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श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर की भूमि से बनी नवदुर्गा बीज उत्पादक सहकारी समिति पर बड़ा सवाल




शिकायतकर्ता का दावा मंदिर की 11.60 एकड़ भूमि, अपात्र सदस्य, एक ही परिवार के कई लोगों की सदस्यता, सेवा के दौरान सरकारी कर्मचारी भी बना सदस्य; पंजीयन से लेकर डीएपी-यूरिया वितरण तक उच्चस्तरीय जांच की मांग




दैनिक रेवाँचल टाईम्स - नैनपुर। मंडला जिले के नैनपुर स्थित नवदुर्गा बीज उत्पादक सहकारी समिति क्रमांक-833 को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। शिकायतकर्ता ने सहकारिता विभाग, कलेक्टर मंडला, आयुक्त सहकारिता, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन सहित विभिन्न सक्षम अधिकारियों को विस्तृत दस्तावेजों के साथ शिकायत सौंपकर पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि समिति का गठन सहकारिता अधिनियम, नियमों और समिति की उपविधियों के अनुरूप नहीं किया गया, बल्कि कथित रूप से अपात्र सदस्यों, गलत भूमि विवरण और भ्रामक तथ्यों के आधार पर पंजीयन प्राप्त किया गया। उनका कहना है कि यदि समिति के गठन से लेकर अब तक के सभी मूल अभिलेखों की जांच कराई जाए तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।


*श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर की 11.60 एकड़ भूमि को लेकर उठे सवाल*


शिकायतकर्ता का दावा है कि नवदुर्गा बीज उत्पादक सहकारी समिति का गठन श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर की लगभग 11.60 एकड़ (4.6960 हेक्टेयर) कृषि भूमि को आधार बनाकर किया गया। उनका कहना है कि यह सार्वजनिक धार्मिक संपत्ति है, इसलिए यह जांच आवश्यक है कि समिति गठन के समय इस भूमि का उपयोग किस वैधानिक प्रक्रिया के तहत किया गया तथा संबंधित सक्षम प्राधिकारियों से आवश्यक अनुमति प्राप्त की गई थी या नहीं। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि मंदिर की भूमि से जुड़े सभी राजस्व रिकॉर्ड, पंजीयन दस्तावेज और अनुमति संबंधी अभिलेखों का परीक्षण कराया जाए।


*एक ही परिवार के कई लोगों को सदस्य बनाने का आरोप*


शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि समिति में एक ही परिवार के कई लोगों को सदस्य बनाया गया। उनका कहना है कि सदस्यता सूची, परिवार संबंधी रिकॉर्ड और राजस्व अभिलेखों का मिलान कर यह जांच की जानी चाहिए कि सदस्यता प्रदान करते समय उपविधियों और पात्रता संबंधी नियमों का पालन किया गया था या नहीं। यदि सदस्यता प्रक्रिया में अनियमितता पाई जाती है तो उसकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।


*सेवा के दौरान सरकारी कर्मचारी भी समिति का सदस्य होने का दावा*


शिकायतकर्ता का दावा है कि समिति के गठन के समय एक व्यक्ति, जो उस समय सरकारी सेवा में था और अब सेवानिवृत्त हो चुका है, समिति का सदस्य था। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि उस समय लागू नियमों और सेवा संबंधी प्रावधानों के अनुरूप उसकी सदस्यता की वैधता की भी जांच कराई जाए। उनका कहना है कि यदि सदस्यता नियमों के अनुरूप थी तो रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हो जाएगा, अन्यथा आवश्यक वैधानिक कार्रवाई की जानी चाहिए।


