संपादकीय:
15 अगस्त केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि उस संघर्ष, त्याग और संकल्प की याद है जिसने भारत को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराया। आज जब देश स्वतंत्रता दिवस के 80वें वर्ष की ओर बढ़ रहा है, तब भारत दुनिया के सामने एक ऐसे राष्ट्र के रूप में खड़ा है जो विकास, आत्मनिर्भरता, तकनीक, बुनियादी ढांचे और आर्थिक सामर्थ्य के नए आयाम छूने का सपना देख रहा है।
आज का भारत विकसित भारत का सपना देख रहा है। सवाल यह है कि इस सपने में मंडला जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले के अंतिम गांव, अंतिम किसान, अंतिम मजदूर और अंतिम आदिवासी परिवार की जगह कितनी मजबूत है?
देश में एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं, डिजिटल इंडिया गांवों तक पहुंच रहा है, चंद्रयान से लेकर आधुनिक तकनीक तक भारत अपनी क्षमता का लोहा मनवा रहा है। शहरों में स्मार्ट सुविधाएं बढ़ रही हैं और भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत कर रहा है। यह उपलब्धियां निश्चित रूप से गर्व का विषय हैं।
लेकिन विकास का असली पैमाना केवल बड़े शहरों की चमकती सड़कें, ऊंची इमारतें और डिजिटल स्क्रीन नहीं हो सकता।
विकसित भारत की असली परीक्षा उस गांव में होगी जहां आज भी पानी के लिए इंतजार है, उस किसान में होगी जिसकी मेहनत का सही मूल्य नहीं मिलता, उस विद्यार्थी में होगी जिसे शिक्षक और संसाधन दोनों की कमी झेलनी पड़ती है और उस आदिवासी परिवार में होगी जिसके घर तक विकास की योजनाएं कागज पर तो पहुंच जाती हैं, लेकिन जमीन पर पहुंचते-पहुंचते उनका दम निकल जाता है।
मंडला जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले के लिए 15 अगस्त का अर्थ इसलिए और भी बड़ा है। यह जिला प्राकृतिक संपदा, जंगल, नर्मदा, संस्कृति और मेहनतकश आदिवासी समाज की पहचान है। यहां के लोगों ने देश की स्वतंत्रता और लोकतंत्र को मजबूत करने में अपना योगदान दिया है। लेकिन आज भी यह सवाल पूछना जरूरी है कि जिस समाज की जमीन, जंगल और संस्कृति देश की पहचान का हिस्सा है, उसके जीवन स्तर में उसी अनुपात में परिवर्तन क्यों नहीं दिखाई देता?
सरकारें आती हैं, योजनाएं आती हैं, बजट आता है, घोषणाएं होती हैं और शिलान्यास के पत्थर लगते हैं। मगर जनता को चाहिए काम—कागज नहीं।
हर घर जल की योजना हो तो हर घर में पानी पहुंचना चाहिए। सड़क बने तो पहली बारिश में सड़क का अस्तित्व खत्म नहीं होना चाहिए। स्कूल हो तो शिक्षक भी होना चाहिए। अस्पताल हो तो डॉक्टर और दवा भी होनी चाहिए। किसान योजना का लाभ ले तो वह वास्तव में किसान तक पहुंचे। गरीब के नाम पर आवास बने तो गरीब की छत वास्तव में खड़ी हो।
विकास का अर्थ यह नहीं कि सरकारी फाइल में योजना 100 प्रतिशत पूर्ण हो गई। विकास तब माना जाएगा जब जनता कहे—हां, हमारे जीवन में बदलाव आया है।
आजादी के अमृतकाल से विकसित भारत की यात्रा में भ्रष्टाचार, लापरवाही और जिम्मेदारी से भागने की प्रवृत्ति सबसे बड़ी बाधाओं में से हैं। यदि किसी योजना का पैसा जनता के लिए है तो वह जनता तक पहुंचना चाहिए। यदि किसी अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई है तो उससे जवाब भी मांगा जाना चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने का माध्यम है।
सरकार चाहे किसी भी दल की हो, सत्ता जनता की है और जवाबदेही भी जनता के प्रति ही होनी चाहिए।
15 अगस्त के मंचों से विकास की उपलब्धियां गिनाना आसान है, लेकिन उसी मंच से यह स्वीकार करना कठिन है कि अभी बहुत कुछ बाकी है। और शायद यही ईमानदार लोकतंत्र की पहचान है—उपलब्धियों पर गर्व हो, लेकिन कमियों पर पर्दा न डाला जाए।
मंडला के आदिवासी अंचल से लेकर देश के महानगरों तक भारत एक साथ आगे बढ़े, तभी विकसित भारत का सपना सार्थक होगा। ऐसा भारत जहां गांव और शहर के बीच अवसरों की खाई कम हो, जहां आदिवासी और वंचित समाज केवल योजनाओं के लाभार्थी नहीं बल्कि विकास की मुख्यधारा के बराबर भागीदार हों।
आज तिरंगा जब आसमान में लहराएगा तो वह केवल स्वतंत्रता का प्रतीक नहीं होगा। वह हमसे सवाल भी करेगा—
क्या आजादी का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा?
क्या विकास का उजाला उस गांव तक पहुंचा जहां अभी भी अंधेरा है?
क्या शासन की योजनाओं का लाभ उस गरीब तक पहुंचा जिसके नाम पर बजट जारी हुआ?
क्या आदिवासी समाज को केवल वोट और आंकड़ों से आगे बढ़कर विकास का बराबर अधिकार मिला?
इन सवालों से भागकर विकसित भारत नहीं बनाया जा सकता।
हमें ऐसा भारत चाहिए जहां सरकार मजबूत हो, प्रशासन जवाबदेह हो, व्यवस्था पारदर्शी हो और जनता जागरूक हो। ऐसा भारत जहां पत्रकार सवाल पूछ सके, किसान अपनी बात कह सके, आदिवासी अपने अधिकारों की आवाज उठा सके और आम नागरिक बिना किसी भय के व्यवस्था से जवाब मांग सके।
15 अगस्त 2026 के इस स्वतंत्रता दिवस पर देश के करोड़ों नागरिकों के साथ मंडला का आदिवासी समाज भी तिरंगे को सलाम करेगा और विकसित भारत के संकल्प में अपना योगदान देगा।
लेकिन सत्ता और व्यवस्था को भी यह संकल्प लेना होगा कि विकास की दौड़ में भारत का कोई गांव पीछे नहीं छूटेगा, कोई आदिवासी परिवार पीछे नहीं छूटेगा और कोई गरीब केवल सरकारी आंकड़ा बनकर नहीं रह जाएगा।
तिरंगा तभी सचमुच ऊंचा रहेगा, जब उसके नीचे खड़ा अंतिम नागरिक भी सिर उठाकर कह सके—यह देश मेरा है, यह विकास मेरा है और इस विकास में मेरा भी बराबर का अधिकार है।
यही स्वतंत्रता का अर्थ है।
यही लोकतंत्र की ताकत है।
और यही विकसित भारत की असली पहचान होगी।
आप सभी नगर व देश वासियों को स्वतंत्रता दिवस की दैनिक रेवांचल परिवार की ओर हार्दिक शुभकामनाएं एवं ढेर सारी बधाइयां💐
