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रीवा में पांच लोगों को उठाया, दो पर गांजा बरामदगी का केस! बिछिया पुलिस की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

रीवा में पांच लोगों को उठाया, दो पर गांजा बरामदगी का केस! बिछिया पुलिस की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

परिजनों ने लगाए मारपीट और एक लाख रुपये मांगने के आरोप; DGP से स्वतंत्र जांच, CCTV फुटेज और पुलिस अभिलेख सुरक्षित कराने की मांग

दैनिक रेवांचल टाइम्स | रीवा। मध्यप्रदेश के रीवा जिले में बिछिया थाना पुलिस की एक कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला पांच लोगों को पुलिस द्वारा साथ ले जाने, उनमें से तीन को छोड़ने और शेष दो व्यक्तियों के खिलाफ 4 किलो 900 ग्राम गांजा बरामदगी का प्रकरण दर्ज किए जाने से जुड़ा है। अब इस घटनाक्रम में कथित मारपीट और एक लाख रुपये की मांग के आरोप भी सामने आए हैं।



जावेद अहमद की पत्नी सुलेहा बेगम और अन्य परिजनों की ओर से लगाए गए आरोपों के बाद मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई है। पुलिस महानिदेशक, मध्यप्रदेश पुलिस मुख्यालय भोपाल को भेजी गई शिकायत में संबंधित CCTV फुटेज, पुलिस रोजनामचा, वाहन लॉगबुक, गिरफ्तारी मेमो, जब्ती पंचनामा और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज तत्काल सुरक्षित कराने का अनुरोध किया गया है।

हालांकि, पुलिसकर्मियों पर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। पुलिस का विस्तृत आधिकारिक पक्ष भी सामने आना बाकी है।

पांच लोगों को साथ ले गई पुलिस, फिर तीन को क्यों छोड़ा?

प्राप्त शिकायत के अनुसार, 11 अक्टूबर 2026 की शाम करीब 7 बजे बिछिया थाना पुलिस जावेद अहमद के नए मकान पर पहुंची थी। उस समय वहां जावेद अहमद, सुमित सोनी, समीर खान, राहुल मिश्रा और शिब्बू खान सहित पांच व्यक्ति मौजूद थे।

आरोप है कि पुलिस सभी पांचों व्यक्तियों को अपने साथ ले गई। बाद में तीन व्यक्तियों को छोड़ दिया गया, जबकि जावेद अहमद और शिब्बू खान के विरुद्ध 4 किलो 900 ग्राम गांजा बरामद होने का दावा करते हुए एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया।

इस घटनाक्रम को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि पांचों व्यक्तियों को किस आधार पर साथ ले जाया गया था? तीन व्यक्तियों को किन परिस्थितियों में छोड़ा गया? और शेष दो के खिलाफ कथित बरामदगी की कार्रवाई किस स्थान और समय पर की गई?

इन सवालों के जवाब पुलिस के आधिकारिक रिकॉर्ड, स्वतंत्र गवाहों और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच से ही स्पष्ट हो सकते हैं।

परिजनों का गंभीर आरोप—एक लाख रुपये मांगे, नहीं देने पर की कार्रवाई!

मामले में सबसे गंभीर आरोप परिजनों की ओर से सामने आया है। उनका आरोप है कि बिछिया थाना प्रभारी और कुछ पुलिसकर्मियों ने युवक तथा उसके परिजनों से एक लाख रुपये की मांग की थी।

परिजनों का कहना है कि कथित मांग पूरी नहीं होने पर युवक को घर से ले जाया गया और बाद में उसके पास से चार किलो से अधिक गांजा मिलने की जानकारी दी गई।

परिजनों ने पुलिस कार्रवाई को द्वेषपूर्ण बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका दावा है कि इस घटनाक्रम के बाद क्षेत्र में भय का माहौल बना हुआ है।

महत्वपूर्ण तथ्य: एक लाख रुपये मांगने और द्वेषपूर्ण कार्रवाई किए जाने के आरोप फिलहाल शिकायतकर्ता पक्ष के दावे हैं। इनकी पुष्टि किसी स्वतंत्र जांच अथवा आधिकारिक निष्कर्ष से नहीं हुई है।

