नैनपुर के ऐतिहासिक श्री लक्ष्मीनारायण (राम) मंदिर की संपत्तियों पर उठे गंभीर सवाल, वर्ष 2000 से विशेष ऑडिट की मांग
दैनिक रेवांचल टाइम्स | नैनपुर/मंडला | विशेष संवाददाता"राम जी की चिड़िया, राम जी का खेत... खा गए चोर भर-भर पेट!" यह कहावत इन दिनों नैनपुर के ऐतिहासिक श्री लक्ष्मीनारायण (राम) मंदिर से जुड़े विवाद पर चरितार्थ होती दिखाई दे रही है। भगवान के नाम दर्ज 11.60 एकड़ कृषि भूमि, वर्षों की खेती, फसल उत्पादन और मंदिर की कथित आय को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। यदि शिकायतों में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो मामला केवल लापरवाही का नहीं, बल्कि सार्वजनिक धार्मिक संपत्ति के प्रबंधन में बड़े वित्तीय अनियमितताओं का हो सकता है।
सरकारी रिकॉर्ड में हर साल फसल, फिर मंदिर की तिजोरी खाली क्यों?
राजस्व अभिलेखों के अनुसार पटवारी हल्का उमरिया के खसरा क्रमांक-8 की 11.60 एकड़ (4.6960 हेक्टेयर) भूमि भगवान श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर के नाम दर्ज है। गिरदावरी रिकॉर्ड में वर्षों से खरीफ और रबी दोनों मौसमों में धान, गेहूं, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों का उल्लेख दर्ज है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी रिकॉर्ड स्वयं खेती और उत्पादन की पुष्टि कर रहे हैं, तो उस कृषि आय का हिसाब-किताब कहाँ है? यदि वर्षों से फसलें ली जाती रहीं, तो मंदिर के बैंक खाते, आय-व्यय रजिस्टर, कैशबुक और ऑडिट रिपोर्ट में उसका उल्लेख क्यों दिखाई नहीं देता? आखिर भगवान की जमीन की कमाई किसके पास गई?
सहकारी समिति के गठन और सदस्यता पर भी सवाल
शिकायतकर्ता ने 'नवदुर्गा बीज उत्पादक सहकारी समिति, पंजीयन क्रमांक-833, उमरिया नैनपुर' की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि समिति की सदस्यता में एक ही परिवार के लोगों को शामिल किया गया। साथ ही यह भी प्रश्न उठाया गया है कि समिति गठन के समय एक सदस्य सरकारी सेवा में रहते हुए नैनपुर से बाहर पदस्थ था तथा उसके नाम क्षेत्र में निजी कृषि भूमि भी नहीं थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि मंदिर के एक ही खसरा क्रमांक-8 को आधार बनाकर पात्रता दर्शाई गई।
अब मांग की जा रही है कि सहकारिता विभाग पूरी पंजीयन फाइल सार्वजनिक करे और बताए कि सदस्यता किन दस्तावेजों एवं नियमों के आधार पर स्वीकृत की गई।
खेती किसने की, पैसा किसने लिया?
शिकायत में मंदिर की कृषि भूमि, धर्मशाला, निर्माण कार्यों तथा अन्य आय स्रोतों की भी जांच की मांग की गई है। सर्वराहकार, उनके पुत्र सहित अन्य संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर यह स्पष्ट करने की मांग की गई है कि—
मंदिर की भूमि पर खेती किसने की?
कृषि उपज से प्राप्त आय किसे मिली?
क्या पूरी राशि मंदिर के अधिकृत खाते में जमा हुई?
यदि नहीं, तो उसका लाभ किसने उठाया?
श्रद्धालुओं का कहना है कि सार्वजनिक धार्मिक संपत्ति होने के कारण मंदिर की हर आय—चढ़ावा, दान, किराया और कृषि आय—का पूरा हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए।
वर्ष 2000 से विशेष ऑडिट की मांग
शिकायतकर्ता ने वर्ष 2000 से वर्तमान तक मंदिर की संपूर्ण वित्तीय व्यवस्था का विशेष ऑडिट कराने की मांग की है। इसमें आय-व्यय रजिस्टर, कैशबुक, बैंक खाते, कृषि आय, निर्माण कार्य और संपत्तियों के उपयोग की विस्तृत जांच शामिल करने का आग्रह किया गया है।
जिला प्रशासन की परीक्षा, अब कार्रवाई या चुप्पी?
मामला अब जिला प्रशासन और संबंधित विभागों के सामने है। यदि आरोपों में दम है, तो यह सार्वजनिक धार्मिक संपत्ति से जुड़ा गंभीर वित्तीय मामला बन सकता है, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। वहीं यदि आरोप तथ्यहीन हैं, तो जांच के माध्यम से स्थिति स्पष्ट होना भी उतना ही जरूरी है।
अब नैनपुर के श्रद्धालु और आम नागरिक यही पूछ रहे हैं—
"जब जमीन भगवान की है, खेती भगवान की जमीन पर होती है, तो आखिर उसकी कमाई गई कहाँ?"
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच, विशेष ऑडिट और जवाबदेही सुनिश्चित करता है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।




No comments:
Post a Comment