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विकास के नाम पर काटे गए पेड़ों की भरपाई कब होगीसड़क चौड़ीकरण के बाद हरियाली गायब, बारिश में भी नहीं दिख रही पौधरोपण की तैयारी

 



रेवांचल टाइम्स मंडला जिला मुख्यालय मंडला में विकास कार्यों के नाम पर सड़क चौड़ीकरण तो कर दिया गया, लेकिन इस विकास की कीमत वर्षों पुराने हरे-भरे पेड़ों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। सड़क के दोनों तरफ किनारे खड़े विशाल छायादार वृक्षों को एक-एक कर काट दिया गया, लेकिन उनकी भरपाई के लिए अब तक कोई ठोस पहल दिखाई नहीं दे रही है। हैरानी की बात यह है कि बारिश का मौसम शुरू हो चुका है, जिसे पौधरोपण का सबसे उपयुक्त समय माना जाता है, फिर भी नगर पालिका मंडला और संबंधित विभागों की ओर से नए पौधे लगाने की कोई प्रभावी योजना धरातल पर नजर नहीं आ रही।

सड़क चौड़ीकरण निश्चित रूप से यातायात सुविधा और विकास की दृष्टि से आवश्यक था, लेकिन पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना शासन और प्रशासन की नैतिक जिम्मेदारी है। यदि एक ओर हजारों लोगों की सुविधा के लिए पेड़ों की कटाई की गई, तो दूसरी ओर उसी अनुपात में नए पौधे लगाकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी अनिवार्य होना चाहिए था।

वर्षों पुराने इन पेड़ों ने केवल ऑक्सीजन ही नहीं दी, बल्कि भीषण गर्मी में राहगीरों को राहत पहुंचाई। तपती धूप में सफर करने वाले लोग इन्हीं पेड़ों की छांव में कुछ पल विश्राम कर अपनी थकान मिटाते थे। सड़क किनारे ठेला और रेहड़ी लगाकर जीवनयापन करने वाले छोटे व्यापारियों के लिए भी यही पेड़ प्राकृतिक छत का काम करते थे। अब पेड़ कटने के बाद न तो राहगीरों को छांव मिल रही है और न ही छोटे व्यापारियों को गर्मी से बचने का कोई सहारा।

पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि तेजी से घटती हरियाली और बढ़ता तापमान आने वाले वर्षों में गंभीर संकट पैदा कर सकता है। मंडला जैसे प्राकृतिक और वन क्षेत्र वाले जिले में यदि विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई होगी और उनकी भरपाई नहीं होगी, तो इसका सीधा असर स्थानीय जलवायु, जैव विविधता और आम जनजीवन पर पड़ेगा।

नगरवासियों का कहना है कि सड़क चौड़ीकरण के दौरान कई स्थानों पर बड़े-बड़े पेड़ों को काटा गया था। उस समय यह आश्वासन दिया गया था कि निर्धारित संख्या में नए पौधे लगाए जाएंगे, लेकिन अब तक ऐसा कोई व्यापक अभियान दिखाई नहीं दिया। यदि समय रहते पौधरोपण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में यह सड़कें पूरी तरह कंक्रीट के तपते गलियारों में बदल जाएंगी।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब करोड़ों रुपये की विकास परियोजनाएं बनाई जाती हैं तो उनमें पर्यावरण संरक्षण और प्रतिपूरक पौधरोपण की व्यवस्था केवल कागजों तक ही क्यों सीमित रह जाती है आखिर किस विभाग की जिम्मेदारी है कि कटे हुए पेड़ों की भरपाई सुनिश्चित करे यदि जिम्मेदार विभाग समय रहते नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियां इस लापरवाही की कीमत चुकाने को मजबूर होंगी।

अब आवश्यकता केवल पौधे लगाने की नहीं, बल्कि उनके संरक्षण की भी है। नगर पालिका, वन विभाग और संबंधित एजेंसियों को संयुक्त अभियान चलाकर सड़क किनारे बड़े पैमाने पर पौधरोपण करना चाहिए तथा उनकी नियमित देखभाल सुनिश्चित करनी चाहिए। क्योंकि सड़कें विकास का प्रतीक हो सकती हैं, लेकिन पेड़ ही जीवन का आधार हैं। यदि विकास हरियाली निगल जाएगा, तो आने वाले समय में यही विकास लोगों के लिए अभिशाप साबित होगा।

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