*कॉलोनियों और मकानों को कृषि भूमि बताकर सदस्यता देने का आरोप*


शिकायतकर्ता का आरोप है कि समिति के कई सदस्यों के नाम पर दर्ज भूमि वास्तविकता में कृषि योग्य नहीं है। उनका दावा है कि कुछ स्थानों पर वर्षों पहले कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं, जबकि कुछ जगह स्थायी मकान बने हुए हैं। इसके बावजूद कथित रूप से इन्हीं भूमि अभिलेखों के आधार पर सदस्यता प्रदान की गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि प्रत्येक सदस्य के खसरा, बी-1, गिरदावरी, नक्शा, उपग्रह चित्र तथा मौके के निरीक्षण से वास्तविक स्थिति सामने लाई जा सकती है।

*एक हेक्टेयर से कम भूमि वाले सदस्यों की भी हो जांच*


शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि समिति में ऐसे लोगों को भी सदस्य बनाया गया जिनके पास कथित रूप से आवश्यक कृषि भूमि उपलब्ध नहीं थी। उनका कहना है कि बीज उत्पादक सहकारी समिति का उद्देश्य कृषि एवं बीज उत्पादन से जुड़े किसानों को संगठित करना है, इसलिए सदस्यता के समय पात्रता की जांच अनिवार्य थी। उन्होंने मांग की है कि प्रत्येक सदस्य की पात्रता का पुनः सत्यापन कराया जाए।


*सहकारी अधिनियम और उपविधियों के पालन पर भी उठे सवाल*


शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत में मध्यप्रदेश सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1960, संबंधित नियमों तथा समिति की उपविधियों का उल्लेख करते हुए कहा है कि सदस्यता, पात्रता, अभिलेखों के रखरखाव और समिति के संचालन से जुड़े सभी कानूनी प्रावधानों का पालन हुआ या नहीं, इसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है। उनका कहना है कि यदि किसी सदस्य ने नियमों के विपरीत सदस्यता प्राप्त की या गलत जानकारी के आधार पर समिति का पंजीयन कराया गया, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।


*डीएपी, यूरिया और वित्तीय लेनदेन की भी हो स्वतंत्र जांच*


शिकायतकर्ता ने मांग की है कि वर्ष 2012-13 से 2022-23 तक समिति को मिले डीएपी, यूरिया, बीज, अनुदान, बैंक खातों, स्टॉक रजिस्टर, वितरण रजिस्टर, विक्रय रजिस्टर और ऑडिट रिपोर्ट की भी स्वतंत्र जांच कराई जाए। उनका कहना है कि यदि सदस्यता प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में है, तो समिति के माध्यम से हुए समस्त वित्तीय एवं कृषि संबंधी लेनदेन का भी सत्यापन आवश्यक है।


*मूल रिकॉर्ड जब्त कर उच्चस्तरीय जांच की मांग*


शिकायतकर्ता ने मांग की है कि समिति की मूल पंजीयन फाइल, सदस्यता आवेदन, भूमि सत्यापन रिपोर्ट, शेयर रजिस्टर, बैंक रिकॉर्ड, ऑडिट रिपोर्ट, स्टॉक रजिस्टर, वितरण रजिस्टर तथा अन्य मूल अभिलेखों को सुरक्षित कर किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए। उनका कहना है कि केवल विभागीय प्रतिवेदन से सच्चाई सामने नहीं आएगी, बल्कि मूल दस्तावेजों के वैज्ञानिक और विधिक परीक्षण से ही पूरे मामले की वास्तविकता स्पष्ट होगी।


*अब प्रशासनिक जवाबदेही पर उठ रहे सवाल*


वही शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि उनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज और आरोप जांच योग्य हैं, तो यह केवल एक सहकारी समिति का मामला नहीं बल्कि सहकारिता व्यवस्था की पारदर्शिता और प्रशासनिक निगरानी का भी विषय है। उन्होंने मांग की है कि पूरे प्रकरण की समयबद्ध और निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं, तो कानून के अनुसार जिम्मेदार व्यक्तियों और जिन अधिकारियों की भूमिका सामने आए, उनके विरुद्ध भी वैधानिक कार्रवाई की जाए।

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