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आलीराजपुर की शाही संपत्तियों के नामांतरण पर गंभीर सवाल, नगरपालिका की खरीदी और दान में मिली जमीन भी विवादों में!

दैनिक रेवाँचल टाईम्स | आलीराजपुर

आलीराजपुर की शाही संपत्तियों के नामांतरण पर गंभीर सवाल, नगरपालिका की खरीदी और दान में मिली जमीन भी विवादों में!

1972 के दस्तावेजों और 2024 के नामांतरण की जांच की मांग, तत्कालीन कलेक्टर एवं नामांतरण अधिकारी की भूमिका पर सवाल

विशेष रिपोर्ट : विक्रम सेन

दैनिक रेवाँचल टाईम्स – आलीराजपुर। आलीराजपुर रियासत की ऐतिहासिक शाही संपत्तियों के स्वामित्व एवं नामांतरण को लेकर नया विवाद सामने आया है। वर्ष 1972 के पंजीकृत विक्रयपत्र, फतेह क्लब के दानपत्र, पुराने राजस्व अभिलेखों और वर्ष 2026-27 की डिजिटल हस्ताक्षरित खसरा नकल में दर्ज विवरणों के आधार पर वर्ष 2024 में हुए नामांतरण की वैधानिकता पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।


विवाद में शामिल संपत्तियों का अनुमानित मूल्य लगभग 1,000 से 1,200 करोड़ रुपये बताया जा रहा है। हालांकि इस मूल्यांकन की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। मुख्य प्रश्न यह है कि वर्ष 2022 की विवादित वसीयत के आधार पर निजी नामांतरण करते समय नगरपालिका की पूर्व में खरीदी गई भूमि, दान में प्राप्त संपत्तियों, सार्वजनिक रास्तों और धार्मिक स्थलों के अधिकारों का विधिवत परीक्षण किया गया था या नहीं।

इस मामले में तत्कालीन कलेक्टर अभय बेडेकर और तत्कालीन नायब तहसीलदार एवं नामांतरण अधिकारी हर्षल बहरानी से संबंधित निर्णयों तथा अभिलेखीय प्रक्रियाओं की स्वतंत्र एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग सामने आई है।

महत्वपूर्ण तथ्य

नामांतरण में गड़बड़ी, पद के दुरुपयोग अथवा किसी को अनुचित लाभ पहुंचाने संबंधी बातें जांच की मांग और आरोपों का विषय हैं। उपलब्ध सामग्री में किसी अधिकारी के विरुद्ध आपराधिक दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। वास्तविक स्थिति मूल अभिलेखों, संबंधित आदेशों और स्वतंत्र जांच से ही स्पष्ट हो सकेगी।

नामांतरण पहले, राजस्व रिकॉर्ड में परिवर्तन बाद में!

वर्ष 2026-27 की डिजिटल हस्ताक्षरित खसरा नकल के उपलब्ध विवरण के अनुसार राजवाड़ा परिसर से संबंधित सर्वे नंबर 140/1/1 का क्षेत्रफल 2.2170 हेक्टेयर दर्ज बताया गया है। भूमिस्वामी के रूप में गुजरात के देवगढ़ बारिया निवासी तुषार सिंह का नाम अंकित होने की जानकारी दी गई है।

राजस्व रिकॉर्ड से संबंधित प्रमुख तारीखें

22 अगस्त से 5-6 सितंबर 2024 : तहसील कार्यालय और तत्कालीन कलेक्टर के समक्ष नगरपालिका सहित विभिन्न पक्षों की सात आपत्तियां दिए जाने का दावा।

9 सितंबर 2024 : तहसील स्तर पर विवादित नामांतरण आदेश।

23 सितंबर 2024 : कलेक्टर न्यायालय के प्रकरण क्रमांक 0311/ब-121/2024-25 से संबंधित भू-अभिलेख कार्रवाई।

7 नवंबर 2024 : संबंधित प्रकरण के आधार पर सर्वे नंबर 140/1/1 जोड़े जाने की प्रविष्टि।

21 नवंबर 2024 : तहसीलदार न्यायालय के प्रकरण क्रमांक 0669/अ-6/2024-25 के आधार पर अभिलेख अद्यतन।

5 मई 2025 : तहसीलदार प्रकरण क्रमांक 0053/अ-6(अ)/2024-25 के आधार पर खसरा टिप्पणी में परिवर्तन।

इस घटनाक्रम से यह सवाल उठता है कि सितंबर 2024 में नामांतरण आदेश पारित किए जाने के समय संबंधित सर्वे नंबरों की वास्तविक अभिलेखीय स्थिति क्या थी। यदि किसी सर्वे नंबर की स्थिति निष्क्रिय थी अथवा बाद में उसमें परिवर्तन किया गया, तो नामांतरण और उसके बाद की प्रविष्टियों का कानूनी आधार स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।

राजवाड़ा परिसर में आबादी और बावड़ी, फिर कृषि भूमि का वर्गीकरण क्यों?

