष, दस्तावेज आधारित और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। नागरिकों का कहना है कि मामले को आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखने के बजाय नगर परिषद की संबंधित फाइलों और मूल अभिलेखों का परीक्षण कराया जाना चाहिए। जांच में यदि कार्रवाई नियमसम्मत पाई जाती है तो संबंधित अधिकारी की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल स्वतः समाप्त हो जाएंगे, लेकिन यदि प्रक्रियागत अनियमितता प्रमाणित होती है तो जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही तय कर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

       वही अब पूरे मामले में जिला प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन संबंधित फाइलों की निष्पक्ष जांच कराएगा? क्या कथित त्रुटि सुधार की प्रक्रिया और उसके आधार को सार्वजनिक किया जाएगा? और यदि जांच में नियमों की अनदेखी सामने आती है तो क्या तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों पर जवाबदेही तय होगी?

अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं—क्योंकि अभिलेखों में हुआ सुधार सही था या नियमों को दरकिनार कर किया गया बदलाव, इसका जवाब आरोपों से नहीं बल्कि सरकारी फाइलों से ही मिलेगा।

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