दैनिक रेवांचल टाइम्स, मंडला।गुरु और शिष्य का रिश्ता भारतीय संस्कृति में सबसे पवित्र माना गया है। शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व, संस्कार और भविष्य की नींव भी तैयार करता है। लेकिन जब वही विद्यार्थी अपने शिक्षक के खिलाफ सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाएं, तो यह केवल एक स्कूल का विवाद नहीं रह जाता, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था के लिए चिंतन का विषय बन जाता है।
शुक्रवार को मंडला जिले के कालपी स्थित महर्षि संदीपनी स्कूल के विद्यार्थियों ने अपनी प्राचार्य संगीता श्रीवास्तव के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए नेशनल हाईवे-30 पर चक्काजाम कर दिया। विद्यार्थियों का आरोप है कि उन्हें लंबे समय से मानसिक एवं शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है, जिसके कारण उनका आत्मविश्वास और पढ़ाई दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
*विद्यार्थियों ने लगाए गंभीर आरोप*
प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों का कहना था कि छोटी-छोटी बातों पर कठोर दंड दिया जाता है। आरोप है कि बच्चों को घंटों तक एक घुटने पर बैठाकर रखा जाता है, कक्षाओं से बाहर निकाल दिया जाता है और पढ़ाई से वंचित किया जाता है।
विद्यार्थियों के अनुसार, शुक्रवार को भी बिना ठोस कारण के कई छात्रों को लगभग दो घंटे तक एक घुटने पर खड़ा रखा गया। इसके बाद करीब 30 से 40 विद्यार्थियों को स्कूल से बाहर निकाल दिया गया और टीसी (स्थानांतरण प्रमाण पत्र) देकर विद्यालय से निकालने की धमकी दी गई। इन घटनाओं से आक्रोशित होकर विद्यार्थियों ने हाईवे पर प्रदर्शन शुरू कर दिया और प्राचार्य को हटाने की मांग की।
*प्रशासन ने संभाली स्थिति*
घटना की सूचना मिलते ही नायब तहसीलदार आलोक सोनी, बीजाडांडी थाना पुलिस, जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता मौके पर पहुंचे। सभी ने विद्यार्थियों को शांत करने और स्थिति सामान्य बनाने का प्रयास किया।
*सांसद के आश्वासन के बाद खुला जाम*
मामले की गंभीरता को देखते हुए मंडला सांसद ने दूरभाष पर विद्यार्थियों से बातचीत की और आश्वासन दिया कि शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी तथा यदि आरोप सही पाए गए तो संबंधित प्राचार्य के विरुद्ध उचित कार्रवाई की जाएगी। इसके बाद विद्यार्थियों ने अपना आंदोलन समाप्त कर हाईवे से जाम हटा लिया।
*सबसे बड़ा सवाल: क्या शिक्षकों पर से उठ रहा है विद्यार्थियों का भरोसा?*
यह घटना केवल एक विद्यालय का विवाद नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न भी है। जिस शिक्षक को विद्यार्थी अपना मार्गदर्शक, संरक्षक और प्रेरणास्रोत मानते हैं, यदि उसी के खिलाफ उन्हें सड़क पर उतरना पड़े, तो यह विश्वास के टूटने का संकेत है।
*सरकारी दफ्तरों के अधिकारी और कर्मचारी मूल स्थान छोड़ जबलपुर से करते है अपडाउन*
मंडला जिले के ज्यादातर दफ्तरों और स्कूलों की विडम्बना यह हैं कि यहां पर नौकरी करने वाले ज्यादातर अधिकारी और कर्मचारी जबलपुर शहर से प्रतिदिन का आना जाना करते हैं जिससे कि विद्यार्थियों को समय पर शिक्षकों की अनुपस्थिति के चलते पढ़ाई के लिए समय नहीं मिल पाता। इसके साथ ही अन्य दफ्तरों के भी यही हाल हैं जहां पर आमाजनता अपने कामों को लेकर दफ्तरों के चक्कर लगाती रहती हैं जिस कारण से समय पर काम नहीं हो पाते यदि मंडला जिले के नवागत कलेक्टर और अन्य विभागीय अधिकारी उचित जांच करते हुए सख्त कार्यवाही करें तो बच्चों के साथ ही साथ जिले की आमजनता को विभागीय लापरवाही का भुगतान नहीं करना पड़ेगा।
इसके साथ ही बच्चों के द्वारा लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है और जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि शिकायतें सत्य साबित होती हैं, तो यह केवल अनुशासन का मामला नहीं बल्कि विद्यार्थियों के अधिकारों, सम्मान और सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण का प्रश्न है।
शिक्षा भय से नहीं, विश्वास और संवाद से आगे बढ़ती है। विद्यालय वह स्थान होना चाहिए जहां विद्यार्थी बिना डर के सीख सकें। यदि बच्चों के मन में अपने शिक्षक के प्रति सम्मान की जगह भय और अविश्वास पैदा होने लगे, तो यह समाज और शिक्षा व्यवस्था—दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
