॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
भगवान जगन्नाथ स्वामी जी की 16 को छोटे रिपटा से निकलेगी भब्य रथ यात्रा नए रथ में विराजमान होंगे महाप्रभु
जगन्नाथ के भात को, जगत पसारे हाथ।
महाप्रभु श्री जगन्नाथ स्वामी जी की विराट, भव्य-दिव्य सनातनी नन्दिघोष रथयात्रा
दैनिक रेवांचल टाईम्स - मंडला, प्रति वर्ष अनुसार इस वर्ष भी नर्मदा जी के छोटे पुल श्री सिद्ध घाट रेवा दरबार (छोटा रपटा), मण्डला से 16 जुलाई को नगर भ्रमण के लिए निकलेगे महाप्रभु श्री जगन्नाथ स्वामी जी जहा एक आत्मीय वैदिक सनातन
सनातन धर्म की आत्मा उसकी वैदिक तिथियाँ हैं
जिस प्रकार रामनवमी, नवरात्र, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, विजयादशमी, दीपावली और महाशिवरात्रि अपने-अपने वैदिक पंचांग के अनुसार ही मनाए जाते हैं, उसी प्रकार महाप्रभु श्री जगन्नाथ स्वामी जी की विश्वविख्यात रथयात्रा भी केवल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को ही निकाली जाती है।
श्री सिद्ध घाट रेवा दरबार (छोटा रपटा), मण्डला में वर्ष 2016 से विराजमान महाप्रभु श्री जगन्नाथ स्वामी की सेवा, पूजा एवं उत्सव श्रीधाम जगन्नाथपुरी की सनातन परम्परा के अनुरूप सम्पन्न किए जा रहे हैं। प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी ज्येष्ठाभिषेक, अनवसर (विश्राम) लीला, औषधीय भोग, तथा स्वस्थ होने के उपरांत आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के पावन अवसर पर नन्दिघोष रथयात्रा का आयोजन किया जा रहा है।
*रथयात्रा महोत्सव*
वैदिक तिथि : आषाढ़ शुक्ल द्वितीया
गुरुवार, 16 जुलाई 2026
दोपहर 12:00 बजे
प्रारम्भ : श्री सिद्ध घाट रेवा दरबार (छोटा रपटा), मण्डला
*नगर भ्रमण* *:*
श्री सिद्ध घाट रेवा दरबार → नेहरू स्मारक → स्टेट बैंक चौराहा → लालीपुर → बस स्टैंड → चिलमन चौक → श्रीराम मंदिर (पड़ाव) → चिलमन चौक → उदय चौक → नेहरू स्मारक → पुनः श्री सिद्ध घाट रेवा दरबार।
श्रद्धालुओं से आत्मीय निवेदन
*कहा जाता है कि*—
जो भक्त श्रद्धा से महाप्रभु के नन्दिघोष रथ की डोर पकड़कर कुछ कदम भी चल लेता है, महाप्रभु उसके जीवन की डोर स्वयं थाम लेते हैं।
*यात्रा के दौरान-* आपका मन हो तो अपने हाथों से पुष्प, माला अथवा महाप्रसाद अर्पित कीजिए।
और यदि आपके पास इनमें से कुछ भी न हो, तो केवल एक *तुलसी दल ही-* श्रद्धापूर्वक अर्पित कर दीजिए।
क्योंकि महाप्रभु स्वर्ण, रजत अथवा अर्थ के वैभव से उतना नहीं रीझते, जितना एक निर्मल हृदय से श्रद्धापूर्वक अर्पित *तुलसी दल-* पर रीझ जाते हैं।
*निर्मल मन जन सो मोहि पावा*।
*मोहि कपट छल छिद्र न भावा*॥"
और भगवान स्वयं कहते हैं—
*पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति*।
महाप्रभु के दरबार में सेवा का कोई मूल्य नहीं होता, क्योंकि—
*सेवा वही, जिसमें अर्थ का नहीं, श्रद्धा का समर्पण हो*।
समस्त धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं को सपरिवार सादर आमंत्रण
हम तो केवल निमित्त हैं।
निमंत्रण देना हमारे हाथ में है, किन्तु बुलाना तो केवल दीनबन्धु, दीनानाथ के हाथ में है।
*विश्वास कीजिए---*
यदि यह संदेश आपके हाथों तक पहुँचा है, तो इसे केवल संयोग मत मानिए; संभव है यह स्वयं महाप्रभु का स्नेहिल बुलावा हो।
आइए...
केवल महाप्रभु के रथ की डोर ही मत खींचिए, अपितु अपने जीवन की डोर भी निर्मल मन, क्रम और वचन से महाप्रभु श्री जगन्नाथ स्वामी के श्रीचरणों में समर्पित कर दीजिए।
यही रथयात्रा का वास्तविक पुण्य है।
यही भक्ति की सार्थकता है।
यही जीवन की परम यात्रा है।
*हमारी रथयात्रा के पंचसूत्र*
1- परम्परा वही, जो वैदिक पंचांग की तिथि से जुड़ी हो।
2- भक्ति वही, जो निर्मल मन से जुड़ी हो।
3- सेवा वही, जिसमें अर्थ का नहीं, श्रद्धा का समर्पण हो।
4- रथयात्रा वही, जिसमें महाप्रभु स्वयं भक्तों के बीच पधारें।
5- जीवन वही, जो महाप्रभु के श्रीचरणों में समर्पित हो।
*महाप्रभु की चरण-वंदना में*
संध्या आरती मंच
श्री सिद्ध घाट रेवा दरबार (छोटा रपटा), मण्डला
दीनबन्धु दीनानाथ - जय-जय जगन्नाथ।