धर्मशाला ले जाकर मारपीट करने का आरोप, मेडिकल रिपोर्ट की जांच की मांग

जावेद अहमद की पत्नी सुलेहा बेगम की ओर से पुलिस कार्रवाई के दौरान कथित मारपीट का आरोप लगाया गया है। शिकायत के अनुसार, दोनों व्यक्तियों को बिछिया नदी के पास छतुरिया घाट स्थित धर्मशाला की ओर ले जाने का भी दावा किया गया है।

आरोप है कि वहां स्थानीय लोगों के एकत्र होने और आपत्ति जताने के बाद दोनों व्यक्तियों को जिला चिकित्सालय ले जाकर मेडिकल परीक्षण कराया गया।

शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि कथित मारपीट की सच्चाई सामने लाने के लिए मेडिकल रिपोर्ट, चिकित्सालय के अभिलेख, स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और संबंधित स्थानों की उपलब्ध CCTV रिकॉर्डिंग की जांच आवश्यक है।

इस मामले में संबंधित व्यक्तियों को चोटें आई थीं या नहीं और यदि आई थीं तो किन परिस्थितियों में, इसकी पुष्टि चिकित्सकीय अभिलेखों और निष्पक्ष जांच से ही हो सकेगी।

CCTV फुटेज सुरक्षित कराने की मांग, रिकॉर्डिंग मिटने की आशंका

शिकायत में 11 अक्टूबर की शाम 6 बजे से अगले दिन रात 1 बजे तक के घटनाक्रम से संबंधित उपलब्ध CCTV फुटेज सुरक्षित कराने की मांग की गई है। शिकायतकर्ता ने आशंका जताई है कि समय बीतने के साथ कैमरों की रिकॉर्डिंग स्वतः ओवरराइट हो सकती है।

जावेद अहमद के मकान के आसपास, रास्तों, प्रमुख चौराहों, बिछिया थाना परिसर, छतुरिया घाट क्षेत्र, कथित मारपीट के स्थान और जिला चिकित्सालय के प्रवेश द्वार पर उपलब्ध कैमरों की रिकॉर्डिंग जांच में शामिल करने का अनुरोध किया गया है।

इसके अतिरिक्त पुलिस वाहनों की आवाजाही, थाने में व्यक्तियों के प्रवेश और निकासी तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग भी की गई है। संबंधित स्थानों पर कैमरे उपलब्ध थे या नहीं और उनकी रिकॉर्डिंग सुरक्षित है या नहीं, यह जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

रोजनामचा, गिरफ्तारी मेमो और वाहन लॉगबुक की भी हो जांच

शिकायत में थाना बिछिया के 11 अक्टूबर के रोजनामचे, पुलिसकर्मियों के ड्यूटी चार्ट, वायरलेस संदेश, वाहन लॉगबुक, उपलब्ध GPS रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की तैनाती का विवरण सुरक्षित कराने की मांग की गई है।

साथ ही गिरफ्तारी मेमो, तलाशी दस्तावेज, जब्ती पंचनामा, स्वतंत्र गवाहों के विवरण, FIR दर्ज होने के समय, मेडिकल रिपोर्ट और मालखाना अभिलेखों का मिलान कराने का अनुरोध किया गया है।

इन दस्तावेजों की समयवार जांच से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि पांचों व्यक्तियों को कब और कहां से ले जाया गया, किस समय किसे छोड़ा गया और कथित गांजा बरामदगी की कार्रवाई किन परिस्थितियों में हुई।

4 किलो 900 ग्राम गांजा बरामदगी की प्रक्रिया पर भी सवाल

शिकायतकर्ता पक्ष ने एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज मामले में कथित गांजा बरामदगी की प्रक्रिया की भी जांच कराने की मांग की है। शिकायत में बरामदगी के स्थान और समय, तलाशी प्रक्रिया, स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति, जब्ती पंचनामा, सामग्री की सीलिंग, नमूना संग्रहण, मालखाना रिकॉर्ड और फॉरेंसिक परीक्षण से संबंधित दस्तावेजों के परीक्षण का अनुरोध किया गया है।

