समस्याओं के समाधान पर नहीं दे रहे ध्यान, ढेर सारी समस्याओं का लगा अंबार
दैनिक रेवांचल टाईम्स - मंडला। मध्य प्रदेश के मंडला जिले में वर्तमान कलेक्टर की पदस्थापना के समय लोगों ने उम्मीद जताई थी कि जिले की जर्जर प्रशासनिक भ्रष्ट तंत्र व्यवस्था में सुधार आएगा और विकास कार्यों को नई गति मिलेगी। कलेक्टर लगातार समीक्षा बैठकें, निरीक्षण और अधिकारियों को निर्देश देने जैसे प्रयास कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। सरकारी तंत्र की सुस्ती, लापरवाही और जवाबदेही के अभाव ने प्रशासनिक कोशिशों पर पानी फेर दिया है। जिले में लगभग हर विभाग की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है और आम नागरिक अब पूछने लगे हैं कि आखिर उनकी अपेक्षाओं पर प्रशासन कब खरा उतरेगा?
जिले की शिक्षा व्यवस्था बदहाल बताई जा रही है। अनेक सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई नहीं हो रही, भवन जर्जर हैं, खेल मैदानों और मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। मध्यान्ह भोजन व्यवस्था लगातार विवादों में बनी हुई है। शिक्षकों के मुख्यालय से अनुपस्थित रहने, अप-डाउन करने और नियमित निरीक्षण नहीं होने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। दूसरी ओर निजी स्कूलों की मनमानी पर भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हो रही।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों की कमी बरकरार है। कई स्थानों पर एएनएम और अन्य कर्मचारी मुख्यालय में नहीं रहते, जबकि ग्रामीणों को समय पर उपचार और दवाइयां उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। आशा कार्यकर्ताओं की कार्यप्रणाली और दवा वितरण व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। जिला अस्पताल से लेकर ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों तक मरीज बेहतर इलाज के लिए भटकने को मजबूर हैं।
राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली भी लगातार आलोचना का विषय बनी हुई है। पटवारियों की अनुपस्थिति, नामांतरण, सीमांकन और अन्य राजस्व मामलों में देरी से किसान और ग्रामीण परेशान हैं। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, फार्मर आईडी और अन्य योजनाओं के क्रियान्वयन में भी भारी सुस्ती दिखाई दे रही है। अनेक पात्र किसान अब तक योजनाओं का लाभ नहीं प्राप्त कर सके हैं।
ग्राम पंचायतों में भी मनमानी चरम पर होने के आरोप लग रहे हैं। कई पंचायतों में सरपंच-सचिव मुख्यालय में नहीं रहते, विकास कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं और निरीक्षण व्यवस्था लगभग निष्प्रभावी नजर आ रही है। जनसुनवाई, समस्या निवारण शिविर और सीएम हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाओं के बावजूद लोगों की शिकायतों का समय पर समाधान नहीं हो पा रहा, जिससे जनता का भरोसा कमजोर पड़ता जा रहा है।
खनिज संपदा की अवैध लूट, रेत के अवैध उत्खनन और नियम विरुद्ध संचालित स्टोन क्रेशरों पर भी प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा है। परिवहन व्यवस्था में खटारा और नियम विरुद्ध यात्री वाहन खुलेआम सड़कों पर दौड़ रहे हैं, जबकि नाबालिग वाहन चालक भी दुर्घटनाओं को न्योता दे रहे हैं। इसके बावजूद प्रभावी कार्रवाई का अभाव दिखाई देता है।
जिले में अवैध शराब, सट्टा और जुए के कारोबार पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। नागरिकों का आरोप है कि इन गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगाने में प्रशासन अब तक सफल नहीं हो पाया है। महिला एवं बाल विकास विभाग के अंतर्गत संचालित योजनाओं में भी समय पर राशि और राशन उपलब्ध नहीं होने की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। मध्यान्ह भोजन और सांझा चूल्हा जैसी योजनाओं से जुड़े समूह आर्थिक संकट झेल रहे हैं।
वृक्षारोपण, जल संरक्षण और जन अभियान परिषद के कार्यों को लेकर भी पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। कई लोगों का आरोप है कि कागजों में योजनाएं सफल दिखाई जाती हैं, जबकि धरातल पर अपेक्षित परिणाम नजर नहीं आते। स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यों और उन्हें दी जाने वाली राशि के उपयोग की भी प्रभावी निगरानी नहीं होने की बातें सामने आ रही हैं।
सामाजिक चेतना केंद्रों की निष्क्रियता, साक्षरता कार्यक्रमों की धीमी गति और अधूरे विकास कार्यों ने भी लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जिले में अनेक निर्माण कार्य वर्षों से अधूरे पड़े हैं, लेकिन उन्हें पूरा कराने की दिशा में अपेक्षित गति नहीं दिखाई दे रही।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कलेक्टर स्तर पर लगातार बैठकें और निर्देश तो जारी हो रहे हैं, लेकिन सरकारी अमले की ढिलाई और जवाबदेही की कमी के कारण उनका असर जमीनी स्तर पर दिखाई नहीं दे रहा। यही कारण है कि अब नागरिक खुलकर सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर प्रशासनिक व्यवस्था में वास्तविक सुधार कब होगा और जनता की अपेक्षाओं पर प्रशासन कब पूरी तरह खरा उतरेगा?

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