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सीमांकन रिपोर्ट के बाद बड़ा सवाल: क्या मंडला कलेक्टर से छिपाई जा रही है नैनपुर के राजस्व घोटाले की सच्चाई



सरकारी खसरा 197/2, नामांतरण, प्लॉट बिक्री और सीमांकन रिपोर्ट ने खड़े किए दर्जनों सवाल। शिकायतों और बेदखली आदेश के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर उठी निष्पक्ष जांच की मांग।





सीमांकन रिपोर्ट ने बदल दी पूरे मामले की तस्वीर


दैनिक रेवांचल टाईम्स - मंडला, जिले के जनपद नैनपुर में सूत्रों के अनुसार बहुचर्चित भूमि विवाद में सामने आई नवीनतम सीमांकन रिपोर्ट ने पूरे प्रकरण को नई दिशा दे दी है। वर्षों तक जिस स्थान को खसरा नंबर 197/4 बताकर प्लॉटों की खरीद-बिक्री की जाती रही, उसी स्थान पर सीमांकन के दौरान 197/4 का अस्तित्व स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दिया। सीमांकन रिपोर्ट के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि मौके पर 197/4 मौजूद ही नहीं है, तो आखिर वर्षों तक रजिस्ट्रियां किस भूमि की होती रहीं?


*क्या सरकारी खसरा नंबर 197/2 को निजी बताकर बेच दिया गया?*


वही सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पूरा विवाद खसरा नंबर 197/2 से जुड़ा हुआ है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि सरकारी भूमि से जुड़े हिस्से का गलत नामांतरण कर उसे निजी भूमि के रूप में प्रस्तुत किया गया और उसी आधार पर कई लोगों को प्लॉट बेच दिए गए। यदि जांच में यह तथ्य सही पाए जाते हैं तो यह केवल राजस्व त्रुटि नहीं बल्कि सरकारी भूमि से जुड़े गंभीर मामले का विषय होगा।

*चार रजिस्ट्रियां हुईं, लेकिन खरीदार आज भी अपनी जमीन तलाश रहे हैं*

    वही इस पूरे मामले का सबसे दुखद पक्ष वे लोग हैं जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से प्लॉट खरीदे। उनके पास पंजीकृत रजिस्ट्री तो है, लेकिन सीमांकन के बाद अब वे अपनी वास्तविक जमीन की पहचान नहीं कर पा रहे हैं। यदि विवादित स्थान पर 197/4 है ही नहीं, तो खरीदारों को आखिर किस भूमि की रजिस्ट्री दी गई? यदि भविष्य में अनियमितता सिद्ध होती है तो उनकी आर्थिक क्षति की जिम्मेदारी कौन लेगा?

*जब कॉलोनाइज़र का लाइसेंस नहीं था, तब प्लॉट बिके कैसे?*

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस समय प्लॉटों की बिक्री की गई, उस समय संबंधित कॉलोनाइज़र के वैध लाइसेंस को लेकर भी सवाल थे। यदि लाइसेंस नहीं था, तो बिना अनुमति कॉलोनी कैसे विकसित हुई? आखिर उस समय राजस्व विभाग क्या कर रहा था? क्या पूरे घटनाक्रम से विभाग अनजान था, या फिर सब कुछ जानते हुए भी कार्रवाई नहीं की गई?


*शिकायतें होती रहीं, खबरें छपती रहीं... लेकिन कार्रवाई आज तक नहीं*

 वही इस मामले को लेकर लगातार शिकायतें की गईं। सीएम हेल्पलाइन में आवेदन पहुंचे। राजस्व अधिकारियों को ज्ञापन दिए गए। स्थानीय समाचार पत्रों में लगातार समाचार प्रकाशित हुए। पूर्व तहसीलदार द्वारा बेदखली आदेश भी पारित किया गया। इसके बावजूद विवादित भूमि से कब्जा नहीं हटाया गया और न ही पूरे मामले की निष्पक्ष जांच शुरू हो सकी। इससे लोगों के मन में यह सवाल लगातार गहरा होता जा रहा है कि आखिर कार्रवाई रुक क्यों गई?

*क्या अपने ही कर्मचारियों को बचाने में लगा है राजस्व विभाग?*

अब स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा भी तेज हो गई है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हुई तो तत्कालीन राजस्व अधिकारियों, कर्मचारियों और संबंधित पटवारियों की भूमिका भी सामने आ सकती है। यही कारण है कि कार्रवाई में लगातार देरी हो रही है या नहीं, यह भी जांच का विषय बन गया है। यदि ऐसा नहीं है, तो फिर दोषियों के विरुद्ध अब तक कोई कठोर कदम क्यों नहीं उठाया गया?

*क्या मंडला कलेक्टर की आंखों में धूल झोंकी जा रही है?*

यह सवाल अब केवल आम जनता ही नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र के सामने खड़ा है। सीमांकन रिपोर्ट सामने है, शिकायतें दर्ज हैं, बेदखली आदेश मौजूद है, समाचार लगातार प्रकाशित हो रहे हैं, फिर भी यदि कार्रवाई नहीं हो रही, तो क्या नैनपुर राजस्व विभाग मंडला कलेक्टर को पूरे मामले की वास्तविक स्थिति से अवगत करा रहा है? या फिर अधूरी जानकारी देकर मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है? इन सवालों का जवाब अब प्रशासन को देना होगा।

*फर्जी दस्तावेज़ बनाने वालों पर एफआईआर कब होगी?*

यदि जांच में यह सामने आता है कि गलत दस्तावेज़ों के आधार पर नामांतरण हुआ, सरकारी भूमि को निजी बताकर रजिस्ट्रियां की गईं या राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर हुई, तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि फर्जी दस्तावेज़ तैयार करने वालों पर एफआईआर कब दर्ज होगी? सरकारी भूमि के साथ कथित खिलवाड़ करने वालों पर कार्रवाई कब होगी? और यदि खरीदारों के साथ धोखाधड़ी हुई है तो उनका पैसा वापस कौन दिलाएगा?

*मंडला कलेक्टर से उच्च स्तरीय जांच की मांग*

स्थानीय नागरिकों ने मंडला कलेक्टर से मांग की है कि इस पूरे मामले की किसी वरिष्ठ राजस्व अधिकारी अथवा स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि जांच में किसी भू-माफिया, उसके सहयोगियों, तत्कालीन राजस्व अधिकारियों, कर्मचारियों, पटवारियों अथवा अन्य किसी व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उनके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए। साथ ही उन खरीदारों को भी न्याय दिलाया जाए जिन्होंने वैध रजिस्ट्री के भरोसे अपनी जीवनभर की कमाई निवेश की।

*अंतिम सवाल*

क्या सीमांकन रिपोर्ट नैनपुर के सबसे बड़े राजस्व घोटाले की शुरुआत है, या फिर यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा? अब जवाब सिर्फ राजस्व विभाग नहीं, पूरे प्रशासन को देना होगा।

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