दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला नेशनल हाईवे-30 अब विकास की पहचान कम और हादसों की स्थायी प्रयोगशाला ज़्यादा बनता जा रहा है। कालपी के पास चलते ट्रक का पहिया सड़क में धंस जाना कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर तमाचा है जो हर दुर्घटना के बाद मरम्मत का ढोल पीटती है और फिर अगली दुर्घटना का इंतज़ार करने लगती है।
हास्य इस बात का नहीं कि सड़क धंस गई, बल्कि इस बात का है कि शायद सड़क को भी अब भरोसा नहीं रहा कि उसके ऊपर चलने वालों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कोई निभाएगा। इसलिए उसने खुद ही ट्रकों को निगलना शुरू कर दिया।
नेशनल हाईवे-30 से रोज़ मंत्री, सांसद, अधिकारी और वीआईपी काफिले गुजरते हैं। फर्क बस इतना है कि इन व्हीआईपी के निकलने से पहले शायद सड़क को कुछ घंटों के लिए "ठीक" कर दिया जाता हो, और आम जनता के लिए वही पुराने गड्ढे, जर्जर पुल और मौत का इंतज़ार छोड़ दिया जाता है। लगता है सड़क भी अब पहचानने लगी है कि किस गाड़ी को सम्मान देना है और किसे गड्ढे में उतारना है।
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और संबंधित विभाग का हाल ऐसा है मानो उनका रखरखाव का फॉर्मूला ही हो—"जब तक हादसा नहीं, तब तक समस्या नहीं।" हादसा होते ही अधिकारी दौड़ पड़ते हैं, निरीक्षण होता है, आश्वासन मिलता है, फोटो खिंचते हैं और फिर सब कुछ पहले जैसा।
मंडला जिले का दुर्भाग्य कहें या आमजनता की व्यथा जो अपने ही जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी अब कम दिलचस्प नहीं है। चुनाव के समय यही सड़क विकास का प्रतीक बन जाती है, लेकिन दुर्घटनाओं के समय शायद यह किसी और विभाग की जिम्मेदारी मान ली जाती है। जनता पूछ रही है कि आखिर सड़क पर बहता खून दिखाई नहीं देता या फिर सत्ता की गाड़ी के शीशे इतने काले हैं कि गड्ढे और दर्द दोनों नज़र नहीं आते?
अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब नेशनल हाईवे-30 का नया परिचय होगा—"सावधान! आगे सड़क नहीं, सरकारी लापरवाही का जीवंत स्मारक है।"
अब सवाल यह नहीं कि अगला हादसा कब होगा, बल्कि यह है कि जिम्मेदार विभाग और जनप्रतिनिधियों की कुम्भकर्णी नींद पहले टूटेगी या फिर किसी और परिवार का चिराग बुझ जाएगा?


