चिरईडोंगरी कृषि विकास केंद्र सील, निरीक्षण में खुली कृषि आदान व्यवस्था की पोल
13 डिब्बियों में 650 ग्राम एक्सपायरी इमामेक्टिन बेंजोएट, अन्य एक्सपायरी दवाओं का भी उल्लेख—सूचना पटल और जरूरी दस्तावेज नहीं मिले
दैनिक रेवांचल टाईम्स - मंडला, चिरईडोंगरी। किसानों की मेहनत और उनकी पूरी साल की कमाई खेत में खड़ी फसल से जुड़ी होती है। ऐसे में किसान जिस कीटनाशक और कृषि सामग्री पर भरोसा करता है, अगर वही सामग्री एक्सपायरी निकल जाए तो सवाल सिर्फ एक दुकान पर नहीं, बल्कि कृषि आदान की निगरानी व्यवस्था पर भी खड़ा होता है।
जानकारी के अनुसार 14 अगस्त 2026 को चिरईडोंगरी स्थित लाइसेंसधारी कृषि विकास केंद्र के निरीक्षण में सामने आई अनियमितताओं ने इसी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कृषि विभाग के निरीक्षण में एक्सपायरी कीटनाशक, आवश्यक दस्तावेजों की अनुपलब्धता और अद्यतन सूचना पटल नहीं होने जैसी कमियां दर्ज की गईं। इसके बाद विभाग ने संबंधित प्रतिष्ठान को आगामी आदेश तक सील कर दिया।
05 मई को एक्सपायर हो चुकी थी दवा, फिर भी प्रतिष्ठान में मिली निरीक्षण विवरण के अनुसार प्रतिष्ठान में इमामेक्टिन बेंजोएट की 13 डिब्बियां, कुल 650 ग्राम, पाई गईं, जिनकी एक्सपायरी तिथि 05 मई 2026 दर्ज थी।
यानी जिस कृषि रसायन की वैधता समाप्त हो चुकी थी, वह निरीक्षण के समय प्रतिष्ठान में मौजूद था। इसके अलावा निरीक्षण में अन्य एक्सपायरी कृषि रसायनों का भी उल्लेख किया गया है—
क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 18.5% w/w SC — 210 मिलीलीटर
बिसपाइरीबैक सोडियम — 10% EC
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कृषि रसायनों की एक्सपायरी तिथि स्पष्ट रूप से पैकेट पर दर्ज होती है, तो फिर एक्सपायर होने के बाद भी ऐसी सामग्री प्रतिष्ठान में कैसे पड़ी रही?
क्या स्टॉक की नियमित जांच नहीं होती थी?
क्या एक्सपायरी उत्पादों को अलग रखने की व्यवस्था नहीं थी?
क्या विक्रेता द्वारा स्टॉक रजिस्टर और संबंधित दस्तावेजों का सही तरीके से संधारण किया जा रहा था !
इन सवालों का जवाब विभागीय जांच में सामने आना जरूरी है।
दवा ही नहीं, दस्तावेज भी गायब!
मामला केवल एक्सपायरी कीटनाशकों तक सीमित नहीं है। निरीक्षण में रासायनिक दवा एवं बीज विक्रय से संबंधित आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं पाए जाने की बात भी दर्ज की गई है।
वहीं प्रतिष्ठान का सूचना पटल भी अद्यतन नहीं मिला।
यह स्थिति अपने आप में गंभीर सवाल पैदा करती है, क्योंकि कृषि आदान विक्रय व्यवस्था में दस्तावेज और स्टॉक का रिकॉर्ड महज कागजी औपचारिकता नहीं, बल्कि किसानों के हितों की सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्था है। अगर किसी किसान को खराब या एक्सपायरी दवा मिलती है और उससे फसल को नुकसान होता है, तो उसके नुकसान की जवाबदेही आखिर किसकी होगी?
किसान की फसल प्रयोगशाला नहीं है!