मांग की गई है कि यह जांचा जाए कि कार्रवाई में निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था या नहीं।

केवल आरोपों के आधार पर पुलिसकर्मियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसी प्रकार, पुलिस द्वारा प्रकरण दर्ज किए जाने मात्र से शिकायतकर्ता पक्ष की आपत्तियों को भी बिना जांच खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

स्थानीय थाने से बाहर स्वतंत्र वरिष्ठ अधिकारी को जांच सौंपने की मांग

मामले को लेकर गोपाल सिंह बघेल, राष्ट्रीय अध्यक्ष, जन अधिकार जन चेतना, जबलपुर एवं अधिवक्ता ने पुलिस महानिदेशक से पूरे घटनाक्रम की जांच किसी निष्पक्ष वरिष्ठ अधिकारी से कराने की मांग की है।

शिकायत में यह भी अनुरोध किया गया है कि यदि प्रारंभिक जांच में साक्ष्यों को प्रभावित करने, गवाहों पर दबाव बनाने या जांच में हस्तक्षेप की वास्तविक आशंका सामने आती है, तो संबंधित थाना प्रभारी की भूमिका का परीक्षण कर नियमानुसार आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई पर विचार किया जाए।

शिकायत की प्रतिलिपि राज्यपाल, मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, पुलिस महानिरीक्षक रीवा संभाग, पुलिस अधीक्षक रीवा तथा अन्य संबंधित सक्षम कार्यालयों को भेजे जाने का भी उल्लेख है।

गोपाल सिंह बघेल बोले—अपराध की सजा मिले, लेकिन द्वेषपूर्ण कार्रवाई नहीं होनी चाहिए

जन अधिकार जन चेतना के राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल सिंह बघेल ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस प्रकरण में कहीं न कहीं द्वेषपूर्ण कार्रवाई की आशंका दिखाई दे रही है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को पूरे मामले का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए, लेकिन कार्रवाई किसी प्रकार की द्वेष भावना से प्रेरित नहीं होनी चाहिए।

बघेल के अनुसार, उन्होंने पूरे मामले की जानकारी पुलिस अधीक्षक को व्हाट्सऐप के माध्यम से भी भेजी है।

अब सबसे बड़ा सवाल—क्या सुरक्षित होंगे साक्ष्य, क्या सामने आएगी सच्चाई?

इस पूरे प्रकरण में कई महत्वपूर्ण सवाल जांच की प्रतीक्षा कर रहे हैं। पांच व्यक्तियों को साथ ले जाने और तीन को छोड़ने की परिस्थितियां क्या थीं? कथित मारपीट के आरोपों में कितनी सच्चाई है? एक लाख रुपये मांगने के आरोपों का आधार क्या है? और 4 किलो 900 ग्राम गांजा बरामदगी की प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज क्या बताते हैं?

इन सवालों के जवाब के लिए पुलिस अभिलेखों, चिकित्सकीय दस्तावेजों, उपलब्ध CCTV फुटेज और स्वतंत्र गवाहों के बयानों का निष्पक्ष परीक्षण आवश्यक है।

फिलहाल पुलिसकर्मियों पर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित पुलिस अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष तथा किसी जांच का निष्कर्ष सामने आने के बाद ही घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

सवाल केवल एक पुलिस कार्रवाई का नहीं, बल्कि कानून के प्रति जनता के भरोसे का भी है। यदि आरोप निराधार हैं तो निष्पक्ष जांच से स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन या अधिकारों का दुरुपयोग प्रमाणित होता है, तो जिम्मेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

अब निगाहें रीवा पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों और पुलिस मुख्यालय पर टिकी हैं—क्या इस गंभीर शिकायत की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी और समय रहते महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित किया जाएगा?

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