होम्योपैथी के पंजीयन पर एलोपैथिक इलाज का आरोप, सर्जिकल उपकरण और एंटीबायोटिक दवाइयां जब्त
ग्रामीणों ने पूछा- एक पर कार्रवाई, बाकी को अभयदान क्यों
रेवांचल टाइम्स बीजाडांडी मंडला क्षेत्र में निजी क्लीनिकों की आड़ में कथित रूप से नियमों को ताक पर रखकर मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ किए जाने का मामला सामने आने के बाद आखिरकार स्वास्थ्य विभाग की नींद टूटी। खबर प्रकाशित होने के बाद प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम ने बीजाडांडी स्थित पाल क्लीनिक पर कार्रवाई करते हुए उसे सील कर दिया। क्लीनिक से सर्जिकल उपकरण और एंटीबायोटिक दवाइयां भी जब्त की गई हैं। इस कार्रवाई के बाद क्षेत्र में उन निजी क्लीनिकों और कथित झोलाछाप डॉक्टरों में हड़कंप मचा हुआ है, जो अपनी पंजीकृत चिकित्सा पद्धति से अलग जाकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
मामला 25 अक्टूबर का है, जब एक होम्योपैथी चिकित्सक द्वारा निजी क्लीनिक में एलोपैथिक पद्धति से इलाज किए जाने का मामला सामने आया था। बताया गया कि पाल क्लीनिक में पाइल्स का ऑपरेशन कराने के बाद एक मरीज की हालत गंभीर हो गई थी। स्थिति बिगड़ने पर मरीज को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बीजाडांडी से मेडिकल कॉलेज जबलपुर रेफर करना पड़ा। इस घटना ने क्षेत्र में संचालित निजी क्लीनिकों की कार्यप्रणाली और वहां मरीजों को दी जा रही चिकित्सा सुविधाओं पर सवाल खड़े कर दिए थे।
मामले की शिकायत के बाद स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया। सीबीएमओ डॉ. अजय तोष मरावी के मार्गदर्शन में डॉ. अंशुल शर्मा के नेतृत्व में मेडिकल टीम ने नायब तहसीलदार और पुलिस की मौजूदगी में पाल क्लीनिक का निरीक्षण किया। जांच के दौरान सामने आया कि क्लीनिक के संचालक का पंजीयन होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के अंतर्गत था, जबकि आरोप है कि वहां एलोपैथिक पद्धति से मरीजों का उपचार किया जा रहा था। टीम ने क्लीनिक से सर्जिकल उपकरण और एंटीबायोटिक दवाइयां जब्त कर क्लीनिक को सील कर दिया।
इस कार्रवाई को क्षेत्र के लोगों ने सराहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि स्वास्थ्य विभाग इसी तरह सक्रियता दिखाए तो क्षेत्र में अवैध रूप से संचालित चिकित्सा गतिविधियों पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कार्रवाई केवल एक क्लीनिक तक ही सीमित रहेगी या फिर पूरे विकासखंड में संचालित ऐसे अन्य ठिकानों की भी जांच होगी?
एक क्लीनिक सील, बाकी पर कार्रवाई कब
बीजाडांडी मुख्यालय में एक क्लीनिक पर कार्रवाई होने के बाद ग्रामीणों ने स्वास्थ्य विभाग के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। लोगों का कहना है कि विकासखंड में कथित झोलाछाप डॉक्टरों का जाल मकड़ी के जाल की तरह फैल चुका है। बाजार के दिनों में कुछ लोग बाहर से आकर मरीजों का इलाज करते हैं, तो कुछ मोटरसाइकिल से गांव-गांव पहुंचकर उपचार करने का दावा करते हैं। ऐसे लोगों की चिकित्सा योग्यता, पंजीयन और उपचार के तरीकों की जांच होना जरूरी है।
ग्रामीणों के अनुसार कालपी, पौड़ी और मनेरी सहित अन्य क्षेत्रों में भी निजी स्तर पर चिकित्सा सेवाएं संचालित होने की जानकारी सामने आती रही है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार नगरार पौड़ी क्षेत्र में भी एक चिकित्सक द्वारा डिस्पेंसरी खोलकर मरीजों को भर्ती करने तक की सुविधा उपलब्ध कराए जाने की बात कही जा रही है। यदि इन स्थानों पर भी पंजीकृत चिकित्सा पद्धति से अलग जाकर एलोपैथिक उपचार किया जा रहा है, तो स्वास्थ्य विभाग को तत्काल जांच करनी चाहिए।
सवाल यह है कि जब किसी चिकित्सक का पंजीयन एक विशेष चिकित्सा पद्धति के लिए है, तो उसे दूसरी पद्धति से इलाज करने की अनुमति किसने दी?क्या संबंधित विभाग को इन क्लीनिकों की जानकारी नहीं है? क्या इनका नियमित निरीक्षण किया जाता है? यदि नहीं, तो अब तक जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे थे?
