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एमपी के मोबाइल उपभोक्ता छत्तीसगढ़ के नेटवर्क पर निर्भर, बीएसएनएल के टॉवर बने शोपीस


तीन साल से खड़े हैं टॉवर, उपकरणों के अभाव में नहीं हो सके शुरू, ग्रामीणों ने की चालू करने की मांग


दैनिक रेवाँचल टाईम्स - बजाग विकासखंड के अंतिम छोर पर बसे बैगांचल क्षेत्र के ज्यादातर गांव आज भी मोबाइल नेटवर्क की समस्या से जूझ रहे हैं। सरकारी टेलीकॉम कंपनी के टॉवर होने के बावजूद यहां के ग्रामीणों को नेटवर्क सुविधा का लाभ नहीं मिल पा रहा है। जंगल और पहाड़ी क्षेत्र के बीच बसे इन दूरस्थ गांवों की आबादी डिजिटल युग में भी मोबाइल क्रांति से दूर है।

बैगाचक क्षेत्र के दर्जनों ग्रामों में बीएसएनएल के गगनचुंबी टॉवर तो खड़े कर दिए गए हैं, लेकिन यह लोहे का ढांचा अब केवल प्रदर्शनी बनकर रह गया है। शासन द्वारा आदिवासी अंचलों को डिजिटल अंतरजाल से जोड़ने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन टेलीकॉम कंपनी की उदासीनता के कारण वर्षों से खड़े यह टॉवर जंग खा रहे हैं और इनका कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है।

*तीन साल बाद भी शुरू नहीं हुए टॉवर*

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा पर बसे ग्राम धुरकुटा और आसपास के करीब आधा दर्जन गांवों में बीएसएनएल के टॉवर लगाए हुए तीन वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आज तक यह शुरू नहीं हो सके हैं। टॉवर लगने के बाद ग्रामीणों ने उत्साह के साथ कंपनी की सिम भी खरीद ली थी। सिम बंद होने की आशंका के चलते उपभोक्ता आज तक उसमें रिचार्ज कराते आ रहे हैं, लेकिन नेटवर्क सुविधा नहीं मिलने से उनका पैसा व्यर्थ खर्च हो रहा है।

आसपास के ग्राम फिटारी, लमोठा, रजनी सरई, रंजरा, अजगर, शिल्पिडी और सेंदलखार सहित अन्य गांवों में लगे बीएसएनएल के टॉवर भी लंबे समय से बंद पड़े हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन टॉवरों को चालू करने के लिए आवश्यक उपकरणों की जरूरत है, लेकिन आज तक उपकरण उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।

*छत्तीसगढ़ के नेटवर्क के सहारे मध्यप्रदेश के ग्रामीण*

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मध्यप्रदेश की सीमा में रहने वाले इन गांवों के मोबाइल उपभोक्ताओं को छत्तीसगढ़ राज्य के नेटवर्क पर निर्भर रहना पड़ रहा है। छत्तीसगढ़ के गांवों में लगे मोबाइल टॉवर की कनेक्टिविटी तलाश कर ही यहां के लोग एक-दूसरे से संपर्क कर पाते हैं। कई बार नेटवर्क की तलाश में लोगों को गांव से बाहर या किसी ऊंचे स्थान पर जाना पड़ता है।

ग्रामीणों के अनुसार, आवश्यकता के समय मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलने से सबसे ज्यादा परेशानी आपातकालीन सेवाओं में होती है। यदि किसी व्यक्ति का अचानक स्वास्थ्य खराब हो जाए या किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो जाए तो समय पर मदद बुलाना बड़ी चुनौती बन जाता है।

*ओटीपी और ऑनलाइन कामों में भी परेशानी*

वर्तमान समय में अधिकांश सरकारी योजनाओं और जरूरी कार्यों में मोबाइल पर आने वाले ओटीपी की आवश्यकता होती है, लेकिन नेटवर्क के अभाव में यह सुविधा भी समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती। इंटरनेट सुविधा नहीं मिलने से ग्रामीणों के कई आवश्यक ऑनलाइन कार्य अधूरे रह जाते हैं।

ऑनलाइन कामों के लिए ग्रामीणों को करीब 50 किलोमीटर दूर बजाग या समनापुर जाना पड़ता है, जिससे उनका समय और पैसा दोनों व्यर्थ खर्च हो रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि डिजिटल सेवाओं का विस्तार होने के बावजूद उनका क्षेत्र अभी भी नेटवर्क सुविधा से वंचित है।

*ग्रामीणों ने की टॉवर चालू करने की मांग*

धुरकुटा के ग्रामीणों ने बताया कि गांव में मोबाइल टॉवर लगे तीन साल से अधिक समय हो गया है, लेकिन आज तक इसे चालू नहीं किया गया। यहां के सैकड़ों उपभोक्ताओं को मजबूरी में छत्तीसगढ़ के मोबाइल नेटवर्क का सहारा लेना पड़ रहा है।

समीप के छत्तीसगढ़ के सिंदूलखार गांव में लगे टॉवर के नेटवर्क से ही किसी तरह संपर्क हो पाता है। इसी तरह आसपास के अन्य गांवों के लोग भी छत्तीसगढ़ के मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर हैं। ग्रामीणों ने शासन और बीएसएनएल विभाग से मांग की है कि क्षेत्र में लगे सभी मोबाइल टॉवरों को शीघ्र चालू कर नेटवर्क सुविधा उपलब्ध कराई जाए, ताकि बैगांचल क्षेत्र के लोगों को डिजिटल सेवाओं का वास्तविक लाभ मिल सके।

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