प्राचीन बड़ी सिंहवाहिनी मंदिर में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, माता के दर्शन को पहुंच रहे भक्त
नवरात्रि में ज्वारे, खप्पर और जस गायन की परंपराओं से भक्तिमय हुआ महिष्मती का प्राचीन देवस्थल
नवमी पर सेठ भद्देलाल मार्ग से निकलता है जवारों का विसर्जन जुलूस, उर्दूघाट पर होता है विसर्जन
दैनिक रेवांचल टाइम्स | मंडला। ऐतिहासिक महिष्मती नगरी मंडला के सिंहवाहिनी वार्ड क्रमांक-9 में स्थित प्राचीन बड़ी सिंहवाहिनी मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। नवरात्रि के पावन अवसर पर माता के दर्शन, पूजा-अर्चना और जल अर्पित करने के लिए मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
मंडला के प्राचीन धार्मिक स्थलों में विशेष स्थान रखने वाले इस मंदिर को ‘सेठ परिवार का दिवाला’ के नाम से भी जाना जाता है। वर्षों से इस देवस्थल के साथ नगरवासियों की गहरी धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई हैं।
नगर के साथ दूरस्थ ग्रामीण अंचलों से भी श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर माता के दर्शन करने पहुंचते हैं।
सेठ परिवार की देखरेख में जीवंत हैं प्राचीन धार्मिक परंपराएं
प्राचीन बड़ी सिंहवाहिनी मंदिर का संचालन और देखरेख सेठ भद्देलाल गणेश प्रसाद अग्रवाल परिवार द्वारा की जाती है। मंदिर में प्रतिवर्ष चैत्र और क्वार नवरात्रि के अवसर पर विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं।
इन आयोजनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु ज्वारे बोते हैं और खप्पर की पारंपरिक धार्मिक विधियों का निर्वहन करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही ये परंपराएं आज भी श्रद्धालुओं को अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक जड़ों से जोड़े हुए हैं।
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि माता सिंहवाहिनी अपने भक्तों की प्रार्थनाएं सुनती हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। इसी विश्वास के साथ नगर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से लोग माता के दरबार में पहुंचते हैं।
नवरात्रि में पूजा-अर्चना, जस गायन और भजनों से गूंजता है मंदिर
नवरात्रि के प्रथम दिन से ही मंदिर में धार्मिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। श्रद्धालु माता के दर्शन करने और जल अर्पित करने के लिए पहुंचते हैं। पूजा-अर्चना के साथ दिनभर मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहता है।
माता की आराधना के दौरान जस गायन और भजन-कीर्तन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों में श्रद्धालु पूरे उत्साह और श्रद्धाभाव के साथ भाग लेते हैं।
नवरात्रि के दौरान मंदिर में आने वाले भक्तों की बड़ी संख्या इस प्राचीन देवस्थल के प्रति लोगों की गहरी आस्था और इसके धार्मिक महत्व को दर्शाती है।
- माता सिंहवाहिनी के दर्शन और जल अर्पण।
- चैत्र और क्वार नवरात्रि में ज्वारे बोना।
- खप्पर की पारंपरिक धार्मिक विधि।
- जस गायन और भजन-कीर्तन।
- नवमी पर जवारों का विसर्जन जुलूस।
नवमी पर निकलता है जवारों का भव्य विसर्जन जुलूस
बड़ी सिंहवाहिनी मंदिर की धार्मिक परंपराओं में नवमी के दिन आयोजित होने वाला जवारों का विसर्जन जुलूस विशेष महत्व रखता है।
इस दिन मंदिर से जवारों का जुलूस प्रारंभ होता है, जो सेठ भद्देलाल मार्ग से होते हुए धूमधाम के साथ उर्दूघाट पहुंचता है। यहां विधि-विधान के साथ जवारों का विसर्जन किया जाता है।
इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। माता के जयकारों और भक्तिमय वातावरण के बीच जुलूस नगर की प्राचीन धार्मिक परंपराओं की झलक प्रस्तुत करता है।
बड़ी सिंहवाहिनी मंदिर
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सेठ भद्देलाल मार्ग
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उर्दूघाट
नवमी के अवसर पर पारंपरिक जवारों का विसर्जन
उर्दूघाट का शिवालय भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र
जवारों के विसर्जन स्थल उर्दूघाट के किनारे अग्रवाल परिवार द्वारा स्थापित शिवालय भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहां भी श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
बड़ी सिंहवाहिनी मंदिर से लेकर उर्दूघाट तक जुड़ी धार्मिक परंपराएं मंडला की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
मंडला की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है मंदिर
प्राचीन बड़ी सिंहवाहिनी मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि मंडला की धार्मिक परंपराओं, सामूहिक श्रद्धा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक भी है।
वर्षों से यहां आयोजित होने वाले नवरात्रि उत्सव, ज्वारे बोने की परंपरा, खप्पर, जस गायन और विसर्जन जुलूस नगर की धार्मिक पहचान को बनाए हुए हैं।
बदलते समय के बीच इन परंपराओं का निरंतर निर्वहन यह दर्शाता है कि मंडला के लोगों का अपनी आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव आज भी गहरा है।
आस्था, परंपरा और भक्ति का अनूठा संगम
महिष्मती नगरी की प्राचीन बड़ी सिंहवाहिनी मंदिर में नवरात्रि की परंपराएं आज भी श्रद्धालुओं को एक सूत्र में जोड़ रही हैं।
