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जब अपने ही बन जाएं अजनबी: बदलते भारतीय परिवारों में संवादहीनता और पीढ़ीगत संघर्ष पर श्रीप्रकाश सिंह निमराजे का समाजशास्त्रीय अध्ययन

दैनिक रेवाँचल टाईम्स | ग्वालियर, मध्यप्रदेश

जब अपने ही अजनबी बन जाएं: भारतीय परिवारों में संवादहीनता और रिश्तों के संकट पर समाजशास्त्रीय अध्ययन

शोधकर्ता श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने परिवार, पीढ़ीगत संघर्ष और सामाजिक समानता के विभिन्न पहलुओं का किया विश्लेषण

दैनिक रेवाँचल टाईम्स – ग्वालियर। बदलते भारतीय समाज में परिवारों के भीतर बढ़ती भावनात्मक दूरी, पीढ़ियों के बीच वैचारिक मतभेद, संवादहीनता और मानवीय संबंधों की चुनौतियों को लेकर गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर के अध्यक्ष एवं शोधकर्ता श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने एक विस्तृत समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत किया है।



'जब अपने ही अजनबी बन जाएँ : भारतीय परिवार, पीढ़ीगत संघर्ष, संवादहीनता और मानवीय संबंधों के संकट का समाजशास्त्रीय अध्ययन' शीर्षक से तैयार इस शोध में पारिवारिक संबंधों को केवल परंपरा और रक्त-संबंधों के आधार पर नहीं, बल्कि विश्वास, समानता, संवाद, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के संदर्भ में समझने का प्रयास किया गया है।

परिवार टूटता नहीं, संवाद कमजोर होने से संबंधों में आती है दूरी

शोधकर्ता श्रीप्रकाश सिंह निमराजे के अध्ययन का केंद्रीय विचार है कि परिवार की संरचना में बदलाव को अपने आप सामाजिक विघटन नहीं माना जा सकता। संयुक्त परिवार हो या एकल परिवार, संबंधों की वास्तविक मजबूती उसमें मौजूद विश्वास, सहयोग, संवेदना और पारस्परिक सम्मान पर निर्भर करती है।

अध्ययन में बताया गया है कि कई बार छोटी-छोटी शिकायतें अनसुनी रह जाती हैं। धीरे-धीरे निराशा बढ़ती है, बातचीत सीमित होती है और परिवार के सदस्य एक साथ रहने के बावजूद भावनात्मक रूप से दूर होने लगते हैं।

शिकायत से खामोशी तक का सफर

अपेक्षा → असहमति → शिकायत → अनसुना किया जाना → निराशा → संवाद में कमी → खामोशी → भावनात्मक दूरी

शोध में इसे एक संभावित विश्लेषणात्मक प्रक्रिया बताया गया है, जो प्रत्येक परिवार पर अनिवार्य रूप से लागू नहीं होती।

पीढ़ियों के बीच बदलती सोच और अपेक्षाएं भी संघर्ष का कारण

अध्ययन के अनुसार प्रत्येक पीढ़ी अलग सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और तकनीकी परिस्थितियों में विकसित होती है। बुजुर्ग पारिवारिक परंपराओं, अनुभव और सामूहिक निर्णयों को महत्व दे सकते हैं, जबकि युवा व्यक्तिगत स्वतंत्रता, रोजगार, करियर और अपने निर्णय लेने के अधिकार को प्राथमिकता दे सकते हैं।

शोध में कहा गया है कि इन मतभेदों का समाधान किसी एक पीढ़ी को सही और दूसरी को गलत ठहराने में नहीं है। आवश्यकता अनुभव और नई सोच के बीच संतुलन स्थापित करने की है।

आर्थिक दबाव, पलायन और डिजिटल तकनीक का भी प्रभाव

शोध में बेरोजगारी, अस्थिर रोजगार, महंगाई, कर्ज, शिक्षा और आवास पर होने वाले खर्च को पारिवारिक तनाव से जुड़े महत्वपूर्ण कारकों के रूप में देखा गया है। आर्थिक असुरक्षा के कारण परिवारों के भीतर जिम्मेदारियों, निर्णयों और संसाधनों के उपयोग को लेकर मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं।

रोजगार और शिक्षा के लिए होने वाले पलायन से परिवार के सदस्यों के बीच भौतिक दूरी बढ़ने तथा बुजुर्गों की देखभाल में कठिनाइयां आने की संभावना पर भी विचार किया गया है।

डिजिटल तकनीक के संबंध में अध्ययन बताता है कि मोबाइल, सोशल मीडिया और वीडियो कॉल ने संपर्क के अवसर बढ़ाए हैं, लेकिन अत्यधिक डिजिटल व्यस्तता आमने-सामने के संवेदनशील संवाद को प्रभावित कर सकती है।

महिलाओं की समान भागीदारी और घरेलू श्रम के सम्मान पर जोर

शोध में महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, आर्थिक स्वतंत्रता और पारिवारिक निर्णयों में समान भागीदारी को महत्वपूर्ण माना गया है। इसके अनुसार महिलाओं की बढ़ती स्वतंत्रता को परिवार के लिए संकट समझने के बजाय समानता और न्याय की दिशा में अवसर के रूप में देखना चाहिए।