किसान बाजार से महंगी दवा खरीदता है और उम्मीद करता है कि इससे उसकी फसल बीमारी और कीटों से बचेगी। किसान के पास हर बोतल की गुणवत्ता जांचने की प्रयोगशाला नहीं होती। वह दुकानदार और सरकारी निगरानी तंत्र पर भरोसा करता है।
ऐसे में एक्सपायरी कृषि रसायन का मिलना केवल एक दुकान की अनियमितता मानकर मामला खत्म कर देना पर्याप्त नहीं होगा।
सवाल यह भी है कि जिले में ऐसे कितने कृषि आदान विक्रेताओं के स्टॉक की नियमित और गंभीर जांच हो रही है?
कितनी दुकानों में एक्सपायरी दवाएं मिलीं? कितनों के दस्तावेज अधूरे हैं?
कितने विक्रेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या किसानों तक ऐसी सामग्री पहुंच चुकी थी?
इन सवालों पर कृषि विभाग को सार्वजनिक रूप से जवाब देना चाहिए।
नियमों की अनदेखी पर सील की कार्रवाई
निरीक्षण में दर्ज अनियमितताओं के आधार पर विभाग द्वारा संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई करते हुए कृषि विकास केंद्र को आगामी आदेश तक सील किया गया है।
वही यह कार्रवाई अनुविभागीय अधिकारी कृषि अरविंद कुमार वर्मा के मार्गदर्शन में की गई। निरीक्षण दल में कृषि विस्तार अधिकारी एवं निरीक्षण अधिकारी नारायण धुर्वे की भूमिका रही।
निरीक्षण विवरण में संबंधित एक्सपायरी कीटनाशक के मामले में हेमंत कुमार चौधरी का नाम भी दर्ज किया गया है।
अब असली परीक्षा आगे की जांच की
प्रतिष्ठान सील होना कार्रवाई का अंत नहीं, बल्कि जांच की शुरुआत माना जाना चाहिए।
अब विभाग को यह पता लगाना होगा कि एक्सपायरी दवाएं प्रतिष्ठान में कब से मौजूद थीं, उनका स्टॉक कहां से आया, खरीद-बिक्री और स्टॉक रिकॉर्ड में क्या दर्ज है तथा क्या ऐसी सामग्री किसानों को पहले बेची गई थी।
अगर एक्सपायरी दवा किसान तक पहुंची है तो उसका असर केवल दुकान की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहेगा—उसका नुकसान खेत और किसान की जेब तक जाएगा।
इसलिए जरूरत केवल एक प्रतिष्ठान को सील करने की नहीं, बल्कि पूरे कृषि आदान विक्रय तंत्र की जवाबदेही तय करने की है।
कृषि विभाग अब जिलेभर में करे औचक जांच
चिरईडोंगरी की कार्रवाई के बाद अब किसानों की नजर कृषि विभाग पर है। विभाग यदि वास्तव में किसानों के हितों को लेकर गंभीर है तो जिलेभर में कृषि दवा और बीज विक्रेताओं की अचानक, नियमित और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। स्टॉक रजिस्टर से लेकर बिल, लाइसेंस, बैच नंबर, एक्सपायरी डेट और भंडारण व्यवस्था तक हर बिंदु की जांच हो।
क्योंकि किसान की फसल कोई प्रयोगशाला नहीं है और उसकी मेहनत किसी एक्सपायरी दवा का जोखिम उठाने के लिए नहीं है।
वही चिरईडोंगरी की कार्रवाई ने कम से कम इतना तो साफ कर दिया है कि निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। अब देखना यह है कि विभाग की कार्रवाई केवल एक प्रतिष्ठान की सील तक सीमित रहती है या फिर जिलेभर में कृषि आदान व्यवस्था की वास्तविक सफाई का अभियान शुरू होता है।
किसान को गुणवत्तापूर्ण बीज और सुरक्षित कृषि रसायन देना कोई एहसान नहीं, बल्कि व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
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