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कृषि विस्तार अधिकारियों की कलमबंद हड़ताल से किसानों की बढ़ी चिंता

 


उपसंचालक कृषि कार्यालय परिसर में कलम बन्द धरना, e-HRMS सहित लंबित मांगों को लेकर आर-पार के मूड में अधिकारी



दैनिक रेवांचल टाईम्स - मंडला। किसानों की खेती-किसानी से जुड़ी योजनाओं, तकनीकी मार्गदर्शन और सरकारी कृषि योजनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने वाले कृषि विस्तार अधिकारियों ने अब शासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। मध्यप्रदेश कृषि विस्तार अधिकारियों द्वारा विभिन्न लंबित मांगों को लेकर कलमबंद हड़ताल शुरू कर दी गई है। मंडला में कृषि विस्तार अधिकारियों ने उपसंचालक किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग के परिसर में धरना देकर शासन के प्रति अपना विरोध दर्ज कराया।



कृषि विस्तार अधिकारियों का कहना है कि वे विभागीय कार्यालयों में बैठकर काम करने वाले कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि उनका अधिकांश कार्य खेतों और गांवों में किसानों के बीच होता है। किसानों को कृषि योजनाओं की जानकारी देना, फसलों से संबंधित तकनीकी मार्गदर्शन, उत्पादन बढ़ाने के उपाय, शासकीय योजनाओं का क्रियान्वयन और किसानों की समस्याओं का निराकरण जैसे महत्वपूर्ण दायित्व इन्हीं अधिकारियों के माध्यम से जमीनी स्तर तक पहुंचते हैं।

ई-हाजिरी की व्यवस्था पर सबसे बड़ा विरोध

अधिकारियों की प्रमुख मांगों में e-HRMS प्रणाली से ई-अटेंडेंस समाप्त करने की मांग शामिल है। उनका तर्क है कि कृषि विस्तार अधिकारियों का कार्य मुख्यालय या कार्यालय तक सीमित नहीं है। उन्हें लगातार गांवों, खेतों और किसानों के बीच भ्रमण करना पड़ता है। ऐसे में केवल ऑनलाइन उपस्थिति को आधार बनाकर मैदानी कार्य का मूल्यांकन करना व्यावहारिक नहीं है।

अधिकारियों का कहना है कि यदि मैदानी कर्मचारी किसानों के बीच जाकर शासन की योजनाओं को लागू करने के बजाय हर समय ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कराने की चिंता में उलझे रहेंगे, तो इसका सीधा असर किसानों तक पहुंचने वाली कृषि सेवाओं पर पड़ेगा।

अधिकारियों की मांगों का असर सीधे किसानों पर?

कृषि विस्तार अधिकारियों की हड़ताल को केवल कर्मचारियों की मांगों का आंदोलन मानकर नजरअंदाज करना शासन के लिए भारी पड़ सकता है। खरीफ सीजन में किसान पहले ही मौसम, फसल लागत, खाद-बीज, कीट प्रकोप और बाजार जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे समय में यदि गांव स्तर पर कृषि विभाग का मैदानी अमला काम से दूर रहता है तो किसानों को योजनाओं और तकनीकी सलाह के लिए भटकना पड़ सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसानों के खेत तक पहुंचने वाला कृषि विभाग का मैदानी तंत्र ही आंदोलन पर है तो शासन की किसान हितैषी योजनाएं जमीन पर कैसे पहुंचेंगी?

लंबे समय से लंबित मांगों पर भी जताई नाराजगी

कृषि विस्तार अधिकारियों ने ज्ञापन के माध्यम से अपनी विभिन्न लंबित मांगों को शासन के समक्ष रखा है। अधिकारियों का कहना है कि कृषि विस्तार अधिकारियों के कार्य की प्रकृति, तकनीकी योग्यता, मैदानी दायित्व और किसानों के साथ सीधे जुड़ी जिम्मेदारियों को देखते हुए उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

अधिकारियों ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यदि शासन स्तर से उनकी मांगों का समाधान नहीं किया गया तो आंदोलन को आगे भी जारी रखा जा सकता है।

अब शासन की परीक्षा—किसान पहले या कागजी व्यवस्था?

कृषि विभाग के अधिकारियों की हड़ताल ने शासन के सामने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है। सरकार लगातार किसान हित, कृषि विकास और गांव-गांव तक योजनाओं को पहुंचाने का दावा करती है, लेकिन जब उन्हीं योजनाओं को खेत तक पहुंचाने वाले अधिकारी अपनी समस्याओं को लेकर सड़क पर उतरते हैं तो शासन की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

     वही अब देखना यह होगा कि सरकार कृषि विस्तार अधिकारियों की मांगों का समाधान निकालकर किसानों तक कृषि सेवाओं की निर्बाध पहुंच सुनिश्चित करती है या फिर आंदोलन लंबा खिंचने के साथ किसान एक बार फिर सरकारी व्यवस्था की खामियों का खामियाजा भुगतेंगे।

      वही रेवांचल टाइम्स टीम की नजर अब इस आंदोलन के अगले कदम और शासन की प्रतिक्रिया पर बनी रहेगी।

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