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Monday, July 13, 2026

यूरिया के लिए दर-दर भटक रहे किसान, आखिर किसके संरक्षण में पनप रहा कालाबाजारी का खेल?



परमिट में सीमित खाद, बाजार में तीन गुना दाम—आदिवासी बाहुल्य मंडला के किसानों पर दोहरी मार


दैनिक रेवांचल टाईम्स - मंडला। खरीफ सीजन के बीच मंडला जिले के किसान इन दिनों यूरिया खाद के संकट से जूझ रहे हैं। आरोप है कि शासकीय केंद्रों पर किसानों को परमिट के आधार पर सीमित मात्रा में ही यूरिया उपलब्ध कराया जा रहा है, जबकि फसल की आवश्यकता इससे कहीं अधिक है। मजबूरी में किसानों को निजी प्रतिष्ठानों से कई गुना अधिक कीमत पर यूरिया खरीदना पड़ रहा है, जिससे खेती की लागत लगातार बढ़ रही है।

किसानों का कहना है कि एक ओर सरकार किसानों की आय बढ़ाने और खेती को लाभ का सौदा बनाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर समय पर पर्याप्त खाद उपलब्ध नहीं होने से उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। यदि समय पर यूरिया नहीं मिला तो इसका सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ेगा और इसकी भरपाई किसान नहीं कर पाएंगे।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब जिले में यूरिया की मांग पहले से अनुमानित रहती है, तब भी किसानों को पर्याप्त मात्रा में खाद क्यों नहीं मिल रही? यदि शासकीय केंद्रों पर स्टॉक सीमित है तो निजी प्रतिष्ठानों में पर्याप्त मात्रा में खाद कैसे उपलब्ध है? यह सवाल पूरे वितरण तंत्र की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

इधर, किसान कल्याण एवं कृषि विभाग मंडला की कार्यप्रणाली को लेकर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। विभाग पर समय-समय पर अनियमितताओं, कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे में किसान संगठन और ग्रामीण मांग कर रहे हैं कि जिले में यूरिया वितरण व्यवस्था की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि कहीं जमाखोरी, कालाबाजारी या नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित लोगों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।

किसानों का कहना है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को केवल बैठकों और दावों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि खेतों तक पहुंचकर वास्तविक स्थिति देखनी चाहिए। यदि समय रहते पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध नहीं कराया गया तो नुकसान केवल किसानों का नहीं होगा, बल्कि पूरे जिले के कृषि उत्पादन पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन किसानों की इस गंभीर समस्या को प्राथमिकता से हल करता है या फिर हर बार की तरह आश्वासनों और जांच की घोषणाओं तक ही मामला सीमित रह जाता है। आदिवासी बाहुल्य मंडला का किसान आज एक ही सवाल पूछ रहा है—क्या उसे समय पर खाद मिल पाएगी या फिर उसे मजबूरी में महंगे दाम चुकाकर अपनी मेहनत की खेती बचानी पड़ेगी?

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