अध्ययन में घरेलू कार्यों, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा और भावनात्मक सहयोग को भी परिवार में महत्वपूर्ण योगदान बताया गया है। इन जिम्मेदारियों का न्यायपूर्ण बंटवारा संबंधों को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है।

संविधान और डॉ. आंबेडकर के सामाजिक लोकतंत्र से जोड़े पारिवारिक मूल्य

श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने अध्ययन में भारतीय संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के मूल्यों को पारिवारिक जीवन के नैतिक आधार के रूप में प्रस्तुत किया है।

शोध में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के सामाजिक लोकतंत्र संबंधी चिंतन का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुता केवल सार्वजनिक जीवन तक सीमित मूल्य नहीं हैं। इनका महत्व परिवार में भी सम्मानपूर्ण व्यवहार और न्यायपूर्ण संबंधों के निर्माण के लिए है।

हालांकि अध्ययन स्पष्ट करता है कि संविधान के प्रत्येक अनुच्छेद को सीधे निजी पारिवारिक विवाद का कानूनी नियम नहीं माना जा सकता, बल्कि संवैधानिक मूल्य परिवारों को अधिक मानवीय और लोकतांत्रिक बनाने की वैचारिक दिशा प्रदान करते हैं।

बौद्ध दर्शन की मैत्री, करुणा और सम्यक संवाद को बताया उपयोगी

अध्ययन में बौद्ध दर्शन की मैत्री, करुणा, मुदिता, समता और सम्यक वाणी की अवधारणाओं को भी पारिवारिक संबंधों के संदर्भ में समझाया गया है।

इसके अनुसार परिवार के सदस्यों में एक-दूसरे के प्रति सद्भाव, दूसरों के दुख को समझने की संवेदनशीलता, उपलब्धियों में प्रसन्नता और सम्मानजनक बातचीत का भाव होना चाहिए।

शोध का दृष्टिकोण है कि मतभेदों को दबाने के बजाय करुणा और विवेक के साथ समाधान खोजा जाना आवश्यक है।

डॉ. माया SH की विद्वत टिप्पणी का भी उल्लेख

अध्ययन में पुणे की डॉ. माया SH की एक विद्वत टिप्पणी का उल्लेख किया गया है। इस टिप्पणी में परिवार को समाज की प्रथम और महत्वपूर्ण संस्था बताते हुए विश्वास, सहयोग, सुरक्षा, संवाद, जिम्मेदारी और सम्मान जैसे मूल्यों को रेखांकित किया गया है।

शोधकर्ता ने स्पष्ट किया है कि इस टिप्पणी को समकालीन सामाजिक विमर्श के संदर्भ के रूप में शामिल किया गया है, न कि किसी प्राथमिक सर्वेक्षण या स्वतंत्र शोध परिणाम के रूप में।

परिवारों को मजबूत बनाने के लिए दिए व्यावहारिक सुझाव

अध्ययन में परिवारों के भीतर नियमित संवाद, दूसरे की बात सुनने की संस्कृति, महिलाओं एवं बच्चों की गरिमा का सम्मान, बुजुर्गों की देखभाल, आर्थिक पारदर्शिता और डिजिटल संतुलन बनाए रखने की सलाह दी गई है।

इसके अतिरिक्त घरेलू श्रम का सम्मान करने, पीढ़ियों के बीच समझ बढ़ाने, किसी भी सामाजिक आधार पर भेदभाव न करने तथा आवश्यकता पड़ने पर उपयुक्त परामर्श और सामाजिक सहयोग लेने को भी उपयोगी बताया गया है।

द्वितीयक स्रोतों पर आधारित है समाजशास्त्रीय अध्ययन

शोधकर्ता के अनुसार यह अध्ययन वर्णनात्मक, ऐतिहासिक, तुलनात्मक और विश्लेषणात्मक पद्धति पर आधारित है। इसमें समाजशास्त्रीय साहित्य, संवैधानिक विचारों, डॉ. आंबेडकर के चिंतन, बौद्ध दर्शन तथा अन्य उपलब्ध संदर्भ सामग्री का उपयोग किया गया है।

अध्ययन में कोई नया प्राथमिक सर्वेक्षण, प्रश्नावली या क्षेत्रीय साक्षात्कार नहीं किया गया है। इसलिए प्रस्तुत निष्कर्षों को वैचारिक एवं समाजशास्त्रीय विश्लेषण के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि देशभर के परिवारों पर किए गए किसी नए सांख्यिकीय सर्वेक्षण के परिणाम के रूप में।

शोध का केंद्रीय संदेश

परिवार की वास्तविक मजबूती केवल एक साथ रहने या पारंपरिक संरचना बनाए रखने में नहीं, बल्कि प्रत्येक सदस्य की बात सुनने, उसकी गरिमा का सम्मान करने और मतभेद होने पर भी संवाद तथा संवेदना बनाए रखने में है।

शोधकर्ता एवं लेखक: श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
पद: अध्यक्ष, गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS)
स्थान: ग्वालियर, मध्यप्रदेश
शोध विषय: भारतीय परिवार, पीढ़ीगत संघर्ष, संवादहीनता और मानवीय संबंधों का समाजशास्त्रीय अध्ययन
दैनिक रेवाँचल टाईम्स
समाज | परिवार | शोध एवं विचार | सामाजिक समानता

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