प्रस्तुत खसरा विवरण के अनुसार सर्वे नंबर 140/1/1 का क्षेत्रफल 2.2170 हेक्टेयर है। टिप्पणी कॉलम में लगभग 2.200 हेक्टेयर आबादी और 0.017 हेक्टेयर बावड़ी का उल्लेख बताया गया है।

इसके बावजूद भूमि का वर्गीकरण कृषि के रूप में दर्शाए जाने पर प्रश्न उठाया गया है। सवाल यह है कि राजवाड़ा परिसर, आबादी और बावड़ी जैसी प्रविष्टियां होने के बावजूद कृषि वर्गीकरण किस राजस्व प्रावधान और किन दस्तावेजों के आधार पर कायम रखा गया।

इस विरोधाभास की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए पुराने और वर्तमान खसरों, राजस्व नक्शों तथा संबंधित संशोधन आदेशों का तुलनात्मक परीक्षण जरूरी है।

1972 में नगरपालिका को बेची गई थी राजमहल परिसर की भूमि

मामले में वर्ष 1972 का पंजीकृत विक्रयपत्र महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया गया है। इसके उपलब्ध विवरण के अनुसार पुराने राजमहल परिसर के दक्षिणी हिस्से में लगभग 9,150 वर्गफुट भूमि नगरपालिका आलीराजपुर को 8,385 रुपये 74 पैसे के विशेष रियायती मूल्य पर बेची गई थी।

विक्रयपत्र में उत्तर दिशा में सड़क, दक्षिण में विक्रेता की पक्की दीवार, पूर्व में खुला राजमहल परिसर और पश्चिम में सभा-मंडप के पीछे सार्वजनिक सड़क का उल्लेख होने की जानकारी है।

इसके अतिरिक्त पुराने राजमहल के द्वार से संबंधित भूमि तक सड़क बनाने तथा सभा-मंडप के पूर्वी हिस्से में 20 फुट चौड़ी सड़क की व्यवस्था सहित नालियों और सार्वजनिक प्रबंधन से संबंधित शर्तों का भी उल्लेख बताया गया है।

अब सवाल यह है कि वर्ष 2024 में निजी नामांतरण से पहले इस पंजीकृत विक्रयपत्र, उसकी चतुर्सीमा और संलग्न नक्शे का परीक्षण किया गया था या नहीं। यदि नगरपालिका को पूर्व में बेची गई भूमि का कोई हिस्सा बाद में निजी नामांतरण में शामिल हुआ है, तो उसकी वैधानिक स्थिति की जांच आवश्यक होगी।

फतेह क्लब की दान में मिली संपत्ति पर किसका अधिकार?

फतेह क्लब से संबंधित सर्वे नंबर 128 का क्षेत्रफल लगभग 2.6790 हेक्टेयर बताया गया है।

28 अक्टूबर 1972 के पंजीकृत दानपत्र के उपलब्ध विवरण के अनुसार फतेह क्लब भवन, बैडमिंटन हॉल, खेल मैदान और संबंधित भूमि नगरपालिका को सार्वजनिक प्रयोजन के लिए दिए जाने का उल्लेख है।

प्रश्न उठाया गया है कि वर्ष 2024 के नामांतरण में दान की गई भूमि और अन्य भूमि का पृथक सीमांकन तथा स्वामित्व परीक्षण किया गया था या नहीं।

विवादित वसीयत में संपूर्ण सर्वे नंबर 128 का स्पष्ट उल्लेख नहीं होने की बात भी सामने रखी गई है। ऐसे में मूल दानपत्र, उसके नक्शे, पुराने खसरे, वसीयत और नामांतरण आदेश का मिलान महत्वपूर्ण हो जाता है।

सार्वजनिक रास्तों के निजी स्वामित्व पर सवाल

सर्वे नंबर 129, रकबा लगभग 0.3680 हेक्टेयर, में पुराने सार्वजनिक रास्तों की स्थिति को लेकर वर्ष 1954-55 के खाता-खसरे और राजस्व नक्शों का उल्लेख किया गया है।

इसी तरह ग्राम राक्सा के सर्वे नंबर 145, रकबा लगभग 0.0200 हेक्टेयर, को दशकों से सार्वजनिक गली के रूप में उपयोग किए जाने का दावा किया गया है। उपलब्ध विवरण के अनुसार वर्तमान रिकॉर्ड में इसे निजी कृषि भूमि दर्शाकर तुषार सिंह का नाम दर्ज है।

यदि संबंधित भूमियों का सार्वजनिक रास्तों के रूप में उपयोग और वैधानिक स्थिति प्रमाणित होती है, तो नामांतरण से पहले नगरपालिका के अधिकारों, पुराने नक्शों, सार्वजनिक उपयोग और स्थानीय निवासियों के आवागमन से संबंधित दस्तावेजों का परीक्षण जरूरी होगा।

