मंडला शहर में बढ़ते अतिक्रमण से सिकुड़ रही सड़कें और सार्वजनिक रास्ते—आखिर नगर पालिका की नजर कब खुलेगी?
कलेक्टर को शिकायत, नगर पालिका को शिकायत, वर्षों से कार्रवाई का इंतजार; परेशान नागरिक पूछ रहे—प्रशासन नहीं सुने तो आखिर जाएं किसके पास?
दैनिक रेवांचल टाइम्स ।मंडला शहर में सरकारी और नजूल भूमि पर बढ़ते कथित अवैध कब्जों ने अब नगर व्यवस्था की पोल खोलनी शुरू कर दी है। सड़कें सिकुड़ रही हैं, सार्वजनिक रास्तों पर कब्जे बढ़ रहे हैं, पार्किंग के नाम पर रास्ते घिरे जा रहे हैं और सरकारी भूमि धीरे-धीरे निजी उपयोग में आती दिखाई दे रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इसकी शिकायतें जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंच रही हैं, तब भी कार्रवाई के नाम पर आखिर सन्नाटा क्यों है?
मामला केवल अतिक्रमण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी और सरकारी जमीन की सुरक्षा का है।
शिकायत में गंभीर आरोप, फिर भी कार्रवाई कहां?
कलेक्टर कॉलोनी, बस स्टैंड के पीछे तहसील एवं जिला मंडला के स्थायी निवासियों द्वारा 04 अगस्त 2026 को नगर पालिका प्रशासन को दिए गए आवेदन में नजूल भूमि पर कथित अनधिकृत कब्जे को लेकर शिकायत की गई है। आवेदन में स्वामी सीताराम वार्ड निवासी राजा नारायण साहू, राम करण साहू, राजकुमार साहू पिता मुकुंदी लाल साहू सहित चार अनावेदकगणों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की गई है।
शिकायतकर्ताओं के अनुसार संबंधित भूमि नजूल भूमि है, जिसका रकबा लगभग 1200 वर्गफीट बताया गया है। आवेदन में आरोप है कि आवंटित भूमि से अधिक करीब 2000 वर्गफीट भूमि पर कब्जा कर लिया गया और वहां व्यावसायिक निर्माण किए जाने की शिकायत है।
यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो यह महज निजी भूमि का विवाद नहीं, बल्कि सरकारी भूमि के उपयोग और संरक्षण से जुड़ा गंभीर प्रशासनिक विषय बन जाता है।
आवासीय भूखंड पर व्यावसायिक निर्माण का आरोप
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि आवासीय मकान बनाने के लिए नजूल विभाग से मिली भूमि पर कथित रूप से कमर्शियल बिल्डिंग बनाकर व्यवसाय किया जा रहा है।
साथ ही सार्वजनिक सड़क पर टीनशेड लगाकर पार्किंग बनाने और सड़क को कथित रूप से जाम करने की शिकायत भी की गई है, जिससे आम नागरिकों के आवागमन में परेशानी होने की बात आवेदन में कही गई है।
अब सवाल सीधा है—
अगर सार्वजनिक सड़क पर अतिक्रमण है तो उसे हटाने की जिम्मेदारी किसकी है?
अगर सरकारी भूमि पर कब्जा है तो सरकारी जमीन की रक्षा कौन करेगा?
अगर आवासीय उपयोग के लिए दी गई भूमि का व्यावसायिक उपयोग हो रहा है तो नियमों की जांच कौन करेगा?
2021 में भी कार्रवाई का उल्लेख, फिर अतिक्रमण कैसे कायम?
शिकायतकर्ताओं ने अपने आवेदन में दावा किया है कि उक्त भूमि पर पूर्व में भी सीमांकन कर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई 10 फरवरी 2021 को किए जाने का उल्लेख है। आवेदन के अनुसार उस समय तहसीलदार द्वारा अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई नहीं हो सकी।
यदि यह तथ्य रिकॉर्ड में सही है तो फिर छह वर्ष से अधिक समय बाद भी वही विवाद कायम रहना प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
एक बार शिकायत, फिर आवेदन, फिर कार्रवाई की मांग—और आखिर में मामला फाइलों में दब जाए, तो अतिक्रमणकारियों के हौसले क्यों नहीं बढ़ेंगे?
एक और शिकायत में पुलिस तक गुहार
इसी मामले से संबंधित दूसरी शिकायत में आवेदिका द्वारा कलेक्टर को अपनी समस्या बताते हुए आरोप लगाया गया है कि विवाद के चलते उनके पति के साथ कथित रूप से मारपीट भी हुई। शिकायत में यह भी उल्लेख है कि पुलिस थाना एवं पुलिस अधीक्षक को आवेदन दिए जाने के बावजूद उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं किए जाने की बात कही गई है।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच का विषय है, लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि मामला अब केवल जमीन तक सीमित नहीं रह गया है।
जब जमीन विवाद के साथ नागरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का सवाल जुड़ जाए, तब प्रशासन को मामले को गंभीरता से लेना चाहिए।
नगर की सड़कें छोटी, अतिक्रमणकारियों के कब्जे बड़े!
