नक्सलमुक्त मंडला में पुलिस के सरकारी वाहन भी हुए गोपनीय!
डीजल और मरम्मत का हिसाब मांगने पर लगा दी सुरक्षा की धारा
सरकार ने 7 दिसंबर 2025 को मंडला को नक्सलमुक्त घोषित किया,
लेकिन पुलिस के वाहनों का खर्च बताने में अब भी नक्सल प्रभावित क्षेत्र का हवाला!
आखिर सरकारी खजाने का हिसाब देने में इतना परहेज क्यों?
दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला।सरकारी दफ्तरों में पारदर्शिता और जवाबदेही के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। सरकार कहती है कि जनता को सरकारी योजनाओं, उनके क्रियान्वयन और सरकारी धन के उपयोग की जानकारी मिलना उसका अधिकार है। लेकिन मंडला पुलिस विभाग का एक मामला इन दावों पर ही सवालिया निशान लगा रहा है। यहां पुलिस के शासकीय वाहनों में खर्च हुए डीजल, मरम्मत और रखरखाव का हिसाब मांग लिया गया तो जवाब में सुरक्षा की ऐसी दीवार खड़ी कर दी गई, मानो आवेदक ने सरकारी वाहनों का खर्च नहीं, बल्कि पुलिस की कोई बेहद गोपनीय रणनीति मांग ली हो। मामला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार 7 दिसंबर 2025 को मंडला और डिंडोरी जिलों को नक्सल प्रभाव से मुक्त घोषित कर चुकी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बालाघाट में आयोजित कार्यक्रम के दौरान यह घोषणा की थी। इसके बावजूद नवंबर 2026 में मंडला पुलिस के जवाब में अनुविभागीय पुलिस अधिकारियों के कार्यालयों को नक्सल प्रभावित संवेदनशील क्षेत्र बताते हुए सूचना देने से इनकार कर दिया गया। अब सवाल यह है कि जब सरकार की घोषणा में मंडला नक्सलमुक्त हो चुका है, तो सरकारी वाहनों के डीजल और मरम्मत का हिसाब मांगते ही संवेदनशीलता वापस कैसे लौट आई?
*डीजल का हिसाब मांगा तो सुरक्षा खतरे में पड़ गई!*
जानकारी के अनुसार जन अधिकार जन चेतना समिति के गोपाल सिंह बघेल, निवासी जबलपुर ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 6(1) के तहत पुलिस अधीक्षक कार्यालय मंडला में आवेदन प्रस्तुत किया था। इसमें अनुविभागीय अधिकारी पुलिस मंडला एवं नैनपुर को शासन से आवंटित शासकीय वाहनों की टूर डायरी, डीजल खपत, वाहनों की टूट-फूट, मरम्मत कार्य और भुगतान से संबंधित अभिलेख मांगे गए थे।
लेकिन 03 नवंबर 2026 को जारी जवाब में लोक सूचना अधिकारी ने दोनों कार्यालयों को नक्सल प्रभावित संवेदनशील क्षेत्र बताते हुए आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(अ) एवं 8(1)(छ) का हवाला देकर जानकारी देने से इनकार कर दिया। यानी सरकारी वाहन किस काम में चले, कितना डीजल खर्च हुआ, कितनी बार मरम्मत हुई और सरकारी खजाने से कितना भुगतान किया गया, इन सवालों का जवाब भी सुरक्षा के दायरे में पहुंच गया।
*सरकार की घोषणा और विभाग के जवाब में विरोधाभास क्यों?*
एक ओर मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद मंडला को नक्सलमुक्त जिला बताया गया। दूसरी ओर पुलिस विभाग के सूचना अधिकारी के जवाब में नक्सल प्रभावित संवेदनशील क्षेत्र का हवाला दिया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नक्सलमुक्ति की सरकारी घोषणा केवल मंचों और भाषणों तक सीमित है, या फिर विभागीय अभिलेखों में आज भी पुरानी संवेदनशीलता कायम है? यदि क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी कोई विशेष परिस्थिति अब भी मौजूद है तो विभाग उसे स्पष्ट कर सकता है। लेकिन क्या हर सरकारी खर्च का ब्यौरा भी उसी श्रेणी में डाल दिया जाएगा?
