दैनिक रेवाँचल टाईम्स - भद्रावती नगरी में सुजित नाम के एक प्रतापी राजा राज करते थे। उनके पास धन, वैभव और राज्य सब कुछ था, लेकिन वे संतानहीन (निःसंतान) होने के कारण बेहद दुखी रहते थे। राजा की चिंता बढ़ती गई और प्रजा भी राजा के दुःख से दुखी रहने लगी।एक दिन राजा दुखी होकर अपने घोड़े पर सवार होकर जंगल की ओर निकल पड़े। जंगल में घूमते-घूमते उन्हें लोमश ऋषि के आश्रम के दर्शन हुए। राजा ने ऋषि को साष्टांग प्रणाम किया। ऋषि ने उनके आने का कारण पूछा, तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा, "हे महर्षि! मैंने अपने जीवन में कई अच्छे कार्य किए हैं, यज्ञ और दान किए हैं, फिर भी मैं संतान सुख से वंचित हूँ। कृपया मुझे इसका उपाय बताएं।" लोमश ऋषि ने ध्यान लगाकर राजा के पूर्व जन्म का हाल जाना और कहा, "राजन्! तुमने पिछले जन्म में पाप किया था। तुम पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य थे। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दोपहर के समय तुम एक जलाशय पर पानी पीने पहुँचे। उसी समय एक प्यासी गाय अपने बछड़े के साथ वहां जल पीने आई, लेकिन तुमने प्यास से व्याकुल उस गाय को पानी पीने से रोक दिया और उसे हांककर दूर हटा दिया तथा खुद पहले पानी पिया। उसी गाय को कष्ट देने के पाप-कर्म के कारण तुम्हें इस जन्म में संतानहीनता का दुःख सहना पड़ रहा है। अब इस पाप से मुक्ति पाने के लिए तुम्हें श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी का विधि-विधान से व्रत करना चाहिए."ऋषि के वचनों को सुनकर राजा और उनकी प्रजा ने नगर में वापस आकर विधि-विधान के साथ पुत्रदा एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव और जागरण के पुण्य से रानी ने गर्भ धारण किया और कुछ समय पश्चात एक तेजस्वी एवं गुणवान पुत्र को जन्म दिया।
*पं मुकेश जोशी 9425947692*