मोटरसाइकिल पर चलता है इलाज का कारोबार
ग्रामीण क्षेत्रों में एक और समस्या सामने आ रही है। बताया जाता है कि कुछ कथित चिकित्सक मोटरसाइकिल से गांव-गांव पहुंचकर मरीजों को दवाइयां देते हैं और उपचार करते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि ऐसे लोगों की न तो चिकित्सा योग्यता की जानकारी होती है और न ही उनके पास उपचार की पर्याप्त सुविधाएं होती हैं। इसके बावजूद भोले-भाले ग्रामीण उनके भरोसे अपनी बीमारी का इलाज कराने पहुंच जाते हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता की कमी और तत्काल इलाज की आवश्यकता का फायदा उठाकर ऐसे लोग अपना काम चला रहे हैं। यदि किसी मरीज को गलत दवा दे दी जाए, एलर्जी हो जाए या बीमारी गंभीर हो जाए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या मरीज की जिंदगी के साथ इस तरह का प्रयोग करने वालों पर केवल क्लीनिक सील करने की कार्रवाई पर्याप्त होगी?
सरकारी अस्पताल में डॉक्टर और मुफ्त दवाइयां, फिर निजी क्लीनिकों की ओर क्यों जा रहे मरीज
इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से भी जुड़ा है। जानकारी के अनुसार बीजाडांडी के सरकारी अस्पताल में चिकित्सक उपलब्ध हैं और मरीजों को निःशुल्क दवाइयां भी प्रदान की जा रही हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में ग्रामीण निजी क्लीनिकों और कथित झोलाछाप डॉक्टरों के पास उपचार कराने क्यों पहुंच रहे हैं
क्या सरकारी अस्पताल में मरीजों को समय पर उपचार नहीं मिल पा रहा है? क्या जांच सुविधाओं की कमी है? क्या मरीजों को डॉक्टरों तक पहुंचने में परेशानी होती है? या फिर निजी क्लीनिकों द्वारा तत्काल इलाज और बेहतर सुविधा का भरोसा देकर मरीजों को आकर्षित किया जा रहा है
सरकारी अस्पताल में सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद यदि ग्रामीण मजबूरी में ऐसे लोगों के पास पहुंच रहे हैं, जिनकी चिकित्सा योग्यता और उपचार पद्धति संदिग्ध है, तो यह केवल झोलाछाप डॉक्टरों का मामला नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की पहुंच और भरोसे से जुड़ा विषय भी है। विभाग को सरकारी अस्पताल की व्यवस्थाओं की भी समीक्षा करनी चाहिए।
कार्रवाई की सराहना, लेकिन अभियान पूरे विकासखंड में चलना चाहिए
पाल क्लीनिक को सील करने की कार्रवाई के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम ने आगे भी कार्रवाई जारी रखने की बात कही है। यह आश्वासन ग्रामीणों के लिए उम्मीद जरूर जगाता है, लेकिन अब इसकी असली परीक्षा आने वाले दिनों में होगी। लोगों की मांग है कि केवल शिकायत मिलने पर ही नहीं, बल्कि नियमित रूप से विकासखंड के सभी निजी क्लीनिकों, डिस्पेंसरियों और गांव-गांव जाकर इलाज करने वाले कथित चिकित्सकों की जांच की जाए।
स्वास्थ्य विभाग को प्रत्येक क्लीनिक के पंजीयन, चिकित्सक की योग्यता, उपचार की पद्धति, दवाइयों के भंडारण और मरीजों को दी जा रही सुविधाओं की जांच करनी चाहिए। जहां नियमों का उल्लंघन पाया जाए, वहां नियमानुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर संबंधित चिकित्सा पंजीयन प्राधिकरण को भी जानकारी भेजी जानी चाहिए।
*ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि जब पाल क्लीनिक पर कार्रवाई हो सकती है, तो कालपी, पौड़ी, मनेरी, नगरार और अन्य गांवों में संचालित संदिग्ध क्लीनिकों की जांच क्यों नहीं? आखिर कार्रवाई का पैमाना सभी के लिए एक समान होना चाहिए*
एक क्लीनिक सील कर देना विभाग की जिम्मेदारी का अंत नहीं, बल्कि व्यापक जांच अभियान की शुरुआत होनी चाहिए। स्वास्थ्य विभाग यदि वास्तव में लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ रोकना चाहता है तो उसे पूरे विकासखंड में अभियान चलाकर ऐसे सभी ठिकानों की पहचान करनी होगी। अन्यथा आज एक क्लीनिक पर कार्रवाई होगी और कल किसी दूसरे स्थान से मरीज की हालत बिगड़ने की खबर सामने आएगी।
*अब देखना यह है कि पाल क्लीनिक को सील करने के बाद स्वास्थ्य विभाग का अभियान वास्तव में पूरे विकासखंड तक पहुंचेगा या फिर कुछ दिनों की सक्रियता के बाद मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। ग्रामीणों को कार्रवाई के आश्वासन नहीं, बल्कि सुरक्षित और जवाबदेह स्वास्थ्य व्यवस्था चाहिए।*