मंडला शहर में अतिक्रमण की समस्या किसी एक मोहल्ले तक सीमित नहीं दिखाई देती। बाजार क्षेत्र से लेकर मोहल्लों और सार्वजनिक रास्तों तक जगह-जगह अतिक्रमण की शिकायतें सामने आती रहती हैं।
कहीं दुकान का सामान सड़क तक पहुंच गया है, कहीं टीनशेड ने रास्ता घेर लिया है, कहीं पार्किंग के नाम पर सार्वजनिक स्थान का इस्तेमाल हो रहा है तो कहीं निर्माण सामग्री और अस्थायी ढांचे रास्तों को संकरा कर रहे हैं।
शहर की आबादी बढ़ रही है, वाहनों की संख्या बढ़ रही है, आवागमन बढ़ रहा है—लेकिन सड़कें और सार्वजनिक रास्ते अतिक्रमण के कारण लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं।
आखिर नगर पालिका प्रशासन इस स्थिति को कब गंभीरता से लेगा?
क्या कार्रवाई सिर्फ गरीब की झोपड़ी तक सीमित है?
यह सवाल जनता के बीच इसलिए भी उठता है कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में अक्सर छोटे और कमजोर लोगों पर प्रशासन की सख्ती दिखाई देती है, लेकिन जब मामला प्रभावशाली लोगों के बड़े निर्माण या व्यावसायिक उपयोग का हो तो कार्रवाई की गति पर सवाल उठने लगते हैं।
क्या मंडला में अतिक्रमण हटाने का पैमाना सबके लिए समान है?
यदि सरकारी भूमि पर कब्जा है तो कब्जाधारी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि आरोप गलत हैं तो प्रशासन जांच कर स्पष्ट करे कि भूमि किसकी है, किस उपयोग के लिए आवंटित हुई है और निर्माण वैध है या नहीं।
नगर पालिका की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
शिकायतकर्ताओं ने नगर पालिका और प्रशासन के समक्ष अपनी समस्या रखी है। ऐसे में अब गेंद पूरी तरह जिम्मेदार अधिकारियों के पाले में है।
शिकायत को दबाना समाधान नहीं है।
जांच करना जरूरी है।
नाप-जोख जरूरी है।
रिकॉर्ड सामने लाना जरूरी है।
और यदि अतिक्रमण पाया जाता है तो उसे हटाना भी जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि पूरी कार्रवाई निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि किसी निर्दोष नागरिक के अधिकार प्रभावित न हों और सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे की शिकायत भी जांच के बिना फाइलों में न दबे।
नगर पालिका प्रशासन से परेशान जनता जाए तो जाए कहां?
मंडला की जनता का सवाल अब यही है।
अगर नगर पालिका में शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं होती,
अगर तहसील में शिकायत के बाद भी मामला आगे नहीं बढ़ता,
अगर सड़क पर अतिक्रमण के बाद भी रास्ता खाली नहीं कराया जाता,
अगर सरकारी भूमि की शिकायत के बाद भी सीमांकन नहीं होता—
तो आम नागरिक आखिर जाए तो जाए कहां?
लोकतंत्र में अधिकारी जनता के लिए हैं और सरकारी जमीन जनता की संपत्ति है। उसकी सुरक्षा किसी व्यक्ति विशेष की मेहरबानी नहीं, बल्कि प्रशासन की वैधानिक जिम्मेदारी है।
अब कलेक्टर और नगर पालिका को देना चाहिए स्पष्ट जवाब
मंडला प्रशासन को चाहिए कि शिकायत में वर्णित भूमि का मौके पर सीमांकन, नजूल रिकॉर्ड की जांच, निर्माण की वैधता, भूमि उपयोग, सड़क एवं सार्वजनिक मार्ग की स्थिति तथा कथित अतिक्रमण की निष्पक्ष जांच कराए।
यदि अतिक्रमण पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई हो और यदि शिकायत निराधार है तो प्रशासन स्वयं स्थिति स्पष्ट करे।
क्योंकि चुप्पी से विवाद खत्म नहीं होता, बल्कि सवाल और गहरे होते हैं।
मंडला शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ नगर पालिका की नहीं, बल्कि राजस्व, प्रशासन और संबंधित विभागों की भी है। अब जरूरत है कि कागजों में घूम रही शिकायतें जमीन पर उतरें और जनता को दिखाई दे कि सरकारी जमीन सच में सरकार की है या फिर कागजों पर ही जनता की संपत्ति बची हुई है।
दैनिक रेवांचल टाइम्स का सीधा सवाल
अतिक्रमणकारियों के हौसले बुलंद क्यों और शिकायतकर्ता परेशान क्यों?
नगर पालिका प्रशासन की चुप्पी मजबूरी है, लापरवाही है या किसी दबाव का परिणाम?
जवाब मंडला की जनता चाहती है।

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