*आरटीआई कानून में भी है पारदर्शिता का प्रावधान*
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 10 स्पष्ट करती है कि यदि किसी दस्तावेज के कुछ हिस्से संवेदनशील हैं तो उन्हें अलग करके बाकी गैर-संवेदनशील जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है। वहीं धारा 8(2) व्यापक जनहित में सूचना देने का रास्ता भी प्रदान करती है। ऐसे में सवाल है कि क्या टूर डायरी में दर्ज हर विवरण, डीजल के बिल, मरम्मत के भुगतान और वाहन रखरखाव के खर्च से किसी की जान को खतरा पैदा हो सकता है? यदि किसी रिकॉर्ड में वास्तव में सुरक्षा संबंधी जानकारी है तो उसे हटाकर शेष वित्तीय जानकारी क्यों नहीं दी गई? क्या पूरे आवेदन को एक ही झटके में खारिज करना सबसे आसान रास्ता मान लिया गया?
*जनता के पैसे का हिसाब मांगना गुनाह तो नहीं!*
सरकारी वाहन जनता के टैक्स से खरीदे जाते हैं। उनमें डलने वाला डीजल भी जनता के पैसे से आता है। उनकी मरम्मत और रखरखाव का भुगतान भी सरकारी खजाने से होता है। ऐसे में इन खर्चों का हिसाब मांगना कोई अपराध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक का वैधानिक अधिकार है।
एक तरफ सरकार पारदर्शी प्रशासन, सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी खर्च की जानकारी मांगने पर सुरक्षा की धाराएं सामने आ जाती हैं। यदि सरकारी वाहनों के खर्च का हिसाब ही गोपनीय हो जाएगा तो फिर सरकारी धन के उपयोग पर निगरानी कैसे होगी?
*अब प्रथम अपील पर टिकी निगाहें*
इस मामले में अब आवेदक के सामने प्रथम अपील का विकल्प है। प्रथम अपीलीय अधिकारी को यह देखना होगा कि सूचना रोकने के लिए लगाई गई धाराओं का इस मामले में वास्तविक आधार है या नहीं। साथ ही यह भी कि धारा 10 के तहत संवेदनशील अंश हटाकर बाकी जानकारी दी जा सकती थी या नहीं। मंडला जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले में जनता सरकारी व्यवस्था से जवाबदेही की उम्मीद करती है। ऐसे में पुलिस विभाग को भी यह समझना होगा कि सुरक्षा व्यवस्था की गोपनीयता और सरकारी खर्च की पारदर्शिता दो अलग-अलग विषय हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मंडला जिला को नक्सलमुक्त घोषित करने वाली केन्द्र व राज्य सरकार के बाद भी जिले में पुलिस के सरकारी वाहन और वाहनों का डीजल भी इतना संवेदनशील कैसे हो गया कि उसका हिसाब मांगते ही सुरक्षा खतरे में पड़ गई? क्या सरकारी वाहनों के खर्च का हिसाब सार्वजनिक करने से मंडला जिले में पुलिस की कानून-व्यवस्था बिगड़ जाएगी, या फिर हिसाब सार्वजनिक होने से किसी की जवाबदेही तय होने का डर है?
वही सरकार यदि वास्तव में पारदर्शिता चाहती है तो उसे अपने विभागों को भी जवाबदेह बनाना होगा। क्योंकि जनता के पैसे का हिसाब मांगना जनता का अधिकार है, किसी विभाग की कृपा नहीं!
क्या कहते है जिम्मेदार....
मुझे जारी पत्र की कोई जानकारी नही है कार्यालय में जो लोक सूचना अधिकारी नियुक्त है आपको इस संबंध में स्प्ष्ट वही बतला पाइए।
सुनील नागवंशी
रक्षित निरीक्षक केंद्र मंडला
मेरे द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम में नियमानुसार पुलिस अधीक्षक कार्यालय मंडला से एस डी ओ पी मंडला और नैनपुर को प्रदाय शासकीय वाहनों की टूर डायरी मरम्मत कार्य व भुगतान से सम्बंधित वांछित जानकारी माँग की गई है पर पुलिस विभाग से प्राप्त पत्र में लिखा गया है कि माँग की गई जानकारी गोपनीय जानकारी है और मंडला जिले के पुलिस विभाग को आज भी जानकारी नही की दिसम्बर 2025 में ही सरकार ने जिला को नकसलमुक्त घोषित किया चुका है। तो ये कैसी गोपनीयता है।
गोपाल सिंह बघेल
समाजसेवी जनाधिकार जन चेतना समिति जबलपुर
