Breaking

revanchal times new

''सूनी कलाई’’

 


दैनिक रेवाँचल टाईम्स - मेरा कोई भाई नहीं था। इसलिए हर रक्षाबंधन मेरे लिए त्योहार नहीं, एक उदासी बन जाता था। स्कूल में सारी सहेलियां अपनी-अपनी राखियों की बातें करतीं, मैं चुप रहती। घर आकर मैं पापा से लिपट कर रोने लगती। "पापा, मेरे लिए भी एक भाई ला दो ना।" पापा हर साल मेरी ये बात सुनकर बहुत परेशान हो जाते थे। उनके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

फिर एक रक्षाबंधन आया। मैं फिर रो रही थी। तब पापा ने मेरे आंसू पोंछे, मेरा हाथ पकड़ा और बोले, "बेटा, तुझे किसने कहा तेरा कोई भाई नहीं है? चल, आज मैं तुझे तेरे भाइयों से मिलवाता हूँ।" मैं हैरान थी। पापा मुझे सबसे पहले हमारे डॉक्टर भैया के पास ले गए। फिर हमारे घर में किराए पर रहने वाले चपरासी भैया के पास, फिर मेरे शिक्षक के पास, और फिर बगीचे में काम करने वाले माली भैया के पास। पापा ने कहा, "जो सिर्फ घर में साथ रहता है वही भाई नहीं होता। जो सुख-दुख में तुम्हारा साथ दे, तुम्हारा ख्याल रखे, वो सब तुम्हारे भाई हैं।" मैंने उस दिन एक-एक करके सबको राखी बांधी। और चमत्कार हो गया। मुझे एक नहीं, चार-चार भाई मिल गए। उनमें सबसे खास थे डॉक्टर भैया। उनकी भी कोई बहन नहीं थी। बरसों से उनकी कलाई सूनी थी। जब मैंने उन्हें राखी बांधी तो उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने कहा, "आज मुझे भी एक बहन मिल गई।" उस दिन दो सूनी कलाइयाँ भर गईं थीं। एक भाई को बहन मिल गई और एक बहन को भाई।


आज इस बात को 17 साल हो गए हैं। डॉक्टर भैया अब हमारे गांव से बहुत दूर किसी और शहर में चले गए हैं। हम रोज नहीं मिलते, रोज बात भी नहीं होती। पर हमारा रिश्ता आज भी पास है। हर रक्षाबंधन पर आज भी उनके हाथ पर मेरी भेजी हुई राखी होती है, और मेरे पास उनका भेजा हुआ आशीर्वाद। क्योंकि कुछ रिश्ते खून से नहीं, दिल से बंधते हैं। और दिल के रिश्ते कभी दूर नहीं जाते।


*ममता साहू* 

*लेखिका, कवयित्री व अध्यापिका*

*कांकेर, छत्तीसगढ़*

Post a Comment

Previous Post Next Post