हनुमान मंदिर, शिव मंदिर और बावड़ी की भूमि की स्थिति भी जांच के घेरे में

सर्वे नंबर 142/1 का क्षेत्रफल लगभग 0.0890 हेक्टेयर बताया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित क्षेत्र में हनुमान मंदिर स्थित है, जबकि वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड में निजी स्वामित्व और कृषि वर्गीकरण होने की बात कही गई है।

विवादित वसीयत में राजवाड़ा परिसर स्थित शिव मंदिर, हनुमान मंदिर और बावड़ी के संरक्षण तथा प्रबंधन संबंधी व्यवस्थाओं का उल्लेख होने का भी दावा है।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक उपयोग वाली संपत्तियों के अधिकारों की पहचान एवं सुरक्षा के लिए नामांतरण प्रक्रिया में क्या परीक्षण किया गया।

तत्कालीन कलेक्टर और नामांतरण अधिकारी के निर्णयों की जांच की मांग

इस प्रकरण में तत्कालीन कलेक्टर अभय बेडेकर और तत्कालीन नायब तहसीलदार हर्षल बहरानी से संबंधित राजस्व निर्णयों तथा प्रक्रियाओं की उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई है।

जांच का महत्वपूर्ण विषय यह होगा कि संबंधित अधिकारियों के समक्ष कौन-कौन से अभिलेख उपलब्ध थे, नगरपालिका की आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई, प्रभावित पक्षकारों को सुनवाई का अवसर मिला या नहीं और बाद में राजस्व रिकॉर्ड में किए गए परिवर्तनों का कानूनी आधार क्या था।

यदि स्वतंत्र जांच में किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति द्वारा जानबूझकर दस्तावेज छिपाने, अभिलेखों में अनुचित परिवर्तन कराने, अधिकारों की अनदेखी करने अथवा पद के दुरुपयोग का प्रमाण मिलता है, तो लागू कानूनों के अनुसार जिम्मेदारी तय की जा सकती है।

उच्चस्तरीय जांच के लिए 10 प्रमुख सवाल

1. वर्ष 1972 में नगरपालिका को बेची गई 9,150 वर्गफुट भूमि वर्तमान में किस सर्वे नंबर में दर्ज है?

2. क्या वर्ष 2024 के निजी नामांतरण में उस भूमि का कोई हिस्सा शामिल हुआ?

3. नामांतरण के समय सर्वे नंबर 140/1 की अभिलेखीय स्थिति क्या थी?

4. सितंबर और नवंबर 2024 की भू-अभिलेख कार्रवाइयों के मूल आदेश क्या थे?

5. नवंबर 2024 तथा मई 2025 में किए गए अभिलेखीय परिवर्तनों का आधार क्या था?

6. फतेह क्लब की दान में मिली भूमि का पृथक सीमांकन हुआ या नहीं?

7. सर्वे नंबर 129 और 145 में सार्वजनिक रास्तों की स्थिति की जांच हुई थी या नहीं?

8. हनुमान मंदिर, शिव मंदिर और बावड़ी से जुड़े अधिकारों का परीक्षण किया गया?

9. क्या नगरपालिका को प्रभावित पक्षकार के रूप में सूचना और सुनवाई का अवसर मिला?

10. संबंधित राजस्व अधिकारियों के निर्णयों और प्रविष्टियों का दस्तावेजी एवं कानूनी आधार क्या है?

शाही उत्तराधिकार से आगे बढ़कर सार्वजनिक हित का मामला

आलीराजपुर की ऐतिहासिक संपत्तियों का विवाद केवल शाही उत्तराधिकार या निजी वसीयत तक सीमित नहीं है। यह नगरपालिका की खरीदी हुई संपत्ति, सार्वजनिक प्रयोजन के लिए दान की गई भूमि, पुराने रास्तों, धार्मिक स्थलों और नगरवासियों के उपयोग संबंधी अधिकारों से भी जुड़ा है।

वर्ष 1972 के पंजीकृत विक्रयपत्र और दानपत्र, वर्ष 2022 की विवादित वसीयत, वर्ष 2024-25 की राजस्व कार्रवाइयों तथा वर्तमान डिजिटल रिकॉर्ड के बीच कथित विरोधाभासों को स्पष्ट करने के लिए मूल दस्तावेजों का संयुक्त परीक्षण आवश्यक है।

बड़ा सवाल : सार्वजनिक संपत्तियों के अधिकार सुरक्षित हैं या नहीं?

जिन संपत्तियों को दशकों पहले नगरपालिका को बेचा गया अथवा सार्वजनिक उपयोग के लिए दान किया गया, उनकी वर्तमान राजस्व स्थिति क्या है? यदि इनमें से किसी भूमि को बाद के नामांतरण में निजी स्वामित्व के अंतर्गत दर्ज किया गया है, तो वह किस आदेश और किस दस्तावेज के आधार पर हुआ?

आलीराजपुर के नागरिकों के हित में आवश्यक है कि प्रशासन पुराने विक्रयपत्रों, दानपत्रों, नगरपालिका के संपत्ति रजिस्टर, राजस्व नक्शों, नामांतरण आदेशों और डिजिटल अभिलेखों की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करे।

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